नयी दिल्ली, नौ जून (भाषा) भारत के प्रधान न्यायाधीश (सीजेआई) सूर्यकांत ने कहा कि मध्यस्थता अब केवल एक विकल्प नहीं, बल्कि विवादों का समय पर, सौहार्दपूर्ण और स्थायी समाधान प्राप्त करने का एक आवश्यक साधन है।
सीजीआई ने हालांकि, यह भी कहा कि अंतरराष्ट्रीय मध्यस्थता को तेजी से प्रक्रियात्मक बाधाओं का सामना करना पड़ रहा है।
उन्होंने सोमवार को ब्रिटेन के उच्चतम न्यायालय में ‘‘मध्यस्थता, पंचाट और अदालतें: वाणिज्यिक विवादों को सुलझाने के भारतीय और अंग्रेजी तरीकों में एक जैसी प्रवृत्तियां’’ विषय पर व्याख्यान दिया।
सीजेआई ने कहा कि वैश्विक कंपनियों और कानूनी प्रणाली के विवादों से निपटने के तरीके में बुनियादी बदलाव की जरूरत है।
उन्होंने कहा, ‘‘आज की कंपनियों के लिए मुख्य सवाल यह नहीं होना चाहिए कि मुकदमा कहां किया जाए, बल्कि यह होना चाहिए कि विवाद को कैसे सुलझाया जाए।”
उन्होंने कहा कि अदालतों, पंचाट और मध्यस्थता को एक-दूसरे के प्रतिस्पर्धी तंत्र के तौर पर नहीं, बल्कि न्याय व्यवस्था के व्यापक ढांचे में अलग-अलग भूमिका निभाने वाली पूरक संस्थाओं के रूप में देखा जाना चाहिए।
उन्होंने कहा, “हमें उस पुरानी सोच को खारिज करना होगा जो विवाद सुलझाने के वैकल्पिक तरीकों को औपचारिक अदालतों की गरिमा के खिलाफ खड़ा करती है।”
न्यायमूर्ति सूर्यकांत ने कहा, ‘‘पारंपरिक अदालतों को सार्वजनिक कानूनी मानक तय करने और संवैधानिक जवाबदेही का मुख्य संरक्षक बने रहना चाहिए। जहां अदालतें निश्चितता प्रदान करती हैं, वहीं मध्यस्थता निजी व्यावसायिक तालमेल के लिए एक अनुकूल तंत्र का काम करती है। ये दोनों प्रणालियां एक-दूसरे को कमजोर नहीं करतीं, बल्कि एक-दूसरे का समर्थन करती हैं।”
सीजेआई ने मध्यस्थता, खासकर अंतरराष्ट्रीय पंचाट, को विवाद सुलझाने के अहम वैकल्पिक तरीकों में से एक बताया और अलग-अलग अधिकार-क्षेत्रों में इसके जरिये विवाद सुलझाने में आ रही दिक्कतों का जिक्र किया।
उन्होंने कहा, ‘‘मेरा यह दृढ़ विश्वास है कि भले ही अंतरराष्ट्रीय पंचाट तेजी से उन्हीं प्रक्रियात्मक जटिलताओं की नकल करने लगी है, जिनसे बचने के लिए इसे बनाया गया था, लेकिन फिर भी मध्यस्थता व्यावसायिक दक्षता का वास्तविक जरिया बनकर उभर रही है।’’
सीजेआई ने कहा, ‘‘पिछले कुछ दशकों में, अलग-अलग अधिकार-क्षेत्रों में पंचाट को निस्संदेह अदालत-केंद्रित न्याय-प्रक्रिया की कुछ कमियों के समाधान के तौर पर देखा जाने लगा है, खासकर तेज़ी, तकनीकी जटिलता, पक्षों की स्वायत्तता और सीमा-पार व्यापार से जुड़े मामलों में।
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