सत्ता से सच बोलने की अपेक्षा लोगों से झूठ बोलना ‘अधिक लुभावना’ है : कवि अशोक वाजपेयी |

सत्ता से सच बोलने की अपेक्षा लोगों से झूठ बोलना ‘अधिक लुभावना’ है : कवि अशोक वाजपेयी

सत्ता से सच बोलने की अपेक्षा लोगों से झूठ बोलना ‘अधिक लुभावना’ है : कवि अशोक वाजपेयी

: , January 25, 2023 / 09:24 PM IST

नयी दिल्ली, 25 जनवरी (भाषा) हिंदी भाषी मीडिया पर सबसे ज्यादा “झूठ” और “गलत खबर” फैलाने का आरोप लगाते हुए प्रख्यात कवि अशोक वाजपेयी ने कहा कि सत्ता से सच बोलने की तुलना में लोगों से झूठ बोलना “अधिक लुभावना” है।

वाजपेयी ने मंगलवार को लेखक-पत्रकार मृणाल पांडे की किताब ‘द जर्नी ऑफ हिंदी लैंग्वेज जर्नलिज्म इन इंडिया’ के विमोचन के मौके पर यह बात कही। उन्होंने कहा कि हिंदी मीडिया और हिंदी समाज संस्कृति और साहित्य में अपनी परंपराओं से “ढह चुके” और “मौलिक रूप से विचलित” प्रतीत होते हैं।

वाजपेयी ने आरोप लगाया, “सत्ता से सच बोलना बहुत आकर्षक वाक्यांश है, लोगों से झूठ बोलना अधिक लुभावना होता है। और मुझे लगता है कि हिंदी मीडिया आज सत्ता से सच बोलने की हिम्मत करने के बजाय जनता से झूठ बोल रही है …. अधिकांश हिंदी मीडिया के माध्यम से गलत जानकारी (फेक न्यूज), झूठ और नफरत फैलाई जा रही है।”

वाजपेयी (82) ने कहा कि भारतीय प्रेस परिषद (पीसीआई) की उस रिपोर्ट में हिंदी भाषा के मीडिया के “सांप्रदायीकरण” और “ध्रुवीकरण” को रेखांकित किया गया था, जिसमें रामजन्मभूमि-बाबरी मस्जिद मुद्दे की कवरेज से संबंधित प्रेस की भूमिका और प्रेस से निपटने में अधिकारियों की भूमिका की जांच की गई थी।

यहां तक कि उन्होंने हिंदी मीडिया पर “राजनेताओं द्वारा दिए गए” विवरण का उपयोग दोहराने का आरोप लगाते हुए उदाहरण के लिए “अवॉर्ड वापसी गैंग” शब्द का उल्लेख किया।

उन्होंने कहा, “यह राजनेताओं द्वारा दिया गया एक शब्द था। लेकिन सभी मीडिया चैनलों और समाचार पत्रों ने इसे ऐसे लिया है जैसे कि यह ऐसे लोगों के एक समूह का उचित प्रामाणिक विवरण है, जिन्होंने असहिष्णुता के खिलाफ अपने पुरस्कार देने का साहस किया है।”

अनुभवी पत्रकार और पुस्तक की लेखिका पांडे ने वाजपेयी की भावनाओं का समर्थन किया और तर्क दिया कि आज हम हिंदी भाषा मीडिया में जो देखते हैं वह स्थिति लंबे समय से बन रही थी।

यह दावा करते हुए कि हिंदी न्यूज़ रूम में लोगों का एक बड़ा हिस्सा – “90 प्रतिशत” तक उच्च जाति से है, 76 वर्षीय लेखिका ने कहा कि वह 1970 के दशक से हिंदी भाषा मीडिया की निगरानी के बारे में लिख रही हैं।

भाषा

प्रशांत माधव

माधव

 

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