आवारा कुत्तों के प्रबंधन से जुड़े रिकॉर्ड, एनजीओ भुगतान का विवरण सार्वजनिक करे एमसीडी: सीआईसी
आवारा कुत्तों के प्रबंधन से जुड़े रिकॉर्ड, एनजीओ भुगतान का विवरण सार्वजनिक करे एमसीडी: सीआईसी
नयी दिल्ली, सात जून (भाषा) केंद्रीय सूचना आयोग (सीआईसी) ने दिल्ली नगर निगम (एमसीडी) को आवारा कुत्तों के प्रबंधन से जुड़े एक मामले में “जानबूझकर” जानकारी साझा न करने का दोषी पाते हुए उस पर 25,000 रुपये का जुर्माना लगाया है।
आयोग ने आरटीआई आवेदक को 10,000 रुपये का मुआवजा देने का भी आदेश दिया तथा एनजीओ को किए गए भुगतान, कुत्तों की नसबंदी और टीकाकरण से संबंधित आंकड़ों सहित रिकॉर्ड को स्वतः सार्वजनिक करने के निर्देश दिए।
आयोग के आदेश में आवारा कुत्तों के मुद्दे पर उच्चतम न्यायालय के 19 मई, 2026 के फैसले का भी उल्लेख किया गया है, जिसमें वस्तुनिष्ठ रूप से सत्यापित किए जा सकने वाले आंकड़ों के आधार पर पशु जन्म नियंत्रण (एबीसी) उपायों के क्रियान्वयन की करीबी निगरानी की आवश्यकता पर जोर दिया गया था।
सीआईसी ने कहा कि आवेदक द्वारा मांगी गई जानकारी को सार्वजनिक रूप से पहले से उपलब्ध कराने से पशु जन्म नियंत्रण (एबीसी) उपायों की नियमित निगरानी में सुविधा होगी तथा पारदर्शिता और जवाबदेही को बढ़ावा मिलेगा।
यह मामला दिसंबर 2022 में अक्षय कुमार मल्होत्रा द्वारा दायर एक आरटीआई आवेदन से जुड़ा है, जिसमें उन्होंने एमसीडी द्वारा नियुक्त पशु कल्याण संगठनों, आवारा कुत्तों की नसबंदी और टीकाकरण, श्वान आश्रय स्थलों, अधिकारियों को प्राप्त शिकायतों तथा इन गतिविधियों पर किए गए खर्च से संबंधित जानकारी मांगी थी।
आयोग ने कहा कि मांगी गई जानकारी पशु जन्म नियंत्रण कार्यक्रम के क्रियान्वयन, गैर-सरकारी संगठनों (एनजीओ) को किए गए भुगतान, पशु आश्रयों के संचालन, निगरानी तंत्र और सार्वजनिक धन के व्यय से संबंधित है। इनमें से अधिकांश जानकारी सूचना का अधिकार अधिनियम की धारा 4(1)(बी) के तहत स्वतः सार्वजनिक की जानी चाहिए थी।
केंद्रीय सूचना आयोग (सीआईसी) ने एमसीडी आयुक्त को निर्देश दिया कि पशु जन्म नियंत्रण (एबीसी) कार्यक्रमों, कुत्तों की नसबंदी और टीकाकरण संबंधी आंकड़ों, गैर-सरकारी संगठनों (एनजीओ) को किए गए भुगतान, अनुबंधों, निगरानी समितियों के विवरण, पशु आश्रयों और केनल से जुड़ी जानकारी, प्राप्त शिकायतों तथा उन पर की गई कार्रवाई संबंधी रिपोर्ट को स्वतः सार्वजनिक करना सुनिश्चित किया जाए।
आवेदक को 10,000 रुपये का मुआवजा प्रदान करते हुए आयोग ने कहा कि उसे अपने क्षेत्र को प्रभावित करने वाले ‘‘जन स्वास्थ्य, जन सुरक्षा और सार्वजनिक धन के व्यय’’ से संबंधित सूचनाओं तक समय पर पहुंच से वंचित रखा गया। इसके कारण उसे तीन वर्ष से अधिक समय तक प्रथम अपील, द्वितीय अपील और कारण बताओ (शो-कॉज) कार्यवाही का सहारा लेने के लिए मजबूर होना पड़ा।
आयोग ने कहा, ‘‘प्रतिवादी के आचरण के कारण अनावश्यक मुकदमेबाजी हुई और अपीलकर्ता को टाली जा सकने वाली कठिनाइयों का सामना करना पड़ा।’’
भाषा
राखी प्रशांत
प्रशांत

Facebook


