आरटीआई अधिनियम के 20 साल बाद भी प्रस्ताव और रिकॉर्ड सार्वजनिक नहीं करने को लेकर एमसीडी को फटकार

आरटीआई अधिनियम के 20 साल बाद भी प्रस्ताव और रिकॉर्ड सार्वजनिक नहीं करने को लेकर एमसीडी को फटकार

आरटीआई अधिनियम के 20 साल बाद भी प्रस्ताव और रिकॉर्ड सार्वजनिक नहीं करने को लेकर एमसीडी को फटकार
Modified Date: February 4, 2026 / 04:56 pm IST
Published Date: February 4, 2026 4:56 pm IST

नयी दिल्ली, चार फरवरी (भाषा) दिल्ली उच्च न्यायालय ने दिल्ली नगर निगम (एमसीडी) को आरटीआई अधिनियम लागू होने के 20 साल बाद भी अपने विधायी रिकॉर्ड, सदन की कार्यवाही और प्रस्तावों के बारे में जानकारी प्रकाशित करने में नाकाम रहने पर बुधवार को फटकार लगायी।

मुख्य न्यायाधीश डी के उपाध्याय और न्यायमूर्ति तेजस करिया की पीठ ने कहा कि सूचना का अधिकार (आरटीआई) अधिनियम की धारा 4 सार्वजनिक प्राधिकरणों के लिए यह अनिवार्य करती है कि वे ऐसी जानकारी स्वतः सार्वजनिक करें, ताकि आरटीआई अधिनियम की प्रक्रिया का न्यूनतम सहारा लेना पड़े। पीठ ने स्पष्ट किया कि इस मामले में एमसीडी को किसी भी तरह की छूट नहीं दी जा सकती।

अदालत गैर सरकारी संस्था (एनजीओ) सेंटर फॉर यूथ, कल्चर, लॉ एंड एनवायरनमेंट द्वारा दायर उस जनहित याचिका पर सुनवाई कर रही थी, जिसमें एमसीडी के विधायी रिकॉर्ड, सदन की कार्यवाही, स्थायी समितियों द्वारा पारित प्रस्तावों तथा अन्य सभी सार्वजनिक सूचनाओं को समयबद्ध तरीके से उसकी वेबसाइट पर अपलोड करने का अनुरोध किया गया था।

एमसीडी की ओर से पेश वकील ने अदालत को आश्वासन दिया कि सक्षम प्राधिकारी के समक्ष इस तरह की जानकारी अपलोड करने का मामला विचाराधीन है और इस संबंध में सुधारात्मक कदम उठाए जाएंगे। उन्होंने कहा कि जानकारी अपलोड करने की “प्रक्रिया निगम स्तर पर जारी है”, लेकिन इसमें कुछ समय लगेगा।

पीठ ने कहा, “20 साल बाद इस कवायद के लिए आपका धन्यवाद। हम बहुत आभारी हैं। (और) कौन-सी प्रक्रिया? आपको यह जानकारी 120 दिनों के भीतर और उसके बाद नियमित अंतराल पर अपलोड करनी थी। आप अब तक क्या कर रहे थे? यह अधिनियम (आरटीआई अधिनियम) वर्ष 2005 में पारित हुआ था। इसे लागू हुए 20 साल हो चुके हैं।”

अदालत ने एमसीडी को याचिका के जवाब में हलफनामा दाखिल करने का निर्देश दिया और यह बताने को कहा कि आरटीआई अधिनियम की धारा 4 के तहत सूचना को प्रकाशित करके जनता को उपलब्ध कराने के लिए अब तक क्या कदम उठाए गए हैं।

अदालत ने टिप्पणी की, “अधिनियम की धारा 4 के तहत सार्वजनिक प्राधिकरणों पर यह दायित्व डालने का उद्देश्य स्पष्ट है—ऐसी जानकारी प्रकाशित की जाए ताकि जनता को आरटीआई अधिनियम का न्यूनतम सहारा लेना पड़े, क्योंकि सूचना स्वतः सार्वजनिक प्राधिकरणों द्वारा उपलब्ध कराई जाएगी। इस संबंध में एमसीडी सहित किसी भी प्राधिकरण को कोई छूट नहीं दी जा सकती।”

याचिकाकर्ता ने अदालत को बताया कि एक आरटीआई आवेदन के जवाब में एमसीडी ने कहा था कि अब तक उसकी वेबसाइट पर ऐसा कोई रिकॉर्ड अपडेट नहीं किया गया है, क्योंकि तीन पूर्व नगर निकायों के एकीकरण के बाद वेबसाइट को “अपडेट” करने का काम चल रहा है।

अदालत को यह भी बताया गया कि एमसीडी ने अपने जवाब में यह रुख अपनाया कि उसकी आधिकारिक वेबसाइट पर प्रस्तावों के प्रकाशन को नियंत्रित करने के लिए कोई नियम या दिशा-निर्देश नहीं हैं, क्योंकि वह दिल्ली नगर निगम (डीएमसी) अधिनियम की धारा 86 के तहत शासित है।

इस पर अदालत ने कहा कि धारा 86 का जनता तक सूचना और विवरणों के प्रसार से कोई संबंध नहीं है।

अदालत ने स्पष्ट किया कि इस स्तर पर उसने केवल प्रथम दृष्टया राय बनाई है और मामले को आगे की सुनवाई के लिए अप्रैल में सूचीबद्ध किया।

भाषा अमित पवनेश

पवनेश


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