(आदित्य देव)
नयी दिल्ली, नौ जून (भाषा) गंगा में बहने वाले औद्योगिक अपशिष्ट 2017 की तुलना लगभग 60 प्रतिशत कम हो गया है, जिसमें अत्यधिक प्रदूषण फैलाने वाले उद्योगों से जैविक ऑक्सीजन मांग (बीओडी) का भार 26 टन प्रति दिन से घटकर 2024 में 10.75 टन प्रति दिन हो गया है। नमामि गंगे कार्यक्रम से जुड़े अधिकारियों ने यह जानकारी दी।
उन्होंने औद्योगिक प्रदूषण में आई कमी का श्रेय केंद्र सरकार के प्रमुख नदी संरक्षण कार्यक्रम ‘नमामि गंगा’ के तहत शुरू किए गए कई नियामकीय उपायों को दिया।
अधिकारियों के अनुसार, सबसे महत्वपूर्ण हस्तक्षेप कानपुर के जाजमऊ चमड़ा उद्योग क्षेत्र में हुआ है, जिसे लंबे समय से गंगा की मुख्य धारा में औद्योगिक प्रदूषण का सबसे बड़ा एकल स्रोत माना जाता रहा है।
एक अधिकारी ने कहा, ‘‘जाजमऊ चमड़ा उद्योग क्षेत्र दो पीढ़ियों तक देश में गंगा प्रदूषण का सबसे अधिक चर्चित स्रोत रहा है। कानपुर के निचले इलाकों में पानी के रंग में बदलाव की तस्वीरों ने औद्योगिक प्रदूषण से नदी पर पड़ने वाले प्रभावों के बारे में जनता की समझ को दिशा दी।’’
कानपुर क्षेत्र की सफाई में जाजमऊ सार्वजनिक अपशिष्ट उपचार संयंत्र (सीईटीपी) का निर्माण, सिसामऊ नाले का अवरोधन, नगरपालिका जलमल शोधन अवसंरचना का विस्तार और बड़े चमड़ा कारखानों के लिए शून्य-तरल-प्रवाह मानदंडों का प्रवर्तन शामिल था।
उन्होंने बताया कि कानपुर क्षेत्र में पानी की गुणवत्ता में काफी सुधार हुआ है, लेकिन चुनौतियां अब भी बनी हुई हैं।
अधिकारी ने कहा, ‘‘कानपुर क्षेत्र में अब भी आंशिक सफलता मिली है और काम जारी है। बीओडी का स्तर काफी कम हो गया है, लेकिन फर्रुखाबाद से पुराना राजपुर उप-क्षेत्र में अभी तक नहाने योग्य गुणवत्ता के मानक हासिल नहीं हुए हैं।’’
कानपुर के अलावा, मथुरा में भी एक महत्वपूर्ण परियोजना चलाई गई है, जहां 6.5 ‘एमएलडी’ क्षमता वाली सीईटीपी परियोजना पूरी हो चुकी है और चालू है।
यह परियोजना मथुरा रिफाइनरी से जुड़ी औद्योगिक इकाइयों और रसायन एवं रंग निर्माण इकाइयों समेत क्षेत्र की औद्योगिक इकाइयों को सेवा प्रदान करती है।
अधिकारियों ने बताया कि संबंधित ‘ट्रांस यमुना सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट’ से शोधित जल अब रिफाइनरी को आपूर्ति किया जा रहा है, जिससे ताजे पानी की खपत कम हो रही है और नदी प्रणाली में अपशिष्ट जल का प्रवाह सीमित हो रहा है।
उत्तर प्रदेश के उन्नाव जिले के बंथर में 4.5 ‘एमएलडी’ क्षमता वाला एक सीईटीपी भी निर्माणाधीन है और इससे क्षेत्र की औद्योगिक इकाइयों, जिनमें चमड़ा कारखाने और रासायनिक विनिर्माण इकाइयां शामिल हैं, को पानी मिलने की उम्मीद है।
इस प्रणाली के तहत, बेसिन में स्थित हर अत्यधिक प्रदूषणकारी उद्योग (जीपीआई) का तृतीय पक्ष द्वारा वार्षिक निरीक्षण किया जाता है, जिसकी रिपोर्ट केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (सीपीसीबी) और संबंधित राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्डों को सौंपी जाती है। नियमों का पालन न करने वाली इकाइयों पर पर्यावरणीय क्षतिपूर्ति जुर्माना लगाया जाता है और बार-बार उल्लंघन के मामलों में, उन्हें बंद करने का आदेश दिया जाता है।
भाषा
राजकुमार माधव
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