(अश्विनी श्रीवास्तव)
नयी दिल्ली, 24 मई (भाषा) दिल्ली में लाल किले के पास हुए कार विस्फोट मामले में राष्ट्रीय अन्वेषण अभिकरण (एनआईए) की जांच में सामने आया है कि अल-कायदा नाम के वैश्विक आतंकवादी संगठन की एक शाखा से जुड़े एक आरोपी ने कृत्रिम मेधा (एआई) मंच का कथित तौर पर इस्तेमाल ‘आतंकवादी साजिश’ रचने के लिए किया था। आधिकारिक सूत्रों ने रविवार को यह जानकारी दी।
सूत्रों ने बताया कि आरोपियों ने ‘रॉकेट इम्प्रोवाइज्ड एक्सप्लोसिव डिवाइस’ (आरआईईडी) भी बनाए थे और जम्मू-कश्मीर के अनंतनाग जिले के काजीगुंड जंगल में उनका परीक्षण किया था।
ये चौंकाने वाले निष्कर्ष एनआईए द्वारा 14 मई को दाखिल किये गये 7,500 पन्नों के विस्तृत आरोपपत्र का हिस्सा हैं।
यह आरोपपत्र पिछले साल 10 नवंबर को राजधानी में हुए आईईडी विस्फोट के संबंध में है।
दिल्ली में एनआईए की विशेष अदालत में दाखिल आरोपपत्र में सभी बातों का विस्तृत विवरण दिया गया है।
अधिकारियों ने आरोपपत्र में आईईडी को बनाने और उपयोग के लिए आरोपियों द्वारा अपनाई गई ‘लगभग प्रयोगशाला-स्तरीय’ और सावधानीपूर्वक कार्यप्रणाली का भी जिक्र किया है।
आरोपपत्र में नामजद आरोपियों में से एक अंसार गजवत-उल-हिंद (एजीयूएच) आतंकी मॉड्यूल का ‘इंजीनियर’ निकला।
इस आतंकी मॉड्यल का संबंध ‘‘भारतीय उपमहाद्वीप में अल-कायदा’’ (एक्यूआईएस) से है।
गृह मंत्रालय द्वारा एक्यूआईएस और उसके सभी संगठनों को आतंकवादी संगठन घोषित किया जा चुका है।
आरोपपत्र में बताया गया कि आरोपी जासिर बिलाल वानी 2024-25 के दौरान दो से तीन बार हरियाणा के फरीदाबाद स्थित अल फलाह विश्वविद्यालय परिसर में रुका था, ताकि साजिश के लिए ‘तकनीकी सहायता’ प्रदान कर सके।
जांच में पता चला कि विश्वविद्यालय में कार्यरत तीन चिकित्सक विस्फोट में कथित तौर पर शामिल थे, जिसके बाद कानून प्रवर्तन एजेंसियों ने विश्वविद्यालय की भूमिका पर सवाल उठाए।
डॉ. आदिल अहमद राथर ने जासिर को डॉ. उमर उन नबी से मिलवाया था। उमर उन नबी इस मामले में एक अन्य प्रमुख आरोपी और विस्फोटक से भरी कार का चालक था।
आरोपपत्र के अनुसार, विस्फोट में 11 लोगों की मौत हुई थी और कई लोग घायल हुए थे। एनआईए की जांच में सामने आया कि आदिल ने जासिर को आईईडी बनाने की सामग्री की आपूर्ति करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी, जबकि डॉ. उमर ने रॉकेट आईईडी पर शोध किया और उसे बनाने का तरीका बताया था।
आरोपपत्र के मुताबिक, जासिर ने यूट्यूब व चैटजीपीटी पर ‘रॉकेट बनाने का तरीका एवं मिश्रण का अनुपात क्या होना चाहिए’ जैसी जानकारी खोजी थी, जिससे आतंकी गतिविधियों के लिए डिजिटल और एआई मंचों के कथित इस्तेमाल का पता चला। आरोपपत्र में उल्लेख किया गया कि जासिर ने डॉ. उमर, डॉ. मुजम्मिल शकील और अन्य सह-आरोपियों के साथ कथित तौर पर मिलकर काजीगुंड के जंगल में रॉकेट आईईडी तैयार किए और उनका परीक्षण किया।
जासिर द्वारा किए गए खुलासों के आधार पर एनआईए टीमों ने व्यापक क्षेत्रीय जांच के दौरान जंगल के भीतर से इन उपकरणों के अवशेष बरामद किए।
आरोपपत्र के अनुसार, एनआईए जांच में पता चला कि डॉ. उमर ने जासिर की क्षमता को देखते हुए उसे दो ड्रोन भी दिए और उनकी उड़ान सीमा एवं भार वहन क्षमता बढ़ाने के निर्देश दिए।
पुलिस ने बताया कि फॉरेंसिक जांच में सबसे चौंकाने वाली बात जो सामने आई, वह डॉ. उमर द्वारा इस्तेमाल किए गए वाहन में रखे गए आईईडी के ट्रिगर तंत्र से संबंधित थी।
एनआईए के आरोपपत्र के अनुसार, दिसंबर 2023 और जनवरी 2024 के बीच जासिर ने ‘फ्लिपकार्ट’ के माध्यम से ट्रिगर तंत्र में इस्तेमाल होने वाले विभिन्न घटकों का ऑर्डर दिया था, जिनमें सेंसर-इंडक्टिव प्रॉक्सिमिटी स्विच, हीट गन, पीजो प्लेट, रिमोट कंट्रोल रिले-स्विच आरएफ (रेडियो फ्रीक्वेंसी) ट्रांसमीटर और रिसीवर किट, रिचार्जेबल पॉकेट लाइटर, सोल्डरिंग किट और एलईडी इलेक्ट्रॉनिक किट शामिल थे।
इस खरीद का खर्च डॉ. उमर ने उठाया था और जासिर को कैश ऑन डिलीवरी के जरिये ये सामान प्राप्त हुए थे।
बाद में जासिर ने इन घटकों को असेंबल कर आईईडी बनाने के लिए डॉ. उमर को सौंप दिया था।
आरोपपत्र के मुताबिक, डॉ. उमर ने ट्रिगर का इस्तेमाल कर आईईडी में विस्फोट कर दिया। एनआईए ने पाया कि आरोपियों ने विभिन्न प्रकार के आईईडी का निर्माण और परीक्षण भी किया था। विस्फोट में प्रयुक्त विस्फोटक ‘ट्राइएसीटोन ट्राइपेरोक्साइड’ (टीएटीपी) था।
इससे पहले, श्रीनगर पुलिस ने चिकित्सा पेशेवरों से जुड़े विस्फोट से संबंधित ‘डॉक्टर’ या ‘व्हाइट-कॉलर’ मॉड्यूल का भंडाफोड़ किया था।
भाषा जितेंद्र सुरेश
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