समलैंगिक विवाह को मान्यता की मांग वाली याचिकाओं पर न्यायालय ने चार सप्ताह में केंद्र से मांगा जवाब |

समलैंगिक विवाह को मान्यता की मांग वाली याचिकाओं पर न्यायालय ने चार सप्ताह में केंद्र से मांगा जवाब

समलैंगिक विवाह को मान्यता की मांग वाली याचिकाओं पर न्यायालय ने चार सप्ताह में केंद्र से मांगा जवाब

: , November 29, 2022 / 08:14 PM IST

नयी दिल्ली, 24 नवंबर (भाषा) वयस्कों के बीच सहमति से बनाये गये समलैंगिक यौन संबंधों को अपराध की श्रेणी से हटाने के फैसले के चार साल बाद उच्चतम न्यायालय ने दो समलैंगिक जोड़ों की अलग-अलग याचिकाओं पर केंद्र और अटॉर्नी जनरल आर. वेंकटरमणि को शुक्रवार को नोटिस जारी किया।

समलैंगिक जोड़ों की इस याचिका में विवाह के उनके अधिकार को लागू करने और इसे विशेष विवाह कानून के तहत मान्यता देने का अनुरोध किया गया है।

प्रधान न्यायाधीश डी. वाई. चंद्रचूड़ और न्यायमूर्ति हिमा कोहली की एक पीठ ने केंद्र सरकार को नोटिस जारी करने के साथ ही इन याचिकाओं के निपटारे के लिए अटॉर्नी जनरल आर. वेंकटरमणि से सहयोग भी मांगा।

न्यायमूर्ति चंद्रचूड़ शीर्ष अदालत की उस संविधान पीठ का हिस्सा थे जिसने 2018 में सहमति से समलैंगिक संबंधों को अपराध की श्रेणी से बाहर कर दिया था।

पीठ ने कहा, ‘‘नोटिस जारी किया जाता है, जिसके जवाब के लिए चार सप्ताह का समय दिया जाता है। भारत के अटॉर्नी जनरल को भी नोटिस जारी किया जाए।’’

शीर्ष अदालत की पांच-सदस्यीय संविधान पीठ ने छह सितंबर, 2018 को दिये एक सर्वसम्मत फैसले में, ब्रिटिशकालीन दंड विधान के उस हिस्से को निरस्त करते हुए वयस्क समलैंगिकों या विषमलैंगिकों के बीच निजी स्थान पर सहमति से यौन संबंध बनाना अपराध की श्रेणी से बाहर कर दिया था।

समलैंगिक जोड़ों की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता मुकुल रोहतगी ने कहा कि यह मुद्दा नवतेज सिंह जौहर और पुट्टास्वामी के फैसलों (समलैंगिक यौन संबंध और निजता के अधिकार के फैसले) की अगली कड़ी है।

नोटिस जारी करने से पहले वरिष्ठ अधिवक्ता मुकुल रोहतगी की ओर से दी गयी दलीलों पर गौर किया।

उसने केंद्र सरकार और भारत के अटॉर्नी जनरल को भी नोटिस जारी करने का निर्देश दिया। अपीलों में दो समलैंगिक जोड़ों ने अपनी शादी को विशेष विवाह कानून के तहत मान्यता देने का निर्देश दिए जाने की मांग की है।

एक याचिका हैदराबाद में रहने वाले समलैंगिक जोड़े सुप्रियो चक्रवर्ती और अभय डांग ने दायर की है, जबकि दूसरी याचिका समलैंगिक जोड़े पार्थ फिरोज मेहरोत्रा और उदय राज की ओर से दायर की गई।

उन्होंने याचिका में एलजीबीटीक्यू (लेस्बियन, गे, बाइसेक्शुअल और ट्रांसजेंडर और क्वीर) समुदाय के लोगों को अपनी पसंद के व्यक्ति से शादी करने का अधिकार देने का निर्देश देने का अनुरोध किया गया था।

याचिका में कहा गया है कि समलैंगिक विवाह को मान्यता नहीं देना संविधान के अनुच्छेद 14 और 21 के तहत समानता के अधिकार व जीवन के अधिकार का उल्लंघन है।

उच्चतम न्यायालय की पांच-न्यायाधीशों की संविधान पीठ ने 2018 में सर्वसम्मति से भारतीय दंड संहिता की धारा 377 के तहत 158 साल पुराने औपनिवेशिक कानून के उस हिस्से को अपराध की श्रेणी से हटा दिया था जिसके तहत ‘‘सहमति से अप्राकृतिक यौन संबंध को एक अपराध माना जाता था।’’

भाषा सुरेश पवनेश

पवनेश

 

(इस खबर को IBC24 टीम ने संपादित नहीं किया है. यह सिंडीकेट फीड से सीधे प्रकाशित की गई है।)