(अंजलि ओझा)
नयी दिल्ली, 24 मई (भाषा) कार्यकर्ता सोनम वांगचुक ने कहा कि लद्दाख के प्रतिनिधियों और केंद्र के बीच हाल में हुई वार्ता एक ‘‘सकारात्मक कदम’’ है, लेकिन उन्होंने आगाह किया कि क्षेत्र में विश्वास बहाली की प्रक्रिया अभी अधूरी है।
उन्होंने पिछले वर्ष हुए विरोध प्रदर्शनों से जुड़े मामलों के अब तक न सुलझने, निजी उपकरणों की जब्ती और आंदोलन से जुड़े संगठनों पर की गई कार्रवाई का हवाला देते हुए कहा कि पूर्ण विश्वास बहाल होना अभी बाकी है।
गृह मंत्रालय की उप-समिति के साथ हालिया दौर की बातचीत के बाद शनिवार को ‘पीटीआई-भाषा’ के साथ एक साक्षात्कार में उन्होंने कहा कि बृहस्पतिवार की बैठक के बाद उनके दृष्टिकोण में कुछ बदलाव आया है, लेकिन वह अब भी सतर्क बने हुए हैं।
वांगचुक ने हिरासत में लिए जाने के अपने पिछले अनुभव का जिक्र करते हुए कहा, ‘‘इस बैठक से कुछ फर्क पड़ा है… वरना मैं बहुत निराश था।’’
उन्होंने कहा कि रिहाई के आदेश में “विश्वास का माहौल” बनाने और “सार्थक एवं रचनात्मक संवाद” की दिशा में आगे बढ़ने का उल्लेख किया गया था। हालांकि, उन्होंने आरोप लगाया कि जमीनी स्तर पर स्थिति इन आश्वासनों को प्रतिबिंबित नहीं करती है।
वांगचुक ने कहा, “जमीनी स्तर पर कुछ भी नहीं हो रहा था। लोग बंट रहे थे – लेह और कारगिल, बौद्ध आपस में लड़ रहे थे, मुसलमान आपस में लड़ रहे थे। हमें लगा कि विश्वास बहाली नहीं हो रही है और सार्थक संवाद की संभावना भी कम दिख रही थी।’’
उन्होंने कहा, ‘‘पिछला सप्ताह बहुत ही नकारात्मक रहा। हर जगह संघर्ष था। मुझे लगा कि लद्दाख एक और मणिपुर बन जाएगा; यह उसी दिशा में बढ़ रहा था।’’
उन्होंने कहा कि केंद्र के साथ हालिया बातचीत से कुछ राहत मिली है। गृह मंत्रालय की उप-समिति के साथ हुई बैठक का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा, ‘‘दोनों पक्षों ने एक कदम आगे बढ़ाया है।’’ वांगचुक ने कहा कि आशावाद इस बात पर निर्भर करेगा कि सरकार आने वाले हफ्तों में ठोस कदम उठाती है या नहीं।
कार्यकर्ता ने कई ऐसे अनसुलझे मुद्दों की ओर ध्यान दिलाया, जो भरोसे को कमजोर कर रहे हैं, जिनमें उनका मोबाइल फोन भी शामिल है, जिसे लगभग आठ महीने पहले प्रदर्शनों के दौरान जब्त कर लिया गया था और अब तक वापस नहीं किया गया है।
उन्होंने कहा, ‘‘जेल जाते समय मेरा मोबाइल फोन ले लिया गया था। रिहा हुए दो महीने से ज़्यादा हो गए हैं, लेकिन अभी तक मुझे मेरा फोन वापस नहीं मिला है।’’
उन्होंने ‘हिमालयन इंस्टीट्यूट ऑफ अल्टरनेटिव्स’ (एचआईएएल), लद्दाख के भूमि पट्टे और विदेशी योगदान विनियमन अधिनियम (एफसीआरए) लाइसेंस से जुड़े मुद्दों का भी जिक्र किया।
उन्होंने कहा, ‘‘एचआईएएल की जमीन रद्द कर दी गई, जबकि हमारे पास सभी दस्तावेज मौजूद थे। हमारा एफसीआरए अभी तक बहाल नहीं हुआ है।’ उन्होंने जोर दिया कि संस्थान के खातों की जांच में कोई गड़बड़ी नहीं पाई गई है।
वांगचुक ने तर्क दिया कि इन घटनाक्रम के कारण उन्हें अपनी रिहाई के कारणों पर सवाल उठाने पड़े। उन्होंने पूछा, ‘सवाल उठता है- क्या मुझे सहानुभूति के कारण रिहा किया गया या उच्चतम न्यायालय के हस्तक्षेप के कारण?’
वार्ता में हुई हालिया प्रगति को स्वीकार करते हुए वांगचुक ने कहा कि वह अगले कुछ हफ्तों में केंद्र सरकार की मंशा का आकलन उसके कार्यों के आधार पर करेंगे। उन्होंने कहा, ‘‘अब मैं अगले एक-दो हफ्तों में देखना चाहूंगा कि वे इन कमियों को दूर करते हैं या नहीं।’’
वांगचुक के लिए, विश्वास की सबसे महत्वपूर्ण कमी व्यक्तिगत शिकायतों के बारे में नहीं है, बल्कि लद्दाख में 24 सितंबर के विरोध प्रदर्शनों से उत्पन्न मामलों के बारे में है।
उन्होंने प्रदर्शनकारियों के खिलाफ आपराधिक आरोपों और आंदोलन से जुड़ी मौतों पर चिंता जताई। उन्होंने कहा, ‘‘सबसे बड़ी बात 24 सितंबर को जो हुआ, वह है। इतने सारे लोग घायल हुए, कुछ की मौत हुई…कई लोगों पर आरोप लगाए गए। क्या वे मामले वापस लिए जाएंगे? तभी भरोसा कायम होगा।’’
वांगचुक की यह टिप्पणी उस बैठक के बाद आई है, जिसमें लेह एपेक्स बॉडी और कारगिल डेमोक्रेटिक एलायंस के प्रतिनिधियों ने लद्दाख के लिए संवैधानिक सुरक्षा, लोकतांत्रिक अधिकारों और शासन व्यवस्था से जुड़े मुद्दों पर गृह मंत्रालय की उप-समिति के साथ वार्ता की थी।
बृहस्पतिवार को उप-समिति की बैठक के बाद जारी संयुक्त बयान में दोनों समूहों ने संकेत दिया कि लद्दाख में लोकतंत्र बहाल करने और संविधान के अनुच्छेद 371 के तहत नगालैंड, सिक्किम और मिजोरम जैसी संवैधानिक सुरक्षा प्रदान करने को लेकर भारत सरकार के साथ “सैद्धांतिक सहमति” बन गई है।
भाषा आशीष दिलीप
दिलीप