अल्पसंख्यक वोटबैंक में फिर से पैठ मजबूत करती दिख रही है तृणमूल कांग्रेस
अल्पसंख्यक वोटबैंक में फिर से पैठ मजबूत करती दिख रही है तृणमूल कांग्रेस
(प्रदीप्त तापदार)
कोलकाता/बहरामपुर, 18 अप्रैल (भाषा) करीब एक महीने पहले तृणमूल कांग्रेस के अल्पसंख्यक वोट बैंक में 15 साल में पहली बार गिरावट नजर आ रही थी, लेकिन विश्लेषकों का कहना है कि अब प्रतीत होता है कि यह वोटबैंक नए सिरे से मजबूत हो रहा है। एसआईआर में नाम हटने, भाजपा के यूसीसी के वादे और एआईएमआईएम-एजेयूपी गठबंधन के कमजोर पड़ने से सत्तारूढ़ पार्टी की मुस्लिम मतदाताओं पर पकड़ एक बार फिर मजबूत होती दिख रही है।
मार्च तक इंडियन सेक्युलर फ्रंट (आईएसएफ), ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन (एआईएमआईएम) और हुमायूं कबीर की आम जनता उन्नयन पार्टी (एजेयूपी) जैसे छोटे मुस्लिम संगठन जो ‘‘स्वतंत्र राजनीतिक नेतृत्व’’ बनाने की बात किया करते थे, वे वक्फ कानून, अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) आरक्षण और मदरसा भर्ती को लेकर नाराजगी के सहारे राज्य की लगभग 110 मुस्लिम बहुल सीट पर तृणमूल कांग्रेस के अल्पसंख्यक आधार में सेंध लगाने में सक्षम दिख रहे थे।
लेकिन राजनीतिक विश्लेषकों और अल्पसंख्यक नेताओं का कहना है कि विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) के दौरान 91 लाख से अधिक नाम हटाए जाने (जिनमें से लगभग एक तिहाई मुस्लिम माने जाते हैं) के बाद एआईएमआईएम-एजेयूपी गठबंधन के टूटने, कबीर पर कथित स्टिंग वीडियो के सामने आने और भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) द्वारा समान नागरिक संहिता (यूसीसी) लागू करने के वादे के बाद माहौल में नाटकीय रूप से बदलाव आया।
उन्होंने कहा कि इसका नतीजा यह है कि 2026 का चुनाव एक बार फिर 2021 के चुनाव जैसा दिखने लगा है, जिसमें अल्पसंख्यक मतदाताओं का एक बड़ा वर्ग उत्साह के कारण नहीं बल्कि इस डर से तृणमूल कांग्रेस के पीछे एकजुट हो रहा है कि विभाजित वोट भाजपा को फायदा पहुंचा सकता है।
राजनीतिक विश्लेषक मैदुल इस्लाम ने कहा, ‘‘अल्पसंख्यक मतदाताओं में कुछ क्षेत्रों में बिखराव के संकेत दिख रहे थे। लेकिन पिछले तीन हफ्तों के घटनाक्रम ने माहौल को पूरी तरह बदल दिया है। अब अल्पसंख्यक मतदाताओं में यह भावना बढ़ रही है कि वे तृणमूल से चाहे कितने भी असंतुष्ट क्यों न हों, वे अपने वोट को बंटने नहीं दे सकते, जिससे कि भाजपा को फायदा हो।’’
एसआईआर के दौरान नाम हटाए जाने से मतदाताओं की संख्या में लगभग 12 प्रतिशत की कमी आई है, जो इसका सबसे बड़ा कारण है। विभिन्न राजनीतिक दलों द्वारा संकलित आंकड़ों के अनुसार, हटाए गए लोगों में से लगभग 34 प्रतिशत मुस्लिम हैं।
तृणमूल कांग्रेस ने 2021 में उन 89 सीटों में से 87 सीटें जीती थीं जहां अल्पसंख्यक मतदाताओं की संख्या 30 प्रतिशत से अधिक थी और उन 112 सीटों में से 106 सीटें जीती थीं जहां उनकी हिस्सेदारी लगभग 20 प्रतिशत या उससे अधिक थी।
अल्पसंख्यक बहुल उत्तर 24 परगना, दक्षिण 24 परगना, मुर्शिदाबाद और मालदा जैसे जिलों में एसआईआर ने न केवल चिंता पैदा की है, बल्कि समुदाय को एकजुट करने का भी काम किया है।
मुर्शिदाबाद के एक स्कूल शिक्षक इरशाद मुल्ला ने कहा, ‘‘शुरू में कुछ लोग आईएसएफ, कांग्रेस या हुमायूं कबीर को वोट देने के बारे में सोच रहे थे। अब ज्यादातर लोगों को लगता है कि अल्पसंख्यक वोट को बांटने का यह सही समय नहीं है।’’
भाजपा के घोषणापत्र में सत्ता में आने के छह महीने के भीतर समान नागरिक संहिता (यूसीसी) लागू करने के वादे के बाद असुरक्षा की भावना और गहरी हो गई है। भाजपा का कहना है कि यूसीसी का अर्थ सभी नागरिकों के लिए समान कानून है, लेकिन अल्पसंख्यक संगठनों ने इसे मुस्लिम पर्सनल लॉ और पहचान में हस्तक्षेप का प्रयास बताया है।
‘ऑल बंगाल माइनॉरिटी यूथ फेडरेशन’ के महासचिव मोहम्मद कमरुज्जमान ने पहले तर्क दिया था कि छोटी मुस्लिम पार्टियां तृणमूल के समर्थन आधार को कमजोर कर सकती हैं, लेकिन अब उनका कहना है कि राजनीतिक माहौल में अचानक बदलाव आया है।
उन्होंने कहा, ‘‘एसआईआर में नाम को काटे जाने, यूसीसी के वादे और हुमायूं कबीर विवाद के बाद कई अल्पसंख्यकों का मानना है कि चुनाव भाजपा और तृणमूल कांग्रेस के बीच सीधा मुकाबला बन गया है। जब लोगों को लगता है कि उनकी नागरिकता या मतदान का अधिकार खतरे में है, तो वे उस पार्टी के पीछे एकजुट हो जाते हैं जिसे वे अपना रक्षक मानते हैं और एक व्यवहार्य तीसरे मोर्चे के अभाव में तृणमूल कांग्रेस को इससे सबसे ज्यादा फायदा होगा।’’
कोलकाता की नखोदा मस्जिद के इमाम मौलाना मोहम्मद शफीक कासमी ने कहा कि इस मुद्दे ने मुसलमानों में ‘‘गहरी चिंता’’ पैदा कर दी है।
उन्होंने कहा, ‘‘जब वे यूसीसी और हटाए गए नामों की बात सुनते हैं तो उन्हें लगने लगता है कि असली लड़ाई अपनी पहचान और संवैधानिक अधिकारों की रक्षा की है। मुसलमान संभवतः तृणमूल कांग्रेस को वोट देंगे क्योंकि वे उन अन्य पार्टियों को वोट देकर अपना वोट बर्बाद नहीं करना चाहेंगे जो सांप्रदायिक ताकतों से लड़ नहीं सकतीं।’’
एआईएमआईएम-एजेयूपी गठबंधन के टूटने से मुस्लिम राजनीतिक मंच के वैकल्पिक स्वरूप की संभावना कमजोर हो गई है। यह समझौता तब टूटा जब एक कथित वीडियो सामने आया जिसमें कबीर से मिलते-जुलते एक व्यक्ति को अल्पसंख्यक वोट को बांटने और तृणमूल कांग्रेस को कमजोर करने के कथित सौदे पर चर्चा करते सुना गया।
हालांकि कबीर ने इस आरोप का खंडन किया और कहा कि वीडियो को कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई) की मदद से बनाया गया है।
राजनीतिक विश्लेषक सुमन भट्टाचार्य ने कहा, ‘‘एसआईआर हटाए जाने, यूसीसी के वादे और हुमायूं कबीर के प्रयोग की विफलता के बाद अल्पसंख्यक मतदाताओं को ममता बनर्जी के अलावा कोई और व्यवहार्य राजनीतिक विकल्प नजर नहीं आ रहा है।’’
भाषा सुरभि गोला
गोला

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