‘इतिहास की थाली’ में भारतीय खानपान के इतिहास की अनकही कहानियां

‘इतिहास की थाली’ में भारतीय खानपान के इतिहास की अनकही कहानियां

‘इतिहास की थाली’ में भारतीय खानपान के इतिहास की अनकही कहानियां
Modified Date: June 28, 2026 / 05:43 pm IST
Published Date: June 28, 2026 5:43 pm IST

नयी दिल्ली, 28 जून (भाषा) विभाजन के बाद भारत और पाकिस्तान में रसोईघरों के बदलते स्वरूप से लेकर पूर्वी सीमाओं पर भोजन बनाने और खाने के तौर-तरीकों में आये बड़े बदलावों तक, लेखक-पटकथा लेखक अनिमेष मुखर्जी अपनी नयी हिंदी पुस्तक ‘इतिहास की थाली’ में भारतीय उपमहाद्वीप के भोजन के इतिहास से जुड़ी अनेक रोचक, कम चर्चित और अनछुई परतों को पाठकों के सामने खोलते हैं।

अपनी पहली पुस्तक ‘ठाकुरबाड़ी’ में प्रतिष्ठित टैगोर परिवार की कहानी प्रस्तुत करने के बाद मुखर्जी अपनी नयी पुस्तक ‘इतिहास की थाली’ में इतिहास, व्यापार, संस्कृति, पहचान और साजिशों के नजरिये से भारत की विभिन्न खानपान परंपराओं की दिलचस्प यात्रा की पड़ताल करते हैं। पेंगुइन स्वदेश द्वारा प्रकाशित यह पुस्तक भोजन की दुनिया को एक नए परिप्रेक्ष्य में देखने का अवसर देती है।

एक सौ 85 पृष्ठों की यह पुस्तक आठ अध्यायों में विभाजित है। इसमें चाय, कॉफी, बिरयानी और चिकन से बने विभिन्न व्यंजनों समेत कई खाद्य पदार्थों के सामाजिक, आर्थिक और सांस्कृतिक पहलुओं पर प्रकाश डाला गया है। साथ ही, इसमें जाने-पहचाने स्वादों के पीछे छिपे इतिहास और उनकी अनसुनी कहानियों को नए नजरिये से सामने लाया गया है।

खाद्य इतिहासकार पुष्पेश पंत ने पुस्तक की भूमिका में लिखा है, ‘‘यह पुस्तक पाठकों के मन में जमे पूर्वाग्रहों और आत्मसंतोष को तोड़ती है तथा इसमें उठाए गए विषयों के बारे में और अधिक जानने की गहरी जिज्ञासा जगाती है।’’

पंत लिखते हैं, ‘‘मसलन, यह पुस्तक बताती है कि किस तरह बहुराष्ट्रीय कंपनियां भोजन और पेय पदार्थों की बिक्री बढ़ाने के लिए शारीरिक भूख को जगाने वाले भद्दे विज्ञापनों का सहारा लेती हैं और उपभोक्तावादी समाज में इच्छाओं को जरूरत में बदलकर राजनीति तक को प्रभावित करती हैं। इस सच्चाई को भूलना या नजरअंदाज करना खतरनाक साबित हो सकता है।’’

‘एक बटा दो’ शीर्षक वाले एक अध्याय में मुखर्जी ने भारत के विभाजन की घटनाओं और उससे जन्मीं नयी पाक परंपराओं तथा व्यंजनों की पड़ताल की है।

मुखर्जी पुस्तक में लिखते हैं, ‘‘1947 में जब देश का विभाजन हुआ तो इस उथल-पुथल ने केवल हमारी सामूहिक पहचान और सामाजिक ताने-बाने को ही नहीं, बल्कि हमारे खानपान को भी गहराई से प्रभावित किया। कई नयी खानपान की आदतें हमारी जिंदगी का हिस्सा बन गईं, कुछ पुरानी परंपराएं अप्रासंगिक हो गईं और कई व्यंजन इतने लोकप्रिय हो गए कि सदियों से चली आ रही खाद्य परंपराओं का स्वरूप ही बदल गया।’’

लेखक इसके बाद बटर चिकन को लेकर पीढ़ियों से चली आ रही उस बहस की पड़ताल करते हैं कि आखिर इस लजीज व्यंजन को सबसे पहले किसने बनाया। पश्चिमी देशों में भारतीय भोजन की पहचान बन चुके इस व्यंजन की उत्पत्ति को लेकर लंबे समय से अलग-अलग दावे किए जाते रहे हैं।

मुखर्जी के अनुसार, इसकी कहानी 1920 के पेशावर से शुरू होती है, जहां कुंदन लाल गुजराल और कुंदन लाल जग्गी नाम के दो युवा ‘मोती महल’ नामक एक छोटे से भोजनालय में काम करते थे।

विभाजन के बाद दोनों की मुलाकात दिल्ली के दरियागंज में हुई और उन्होंने अपना ‘मोती महल’ शुरू करने का फैसला किया। माना जाता है कि यहीं शरणार्थियों को भोजन उपलब्ध कराने के लिए बचे हुए चिकन को टमाटर और मक्खन के शोरबे में पकाकर बटर चिकन तैयार किया गया। हालांकि, वास्तव में किसने इसे सबसे पहले बनाया इसे लेकर आज भी स्पष्टता नहीं है।

गुजराल परिवार लंबे समय से दावा करता रहा है कि उनके पूर्वजों ने ही बटर चिकन के साथ-साथ तंदूरी चिकन, दाल मखनी, चिकन पकोड़ा और पनीर के कुछ लोकप्रिय व्यंजनों को भी सबसे पहले बनाया था।

उधर, जग्गी परिवार भी यही दावा करता है।

मुखर्जी पुस्तक में एक कम चर्चित दावे का भी उल्लेख करते हैं। इसके अनुसार, बटर चिकन का आविष्कार दिल्ली में शरणार्थियों के लिए नहीं, बल्कि पेशावर के ‘मोती महल’ में ब्रिटिश अधिकारियों के लिए पहले ही किया जा चुका था। साथ ही, वह यह संभावना भी जताते हैं कि हो सकता है इस व्यंजन का आविष्कार किसी तीसरे व्यक्ति ने किया हो।

खानपान के इतिहास से जुड़ी ऐसी ही अनेक दिलचस्प और कम चर्चित परतों को उजागर करती ‘इतिहास की थाली’ ऑनलाइन और ऑफलाइन, दोनों तरह के स्टोर पर उपलब्ध है।

भाषा

खारी दिलीप नरेश

नरेश


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