कुल्लू की पार्वती घाटी रेव पार्टियों के लिए सुरक्षित स्थल क्यों मानी जाती है

कुल्लू की पार्वती घाटी रेव पार्टियों के लिए सुरक्षित स्थल क्यों मानी जाती है

कुल्लू की पार्वती घाटी रेव पार्टियों के लिए सुरक्षित स्थल क्यों मानी जाती है
Modified Date: June 29, 2026 / 06:09 pm IST
Published Date: June 29, 2026 6:09 pm IST

(भानु पी लोहुमी)

शिमला, 29 जून (भाषा) रेव पार्टियां अपनी अति-गोपनीयता के लिए जानी जाती हैं और आधुनिक सभ्यता से कोसों दूर कुल्लू की दिलकश पार्वती घाटी दुनिया के उन चुनिंदा स्थलों में शामिल है, जिन्हें ऐसे आयोजनों के लिए बेहद सुरक्षित और मुफीद माना जाता है।

रेव पार्टियां कुछ दिनों तक चलती हैं और ऊबड़-खाबड़ दुर्गम इलाका इनके आयोजकों को सबूत मिटाने के लिए पर्याप्त समय प्रदान करता है।

हिमाचल प्रदेश उच्च न्यायालय ने रेव पार्टियों से होने वाली परेशानियों से निपटने और सार्वजनिक व्यवस्था बनाए रखने में नाकाम रहने के लिए 24 जून को कुल्लू के उपायुक्त, पुलिस अधीक्षक और उप-विभागीय मजिस्ट्रेट के तबादले का आदेश दिया, जिसके बाद से ऐसे आयोजनों का मुद्दा एक बार फिर सुर्खियों में है।

यह आदेश कसोल के पास ग्रहण गांव में स्थित ‘ग्रीन फॉरेस्ट-1’ और ‘ग्रीन फॉरेस्ट-2’ कैंपिंग स्थल में सात से 11 जून तक आयोजित एक कार्यक्रम के सिलसिले में जारी किया गया, जिसमें प्रवेश के लिए टिकट प्रणाली लागू की गई थी।

जिला विधिक सेवा प्राधिकरण (डीएलएसए) की ओर से पेश रिपोर्ट के मुताबिक, आयोजन स्थल एक सघन एकांत वन क्षेत्र था, जहां लगभग 50 टेंट, निजी सुरक्षा और हजारों लोगों को समायोजित करने में सक्षम बुनियादी ढांचा मौजूद था।

अदालत के हस्तक्षेप के बाद पुलिस ने आयोजन स्थल पर छापा मारा और दो पर्यटकों को गिरफ्तार किया, जिनके पास से कोकीन और एलएसडी बरामद हुई।

पुलिस के मुताबिक, आयोजन में डीजे के तौर पर प्रस्तुति दे रहे रूसी नागरिक कारिया कुजमिनिख की मादक पदार्थों के अत्यधिक सेवन के कारण मौत होने का संदेह है।

रेव पार्टियों के खिलाफ लंबे समय से आवाज उठा रहे ‘नशा निवारण बोर्ड’ के पूर्व संयोजक ओपी शर्मा का कहना है कि क्षेत्र में 1990 के दशक से ही मादक पदार्थों के सेवन की समस्या रही है।

शर्मा ने सोमवार को ‘पीटीआई-भाषा’ से बातचीत में कहा कि यह इलाका पहले से ही ‘मलाणा क्रीम’ (मलाणा गांव में उगाई जाने वाली और हाथों से रगड़कर बनाई गई उच्च गुणवत्ता वाली चरस) के दुरुपयोग के लिए कुख्यात था और समय के साथ-साथ यहां कृत्रिम मादक पदार्थों का चलन भी बढ़ गया।

उन्होंने कहा, “मनाली में रेव पार्टियां कोई नयी बात नहीं हैं और यह परंपरा 1990 के दशक से चली आ रही है। एलएसडी और एमडीएम जैसे नशीले पदार्थों ने इस क्षेत्र में बहुत पहले ही अपनी पैठ बना ली थी।”

शर्मा ने मादक पदार्थों के इस्तेमाल और रेव पार्टियों के आयोजन में वृद्धि के लिए कानून-व्यवस्था और खुफिया तंत्र की विफलता को कसूरवार ठहराया।

उन्होंने कहा, “पैसा कमाने के लिए स्थानीय लोगों की सामाजिक-सांस्कृतिक प्रवृत्ति ने भी इस समस्या में योगदान दिया है।”

शर्मा ने स्वापक नियंत्रण ब्यूरो (एनसीबी), चंडीगढ़ जोनल इकाई के अधीक्षक के रूप में 2002 से 2006 के बीच मलाणा, मणिकर्ण, तोश, बंजार, कसोल, मैजिक, विचिन, पिंसू, थिचो, मलंदर, अवगल थार और आसपास के क्षेत्रों में लगभग एक दर्जन अभियान चलाए और कई अपराधियों को गिरफ्तार किया।

उन्होंने कहा कि एनसीबी ने 2007 के बाद घाटी में अभियान क्यों बंद कर दिए, यह एक और बड़ा सवाल है।

शर्मा के अनुसार, गरीबी और बुनियादी ढांचे की कमी, साथ ही आदर्श जलवायु और स्थलाकृति के कारण भांग की खेती को बढ़ावा मिला, खासकर कसोल में, जो राज्य में नशीले पदार्थों के सभी अड्डों की जननी है।

उन्होंने बताया कि धीरे-धीरे विदेशी हाइब्रिड भांग के बीजों के साथ पार्वती घाटी में दाखिल हुए और यहां ​​कि महिलाओं के साथ शादी रचाकर मादक पदार्थों का संगठित कारोबार शुरू किया।

शर्मा ने कहा कि क्षेत्र में नशीले पदार्थों के सेवन और रेव पार्टियों के आयोजन की संस्कृति के फलने-फूलने में वन विभाग और विदेशी निवासी कार्यालय की भूमिका की भी जांच होनी चाहिए।

उन्होंने कहा कि मादक पदार्थ तस्करों की गिरफ्तारी कम होना भी इस समस्या में वृद्धि के लिए जिम्मेदार है, क्योंकि पार्वती नदी के किनारे खुलने वाले संकरे, घुमावदार रास्ते तस्करों को भागने का सुरक्षित रास्ता प्रदान करते हैं।

शर्मा के मुताबिक, दूसरा बड़ा कारक गोपनीयता है। उन्होंने कहा कि साधारण पर्यटक तो छोटे कैफे में भी पार्टी का लुत्फ उठा लेते हैं, लेकिन ‘रेव’ पार्टी के बहुत ज्यादा शौकीन लोग ऐसे आयोजनों का रुख करते हैं।

हालांकि, शर्मा ने कहा कि ये छोटी पार्टियां अब कॉर्पोरेट आयोजनों में तब्दील हो गई हैं और आयोजन स्थलों के आकार में भी इसी तरह का बदलाव आया है, जो छोटे खुले स्थानों से बड़े, घने जंगलों और यहां तक ​​कि निजी रिजॉर्ट में स्थानांतरित हो गए हैं।

उन्होंने कहा कि इस तरह के आयोजनों के लिए इजाजत मांगते समय कोई भी “रेव पार्टी” शब्द का इस्तेमाल नहीं करता, बल्कि “सांस्कृतिक कार्यक्रम” का हवाला देता है, जिससे सभी अनुमतियां आसानी से मिल जाती हैं।

स्थानीय होटल व्यवसायी और सामाजिक कार्यकर्ता अमन सिंह सूद कहते हैं, “स्थानीय लोग रेव पार्टियों का पूरी तरह से विरोध करते हैं, जो अल्पावधि में आकर्षक लग सकती हैं, लेकिन लंबी अवधि में हम नहीं चाहते कि पर्यटक इस घाटी की यात्रा को ‘ड्रग्स टूरिज्म’ के लिए याद रखें। हम चाहते हैं कि जब वे इस घाटी की यात्रा के बारे में सोचें, तो उन्हें हमारी समृद्ध सांस्कृतिक परंपराएं याद आएं।”

एक आम रेव पार्टी में प्राकृतिक वातावरण, यूवी लाइट वाली सजावट, सूर्योदय के समय डांस फ्लोर, आर्ट पॉप-अप, टैटू के स्टॉल और अंतरराष्ट्रीय स्तर की भीड़ देखने को मिलती है। ये पार्टियां ज्यादातर कसोल और उसके आसपास के गांवों, जैसे कि ग्रहण, चालाल, कटगला और पुलगा में आयोजित की जाती हैं।

जानकारों के अनुसार, ‘टेलीग्राम’ जैसे सोशल मीडिया ऐप की मदद से आयोजकों के लिए रेव पार्टियों का प्रचार करना आसान हो गया है, जबकि पुलिस को ऐसे आयोजनों का पता लगाने में और मुश्किलों का सामना करना पड़ रहा है।

आंकड़ों के मुताबिक, पिछले तीन वर्षों में हिमाचल पुलिस ने स्वापक औषधि एवं मन:प्रभावी पदार्थ (एनडीपीएस) अधिनियम के तहत 6,246 मामले दर्ज किए हैं और 5,684 मामलों में आरोपपत्र दाखिल किए हैं।

भाषा पारुल संतोष

संतोष


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