लालकृष्ण आडवाणी 90 साल में शून्य से शिखर और फिर सिफर का सफर

Reported By: Aman Verma, Edited By: Aman Verma

Published on 07 Nov 2017 07:42 PM, Updated On 07 Nov 2017 07:42 PM

आप हमेशा शून्य से शिखर तक पहुंचने का सपना देखते हैं और जब आपकी मंजिल मिल जाती है तब आपके जीवन का जो शून्य वाला पड़ाव होता है वो या तो दास्तां होती है या मिसाल, आप फिर से शून्य के दौर में जाने की कल्पना भी नहीं कर सकते। एक दौर में भाजपा के लौह पुरुष कहे जाने वाले वरिष्ठ नेता लालकृष्ण आडवाणी आज अगर पार्टी में मात्र एक मार्गदर्शक की भूमिका में हैं तो इसे शून्य से शिखर और फिर सिफर पर पहुंचना ही कहा जायेगा।  8 नवंबर 1927 को कराची में जन्मे लालकृष्ण आडवाणी ने संगठन के लिए “भारतीय जनसंघ” से “भारतीय जनता पार्टी” तक का सफर तय किया है। कभी मात्र 2 लोकसभा सांसद वाली पार्टी भाजपा आज अगर 284 सीटों के साथ संसद में बहुमत और दुनिया की  सबसे बड़ी पार्टी है तो इसमें आडवाणी का महत्वपूर्ण योगदान है।

 

भाजपा का उदय और हिन्दुत्व के तौर पर हुई प्रज्ज्वलित

अटल बिहारी वाजपेयी भाजपा के प्रथम अध्यक्ष थे और उनके नेतृत्व में भाजपा संगठन के रूप में चर्चित तो हुई लेकिन उतनी मजबूती नहीं पा सकी, नतीजा ये निकला कि उसे सफलता के तौर पर सिर्फ दो सीटें प्राप्त हुई। अटल बिहार वाजपेयी के बाद आडवाणी को पार्टी का अध्यक्ष घोषित किया गया,  आडवाणी के नेतृत्व में भाजपा प्रखर हिंदुत्व का मुद्दा उठाया और राम जन्मभूभि के मुद्दे को राष्ट्रीय जनभावना से जोड़कर रथ यात्रा निकाली। इस रथ यात्रा ने भाजपा को लोकसभा में उस वक्त की सबसे बड़ी पार्टी के रूप में स्थापित किया। बड़ी बात ये है कि राम जन्मभूमि आज भी भाजपा का राजनीतिक मुद्दा बना हुआ है।

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देश में राजनीतिक तौर पर सबसे ज्यादा रथ यात्राएं निकालने वाले आडवाणी एकमात्र नेता हैं। उनके नतृत्व में कुल 6 यात्राएं निकाली जिसमे सबसे पहली यात्रा थी “राम रथ यात्रा”  इस यत्रा का मुद्दा राम मंदिर निर्माण था। यह यात्रा 25 सितंबर 1990 को गुजरात के सोमनाथ मंदिर से शुरू हुई थी और इसी यात्रा के दौरान आडवाणी को बिहार के समस्तीपुर में गिरफ्तार भी किया गया था। इसके बाद भी आडवाणी ने जनादेश यात्रा, स्वर्ण जयंती रथ यात्रा, भारत उदय यात्रा, भारत सुरक्षा यात्रा और जन चेतना जैसी यात्राओं का मार्गदर्शन किया।

देश के गृहमंत्री

1996 में अटल बिहारी वाजपायी के नेतृत्व में बनी भाजपा की सरकार केवल 13 दिन ही चल सकी और इस 13 दिन की सरकार में आडवाणी देश गृहमंत्री बने. 1998 में भाजपा फिर सत्ता में आई और फिर आडवाणी देश के गृहमंत्री बने लेकिन यह सरकार भी 13 महीने ही चली लेकिन अगले चुनाव में मिली जीत  के चलते भाजपा की सरकार 2004 तक चली और इस दौरान आडवाणी देश के उप- प्रधानमंत्री रहे।

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2004 से 2009 तक भाजपा के वरिष्ठ एवं अनुभवी नेता होने के नाते वे प्रधानमंत्री के प्रबल दावेदार भी रहे। 2009 में आडवाणी को मनमोहन सिंह के खिलाफ बीजेपी के पीएम दावेदार के रूप में देखा जा रहा था, लेकिन जनादेश यूपीए के पक्ष में आया और आडवाणी पीएम इन वेटिंग बने रह गए। 

 

मार्गदर्शक  

2014 के लोकसभा चुनाव में बीजेपी ने जब गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री दावेदार बनया तो आडवाणी ने मोदी के खिलाफ मोर्चा खोल दिया। इसके बाद आडवाणी को भाजपा संसदीय बार्ड से बाहर का रास्ता दिखाकर उन्हें मार्गदर्शन मंडल का सदस्य बना दिया गया. बाद में चर्चा ये चली कि आडवाणी को राष्ट्रपति का दावेदार बनाया जा सकता है, लेकिन यहां भी उन्हें निराशा हाथ लगी। आज भी आडवाणी भाजपा में हैं, लेकिन राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि अब वो अपनी ही पुरानी छवि की छाया बनकर रह गए हैं।

 

अर्जुन सिंह, IBC24

Web Title : Advani : The iron man of Indian politics now reduced to a mere shadow.

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