बस्तर की बिसात में कौन मारेगा बाजी? यहां जीत से मिलती है सत्ता की चाबी

Reported By: Pushpraj Sisodiya, Edited By: Pushpraj Sisodiya

Published on 22 Jan 2018 03:39 PM, Updated On 22 Jan 2018 03:39 PM

स्तर में जीत के साथ ही छत्तीसगढ़ की सत्ता का द्वार खुलता है. शायद यही वजह है कि बस्तर इन दिनों अचानक ही सियासी गतिविधियों के केंद्र में आ गया है । सारी पार्टियां इस आदिवासी बहुल इलाके की ओर कूच कर रही हैं. इसी कड़ी में भाजपा के राष्ट्रीय सह संगठन महामंत्री सौदान सिंह ने तीन दिनों के लिए बस्तर में डेरा डाल दिया है. 

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छत्तीसगढ़ में भले ही चुनाव करीब साल भर बाद हो लेकिन उससे पहले ही पार्टियों के बीच जोर आजमाइश शुरु हो गई है प्रदेश में बीजेपी तीसरी पारी खेल रही है और चौथी बार सरकार बनाने के लिए आतुर है. लेकिन इस बार उसके सामने कड़ी चुनौती कांग्रेस ही नहीं बल्कि कांग्रेस से टूटकर बनीं जोगी कांग्रेस भी है और इस बार बीजेपी के लिए ये राह इसलिए भी आसान नहीं है क्योंकि बीजेपी को चौथी बार सरकार बनाने के लिए बस्तर को साधना पड़ेगा.

       

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क्योंकि यहीं से मिलती है सत्ता की चाभी. इसी के मद्देनजर बीजेपी ने अभी से बस्तर पर फोकस करना शुरू कर दिया है. इसका अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि 28 से 30 दिसंबर तक राष्ट्रीय सह संगठन महामंत्री सौदान सिंह तीन दिनों तक बस्तर में डेरा डालेंगे और सभी 12 विधानसभा सीटों की बूथों की समीक्षा करेंगे. इस दौरान वे जगदलपुर के अलावा कोंडागांव और नारायणपुर में पार्टी नेताओं और पदाधिकारियों की बैठक भी लेंगे। सौदान सिंह के साथ संगठन महामंत्री पवन साय और प्रदेशाध्यक्ष धरमलाल कौशिक सहित कई मंत्री भी उनके साथ बस्तर दौरे में मौजूद रहेंगे. इसकी शुरूआत गुरुवार को कोंडागांव जिले से हुई। 

       

कांग्रेस की बात करें तो. छले चुनाव में कांग्रेस ने यहां बीजेपी पर बढ़त हासिल की थी. उसे 12 में से 8 सीटें मिली. जबकि बीजेपी को महज 4 ऐसे में 2018 के लिए उनकी उम्मीदें बढ़ी हुई हैं. 

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आदिवासी परंपरागत कांग्रेसी वोटर रहे हैं. कांग्रेस अपने इस वोट बैंक को फिर से हासिल करना चाहती है । कुछ महीने पहले राहुल गांधी ने बस्तर दौरा कर अपने कार्यकर्ताओं को यही संदेश देने की कोशिश की थी. उसी वक्त तय हो गया था कि बस्तर संभाग की पूरी सीटों को जीतने के लिए राहुल गांधी के फार्मूला को अपनाया जाएगा।

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इसी कड़ी में प्रदेश प्रभारी पीएल पुनिया भी लगातार बस्तर में नक्सली घटना,मानवधिकार हनन और बेरोजगारी जैसे मुद्दों को लेकर आदिवासियों के साथ मिलकर सरकार को घेरने का प्रयास कर रहे है । कांग्रेस की पूरी कोशिश है कि इन मुद्दों को अपनी जीत में तब्दील की जाए। दरअसल बस्तर में जनाधार का मतलब है. पूरे आदिवासी समुदाय का समर्थन हासिल होना. सियासी पार्टियां में तो तगड़ी होड़ लग गई है लेकिन अब सवाल ये है कि खुद बस्तर किस दल को टिकने की ज़मीन देने वाला है? 

 

वेब डेस्क, IBC24

 

Web Title : BJP leaders in Bastar camp

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