पार्टी के ‘बड़ों के’...’अपनों को’ कड़े सियासी मैसेज...?

  Blog By: Puneet Pathak

देश की राजनीति के दो ध्रुव...दो प्रमुख दल,भारतीय जनता पार्टी और कांग्रेस...एक देश के इतिहास का सबसे पुराना राजनैतिक दल तो दूसरा दुनिया की सबसे बड़ी पार्टी...दोनों के शीर्ष नेता भारतीय लोकतांत्रिक व्यवस्था में दो अलग तरह की सियासी मिसाल पेश करते हैं...दोनों की राजनीति भिन्न-भिन्न,दोनों की एप्रोच अलग-अलग,दोनों की सोच भी जुदा-जुदा...।

ये दौर है मोदी का देश की जनता ने प्रचंड बहुमत के साथ उन्हें फिर से देश की कमान सौंपी है,उनकी लोकप्रियता,उनकी सर्वप्रियता पर अब कोई संदेह नहीं कर सकता (बशर्ते आप किसी राजनैतिक चश्मे से इसे ना देखें)। भले ही दोनों नेताओं के चेहरे को सामने रखकर 2019 का आम चुनाव लड़ा गया हो लेकिन ये बात भी सर्वविदित है कि इन दोनों नेताओं की तुलना करना बेमानी है...दोनो की पृष्ठभूमि,राह,संघर्ष और तजुर्बा अलग-अलग है...लेकिन यहां इस दौर में जब एक नेता देश और दुनिया में एक नई छवि गढ़ रहा है...वहीं दूसरा नेता अपने दल के सामने कुछ जायज सवाल रख रहा है...आज बात इसकी करते हैं।

जीत का सेहरा पहनने वाले नेता अक्सर हार का ठीकरा दूसरों पर फोड़ा करते हैं इसमें कुछ नया नहीं है। एक तरीके से देखा जाए तो सियासत और जीवन दोनों का फलसफा है बीती बात भूलकर आगे बढ़ना...लेकिन ये भी उनता ही सही है कि हार की सही समीक्षा किए बिना क्या जीत की फॉर्मूया मिल सकता है ? कांग्रेस में पहले भी हार की पारंपरिक समीक्षा की जाती रही हैं...कुछ तयशुदा कारण गिनाए जाते हैं...सुविधाजनक लोगों पर दोष मढ़ा जाता है..और फिर आगे की राह देखी जाती है। अरसे बाद ऐसा हो रहा है कि देश के सबसे पुराने दल कांग्रेस के सबसे युवा राष्ट्रीय अध्यक्ष जिसे विपक्ष सबसे इमैच्योर ठहराता है वो ठहराव के साथ अपनी जिम्मेदारी मानते हुए अध्यक्ष पद छोड़ने का एलान कर उस पर अडिग दिख रहा है और जब पार्टी के दिग्गज या यूं कहें जिम्मेदार उन्हें तमाम सियासी तर्कों से हार की समीक्षा में निर्दोष ठहराने की कोशिश में जुटे तो उन्हें भी आईना दिखाया और एक साहसी सवाल रखा कि…’’तो फिर कोई और जिम्मेदारी क्यों नहीं लेता?’’ राजनीति में,खास तौर पर चुनावी राजनीति में हर चीज साझी होती है लेकिन अगर जीत का मुकुट किसी माथे बंधता आया है तो फिर हार का टीका किसी ना किसी के मस्तक पर लगना ही चाहिए...। नतीजा सबके सामने है एक के बाद एक पार्टी के जिम्मेदार नेताओं का अपने पद से इस्तीफा देने का सिलसिला चल पड़ा है...पर मक्सद साफ है कि किसी तरह राहुल मान जाएं ।

हालांकि राहुल गांधी के पद छोड़ने की पेशकश के पीछे विरोधी,विश्लेषक और आलोचकों के कई और भी तर्क हैं जिन्हें पूरी तरह से खारिज नहीं किया जा सकता लेकिन ये साहस और इस दौर के राहुल को भी नकारा नहीं जा सकता कि अगर ये राहुल की सोची समझी रणनीति है आगे के लिए तो भी इसमें कुछ मैच्योर संकेत है । संकेत इस बात का कि हर किसी को मौके मिलने की एक सीमा होती है और जब वो सीमा पार हो चले तो ब्रेक लेना या वहां से हटकर सर्वहित में दूसरे को मौका देना ही उचित है...और ऐसा करते हुए राहुल भले ही विरोधियों के निशाने पर हों लेकिन कम से कम कांग्रेसियों के लिए तो तगड़ा सियासी संकेत देते नजर आते हैं।

 अब आते हैं दूसरी तरफ आज के दौर के सबसे बड़े सियासी कद,सबसे मैच्योर नेता की तरफ जो दूर की सोचते हैं और हर बात तोल-मोल कर बोलते हैं...मोदी जी जिन्होंने देश के चुनावी इतिहास की सबसे विराट जीत के बाद फिर से अपनी पारी शुरू कर दी है..। ऐसे महानायक जिन्हें बेशक इस विराट जीत का सबसे कुशल रणनीतिकार कहा जा सकता है...वो भी अपनी पार्टी में कुछ नेताओँ,कुछ सियासी आकाओं को लगातार कड़े संदेश दे रहे हैं...।

ताजा मामला लेते हैं इंदौर-3 से भाजपा विधायक आकाश विजयवर्गीय जिनका राष्ट्रीय स्तर पर सियासी परिचय अभी तक इतना रहा है कि वो भाजपा के राष्ट्रीय महासचिव,मालवा के कद्दावर नेता कैलाश विजयवर्गीय के बेटे हैं...पहली बार पार्टी ने टिकट दिया और मोदी मैजिक के इस दौर में पहली बार आकाश विजयवर्गीय इंदौर-3 से विधायक चुने गए..। वैसे तो आकाश विजयवर्गीय अमूमन शांत प्रकृति के बताए जाते हैं लेकिन बीते सप्ताह उनकी निगम अफसरों की टीम पर बल्लेबाजी की एग्रेसिव तस्वीरों ने उन्हें मालवा के न्यू एंग्रीमेन पॉलीटीशिय़न के तौर पर पेश किया...आकाश के मुताबिक ये उनका लाइन ऑफ एक्शन है पहले आवेदन,फिर निवेदन और फिर दे दना दन...अब ये लाइन ऑफ एक्शन यकायक उपजी अति उत्साही राजनैतिक महात्वाकांक्षा का नतीजा था पारिवारिक ऐग्रेसिव सिसासी विरासत की सोची-समझी रणनीति ये तो आकाश ही बेहतर जानते हैं लेकिन 3 रातें जेल में काटने के बाद बाहर आते ही बकौल खुद उन्हीं के...’’उन्हें जेल जाकर बहुत अच्छा लगा,उन्हें अपने किए पर कोई पछतावा नहीं है और वो उम्मीद करते हैं कि आगे उन्हें बल्ला उठाने की जरूरत ना पड़े...।‘’ इस दौरान और अभी तक पार्टी प्रवक्ताओं से कई बार फोनो,लाइव या डिबेट में जब भी सवाल पूछा गया तो वो बार-बार आकाश विजयवर्गीय को डिफेंड करने के शानदार नए-नए तर्क पेश करते नज़र आए...करते भी क्यूं ना,यही उनका पेशेवर धर्म भी है....पर अब जबकि भाजपा की ऐतिहासिक जीत के सबसे बड़े नायक नरेंद्र मोदी जी ने खुलकर इस लाइन ऑफ एक्शन - पहले आवेदन,फिर निवेदन और फिर दे दना दन को ना केवल खारिज किया बल्कि दो टूक कह दिया कि ना तो ऐसे नेता बर्दाश्त किए जाएंगे और ना उनकी ऐसी हरकत...चाहे वो किसी भी राजनैतिक विरासत की उपज क्यों ना हों...। इस कड़े संदेश के बाद पार्टी प्रवक्ताओं की सकपकाहट समझी जा सकती है...अब क्या कहें ? लेकिन स्थानीय राजनैतिक समीकरण और बड़े सियासी परिवारों का ख्याल रखना भी तो जरूरी है...। खैर,मुद्दा ये नहीं है मुद्दा फिर अपनों को ही कड़े सियासी मैसेज का है। थोड़ा सा और पीछे जाते हैं...चुनावी दौर में देश भर में सबसे चर्चित लोकसभा सीट रही भोपाल में जब से भाजपा ने साध्वी प्रज्ञा सिंह ठाकुर को चुनावी मैदान में उतारा था, तभी से पार्टी और पार्टी प्रवक्ताओं की उन्हें और उनकी उम्मीदवारी को डिफेंड करने की जिम्मेदारी बन गई थी । रही-सही कसर साध्वी खुद पूरी करती रहीं...पहले शहीद हेमंत करकरे पर विवादित बयान फिर राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के हत्यारे नाथूराम गोडसे को देशभक्त था,है और रहेगा बताकर ना केवल साध्वी को खुद चुनाव आयोग की सख्ती का शिकार होना पड़ा बल्कि पार्टी को भी विरोधियों के निशाने पर ला दिया...जब समूचे विरोधियों ने मिलकर भाजपा को ‘गॉड-से लवर्स’ कहकर घेरने का मौका दे दिया...तब फिर हर तीखी-चुभती नज़र पार्टी के जय-वीरू की राष्ट्रीय जोड़ी यानि शाह-मोदी के तरफ घूमी कि वो क्या कहते हैं...वो क्या करते हैं...अमित शाह जो तब पार्टी हाईकमान थे उन्होंने इसे साध्वी का निजी विचार कहकर पल्ला झाड़ा यानि वही टिपिकल सियासी पैंतेरेबाजी की लेकिन पार्टी की डिफेंस लाइन से अलग और ऊपर उठकर तब भी नरेंद्र मोदी ने साध्वी के विवादित बयानों को लेकर कहा कि पार्टी भले ही माफ कर दे मैं दिल से उन्हें(साध्वी प्रज्ञा ठाकुर को) माफ नहीं कर पाऊँगा...खैर,तब चुनावी मजबूरी थी...एक सबसे चर्चित और तय फायनल उम्मीदवार पर पार्टी और मोदी इससे ज्यादा क्या करते...सिवाय इसके कि अति उत्साही,अति उन्मादी अपने नताओँ को आईना दिखाते हुए कड़ी नसीहत दे दें..।

वैसे,बात चाहे महानायक नरेंद्र मोदी की पहले साध्वी और अब आकाश विजयवर्गीय पर कड़ी प्रतिक्रिया से उपजे कड़े संदेश की हो या फिर खुद अपने इस्तीफे पर अड़कर जिम्मेदारी तय करने के कड़े सियासी संदेश देने वाले कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी की...कहते हैं ना सियासत में कोई भी,कभी भी ना तो पूरा सही हो सकता है और ना पूरा गलत...सो इन दोनों नेताओँ की नाराजगी पर भी विरोधियों ने तरह-तरह के ‘शंका बाण’ छोड़कर ‘मंशा पर सवाल’ दाग रखे हैं...।

कसौटी पर अब पार्टियों के एक्शन भी हैं....क्या वाकई राहुल पार्टी की कमान छोड़ेगें या आमूल-चूल पार्टी के सियासी सर्जरी करेंगे...तो दूसरी तरफ क्या सिर्फ मोदी की नाराजगी से काम चलाया जाएगा या फिर वाकई आकाश विजयवर्गीय और साध्वी पर कोई रियल एक्शन की प्रैक्टिकल मिसाल कायम होगी...। देखते हैं....         

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