डाॅ.ए.पी.जे अब्दुल कलाम - सपने देखो, क्योंकि महान सपने देखने वालों के सपने हमेशा पूरे होते हैं

Reported By: Aman Verma, Edited By: Aman Verma

Published on 15 Oct 2017 01:39 PM, Updated On 15 Oct 2017 01:39 PM

अबुल पकीर जैनुलाबदीन अब्दुल कलाम, या डॉ.ए.पी.जे. अब्दुल कलाम या मिसाइल मैन कहना ज्यादा उचित होगा। भारत के राष्ट्रपति के पद को सुशोभित कर चुके इस परमाणु वैज्ञानिक की आज 86वीं जयंती है। उनके योगदान के लिए सम्पूर्ण भारत उन्हे श्रद्धा एवं गौरव के साथ याद कर रहा है। डाॅ कलाम का जन्म 15 अक्टूबर 1931 में रामेश्वरम के मध्यमवर्गीय तमिल मुस्लिम परिवार में हुआ था। इन्होंने अपनी प्रारम्भिक शिक्षा रामेश्वरम में सम्पन्न की। इसके बाद ये आगे की पढ़ाई के लिए रामनाथपुरम आ गये। यहीं के श्वाटर्ज हाई स्कूल में इन्होंने प्रवेश ले लिया। उनके पिता चाहते थे कि वे कलेक्टर बने, किन्तु कलाम की रुचि अन्तरिक्ष विज्ञान में थी। वे बचपन से ही आकाश में पक्षियों के उड़ने के रहस्यों के प्रति जिज्ञासु रहते थे। सेंट जोसेफ कॉलेज से बी.एस.सी के बाद मद्रास इंस्टीटयूट ऑफ टेक्नोलॉजी में दाखिले का प्रयास किया। इसके लिए 1,000 रुपयों की जरूरत थी। उनकी बहन जोहरा ने अपना हार तथा कड़ा गिरवी रखकर यह रकम जुटायी। जिसके बाद मेहनत और लगन से उन्होंने छात्रवृत्ति पाकर पढ़ाई का खर्च पूरा किया। एम.आई.टी. प्रशिक्षु के रूप में वे हिन्दुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड बैंगलुरू चले आये। यहां इंजन मरम्मत के साथ-साथ व्यावहारिक ज्ञान को सीखा। यहां ”दहन के बाद” (ऑफ्टर बर्निंग) के सिद्धान्त पर तथा कन्ट्रोल सिस्टम पर काम किया।

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एच०ए०एल० से वैमानिकी इंजीनियर बनकर निकलने के बाद वायुसेना में भरती होने की इच्छा से साक्षात्कार देने में जुट गये। इस परीक्षा में मिली असफलता ने उन्हें सिखाया कि ”असफलताओं से निराश नहीं होना चाहिए। दिल्ली लौटकर इन्होंने 250 रुपये के मूल वेतन पर वरिष्ठ वैज्ञानिक सहायक के पद का कार्य संभाल लिया। विभिन्न वैज्ञानिक परियोजनाओं में अपनी सक्रिय भागीदारी निभाते हुए कलाम ने ”हावर क्राफ्ट नन्दी” का मॉडल तैयार किया, जो अपनी उड़ान में सफल रहा। अब इनकी नियुक्ति टी.आई.एफ.आर. कम्प्यूटर केन्द्र भारतीय अन्तरिक्ष अनुसंधान के लिए हो गयी। यहां पर थुम्बा के रॉकेट प्रक्षेपण केन्द्र की स्थापना हेतु की शुरूआत की। इसकी तकनीकी जानकारी के लिए ‘नासा’ अमेरिका चले गये। नासा से लौटकर 21 नवम्बर 1963 को भारत का नाइक अपाची नाम का रॉकेट छोड़ा, जिसका प्रक्षेपण सफल रहा। प्रो० विक्रम साराभाई के साथ काम करते हुए इन्होंने रॉकेट निर्माण एवं प्रक्षेपण सुविधाओं हेतु स्वदेशी तकनीकी की आवश्यकता महसूस की। इससे सम्बन्धित इन्होंने बड़े-बड़े कार्यक्रम व परियोजनाओं की शुरूआत की

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आर०एस०आर० एस०एल०वी० उपग्रह को कक्षा में स्थापित करने का काम किया । रोहणी तथा मेनका उपग्रह को 20 नवम्बर 1967 में छोड़कर स्वदेशी तकनीकी प्रयोग में लायी। इस तकनीक से उत्साहित होकर तत्कालीन प्रधानमन्त्री श्रीमती इन्दिरा गांधी ने भारतीय उपग्रहों के विकास तथा उड़ान प्रणाली हेतु स्वदेशी तकनीकी पर जोर दिया।

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भारत अब उपग्रह प्रणाली में आत्मनिर्भर हो चुका था कलामजी का जीवन के सम्बन्ध में भी काफी उदार दृष्टिकोण थे। उनका कहना है - ”इस संसार में कुछ लोग ऐसे होते हैं, जो अपने को संसार के अनुकूल जीने के लिए ढाल लेते हैं, लेकिन कुछ ऐसे होते हैं, जो दुनिया को अपने अनुरूप बनाने में लगे रहते है। दुनिया में सारी तरक्की दूसरे तरह के लोगों पर निर्भर होती है। इस संसार में बुद्धिमान् वही है, जो स्वयं को जान ले। असफलताएं ही सफलता का मार्ग प्रशस्त करती हैं। कठिनाइयां हमें आगे बढ़ने की चुनौती देती हैं।

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उनका मानन था कि प्रत्येक मनुष्य को सामाजिक असमानता और साम्प्रदायिकता के विष से दूर रहना चाहिए। प्रत्येक व्यक्ति के भीतर विलक्षण व्यक्तित्व छिपा है, उसकी तलाश करनी चाहिए। प्रत्येक व्यक्ति को ईश्वर ने कुछ सृजनात्मक कर्म करने हेतु भेजा है। ”हे भारत के नवयुवको ! अगर स्वप्न नहीं होंगे, तो क्रान्तिकारी विचार नहीं होंगे और विचार नहीं होंगे, तो कर्म सामने नहीं आयेगा । अतः हे अभिभावको! हे अध्यापको! बच्चों को स्वप्न देखने की इजाजत दो। स्वप्नों पर ही सफलता टिकी है।”

Web Title : Dr. A. P. J. Abdul Kalam - Look dream, Because the dreamers of the great dreamers are always perfec

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