अस्पताल-जनता जिम्मेदारी समझती..तो बच सकती थी जान..

Reported By: Abhishek Mishra, Edited By: Abhishek Mishra

Published on 24 Oct 2017 05:10 PM, Updated On 24 Oct 2017 05:10 PM

भोपाल में आज एक ऐसा दृश्य दिखा. एक ऐसा सीन बना. जिसने मानवता को फिर शर्मसार कर दिया. संवेदनशील होने का दावा करने वाले समाज को फिर बेनकाब कर दिया.  धरती के भगवान कहे जाने वालों का पत्थर दिल रूप दिखा दिया और इन सब के बीच एक जिंदगी खत्म हो गई.

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एक बीवी बेवा हो गई. और दो मासूम बच्चों के सिर से पिता का साया हमेशा के लिए उठ गया और उठ गया उनका विश्वास मानवता से  संवेदना से.

बस से नीचे पड़ी ये लाश सामने अस्पताल. तमाशबीन भीड़. वीडियो  बनाते लोग और अपने पति की लाश पर सिर रख रोती बिलखती ये महिला... दर्दनाक हादसे का ये दृश्य है भोपाल का.  मानवता को शर्मसार कर देने वाला ये सीन है भोपाल का.. संवेदनहीनता का दृश्य है भोपाल का.

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शर्म करो. शर्म करो. अरे कुछ तो शर्म करो. संवेदना होती. ये सीन नहीं बनता. अस्पताल वाले दौड़े भागे चले आते... तो ये दृश्य नहीं बनता... जनता वीडियो बनाने के बजाय इसकी सुध ले लेती... तो शायद ये नजारा नहीं बनता...

लेकिन ये सीन बना. दर्द का ये दृश्य उभरा... बीवी बेवा हो गई और ये बच्चे अनाथ.. शर्म करो... शर्म करो.  हादसे का शिकार दिनेश यादव नरसिंहपुर का रहने वाला था. जो मजदूरी कर अपना और अपने परिवार का पेट पाल रहा था. रोज की तरह चाय पीने आया था. लेकिन एक निजी स्कूल की बस के ड्राइवर की लापरवाही का शिकार हो गया... तेज रफ्तार बस ने इस चौकीदार को कुचल दिया... बुरी तरह जख्मी दिनेश तड़पता रहा. छटपटाता रहा. खून बहता रहा.

सामने ही अस्पताल था... लेकिन वहां के किसी डॉक्टर या दूसरे कर्मचारी ने इसकी सुध नहीं ली. और तो और मौके पर जमा हुई भीड़ भी तमाशा देखती रही... मोबाइल फोन से वीडियो बनाती रही. लेकिन किसी ने तड़प रहे दिनेश को अस्पताल ले जाने की जेहमत नहीं उठाई. असंवेदना के आगे सांसों ने घूटने टेक दिए... और दिनेश ने दम तोड़ दिया. बाद में मौके पर पहुंची पुलिस ने लाश को बस के नीचे से निकाला और जांच की औपचारिकता शुरू हुई पुलिस खुद इस सीन को देखर सन्न रह गई. 

अस्पताल या जनता अपनी जिम्मेदारी समझती... तो एक जान बच सकती थी... लेकिन ऐसा नहीं हुआ... दिनेश मर गया... और मर गई संवेदनाएं... ये शर्मनाक है... शर्मनाक है.

 

राकेश चतुर्वेदी, IBC24, भोपाल

Web Title : The hospital or the public understood its responsibility ... then one could have survived

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