उप्र: अदालत ने हिरासत में मौत के मामलों में मुआवजा देने के संबंध में नियमावली बनाने का निर्देश दिया

उप्र: अदालत ने हिरासत में मौत के मामलों में मुआवजा देने के संबंध में नियमावली बनाने का निर्देश दिया

उप्र: अदालत ने हिरासत में मौत के मामलों में मुआवजा देने के संबंध में नियमावली बनाने का निर्देश दिया
Modified Date: February 20, 2026 / 11:06 pm IST
Published Date: February 20, 2026 11:06 pm IST

लखनऊ, 20 फरवरी (भाषा) इलाहाबाद उच्च न्यायालय की लखनऊ खंडपीठ ने उत्तर प्रदेश सरकार को हिरासत में मौत के मामलों में मुआवजा निर्धारित करने के लिए दिशानिर्देश बनाने का शुक्रवार को निर्देश दिया और जेल हिरासत में जान गंवाने वाले एक युवक के परिजनों को 10 लाख रुपये देने का आदेश दिया।

न्यायमूर्ति शेखर बी. सराफ और न्यायमूर्ति मंजीव शुक्ला की खंडपीठ ने पीलीभीत निवासी प्रेमा देवी की याचिका स्वीकार करते हुए यह आदेश पारित किया जिसमें उन्होंने हिरासत में अपने नाबालिग बेटे की अप्राकृतिक मौत के लिए मुआवजे की मांग की थी।

पीठ ने सुझाव दिया कि दिशा-निर्देश बनाते समय राज्य मृतक की उम्र, आय और आश्रितों जैसे मानकों पर विचार कर सकता है, जैसा कि मोटर वाहन दुर्घटना में मृत्यु के मामलों में अपनाए जाने वाले नियमों में किया जाता है।

याचिका के अनुसार, याची के नाबालिग बेटे के खिलाफ 2016 में पूरनपुर पुलिस ने दुष्कर्म और यौन अपराधों से बच्चों का संरक्षण (पॉक्सो) अधिनियम के तहत मामला दर्ज किया था और वह करीब तीन वर्ष दस माह जेल में रहा। बाद में उसे 12 फरवरी 2024 को जमानत पर रिहा कर दिया गया।

इसमें कहा गया कि इसके बाद उसे अधीनस्थ अदालत में पेश होना था, लेकिन कुछ कारणों से वह ऐसा नहीं कर पाया। बाद में वारंट के तहत उसे गिरफ्तार कर दोबारा जेल भेजा गया, जहां 20 फरवरी 2024 को उसकी मौत हो गई।

एक न्यायिक मजिस्ट्रेट की जांच में निष्कर्ष निकला कि युवक की मौत आत्महत्या से हुई और उसके शरीर पर चोट के कोई निशान नहीं मिले।

हालांकि, पीठ ने माना कि मौत उस समय हुई जब युवक राज्य अधिकारियों की हिरासत और नियंत्रण में था तथा रिकॉर्ड में उपलब्ध साक्ष्यों से स्पष्ट है कि संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत मिले मौलिक अधिकारों का उल्लंघन हुआ।

अपने फैसले में पीठ ने कहा, ‘‘हिरासत में यातना मानव गरिमा का उल्लंघन है, जो पीड़ित के आत्मसम्मान और अस्तित्व को मूल से नष्ट कर देती है। जब भी मानव गरिमा आहत होती है, सभ्यता एक कदम पीछे चली जाती है। जांच प्रणाली से यातना समाप्त करने की सिफारिशों के बावजूद पुलिस हिरासत और जेलों में यातना एवं मौत की बढ़ती घटनाएं चिंताजनक हैं।’’

आदेश में अदालत ने कहा, ‘‘हिरासत में हिंसा और मौतें विधि के शासन की मूल भावना पर प्रहार हैं। राज्य अपनी अभिरक्षा में रखे गए व्यक्तियों के जीवन और स्वतंत्रता का संरक्षक है और उनकी सुरक्षा सुनिश्चित करना उसका दायित्व है।’’

भाषा सं आनन्द खारी

खारी


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