भगवान जगन्नाथ की रथ यात्रा हिंदू धर्म के सबसे बड़े और पवित्र उत्सवों में से एक मानी जाती है। हर साल आषाढ़ शुक्ल द्वितीया को यह यात्रा निकाली जाती है।

इस यात्रा में भगवान जगन्नाथ, उनके बड़े भाई बलभद्र और बहन सुभद्रा तीनों अलग-अलग भव्य रथों में विराजमान होकर नगर भ्रमण करते हैं।

मान्यता है कि भगवान जगन्नाथ अपनी मौसी गुंडिचा देवी के मंदिर जाने के लिए रथ पर सवार होकर निकलते हैं। यह यात्रा भक्तों से मिलने और उन्हें आशीर्वाद देने का प्रतीक मानी जाती है।

स्नान पूर्णिमा के बाद भगवान 15 दिनों तक 'अनासार' (विश्राम) में रहते हैं। इस दौरान उनके दर्शन बंद रहते हैं। स्वस्थ होने के बाद वे रथ यात्रा पर निकलते हैं।

धार्मिक मान्यता के अनुसार, भगवान के रथ को खींचना अत्यंत पुण्यकारी माना जाता है। लाखों श्रद्धालु इस सेवा में भाग लेने की इच्छा रखते हैं।

भगवान जगन्नाथ का नंदीघोष, बलभद्र का तालध्वज और देवी सुभद्रा का दर्पदलन नामक रथ होता है। हर वर्ष इन रथों का नया निर्माण किया जाता है।

रथ यात्रा के दौरान राजा या प्रमुख जनप्रतिनिधि स्वर्ण झाड़ू से रथ के सामने सफाई करते हैं। यह परंपरा बताती है कि भगवान के सामने सभी समान हैं।

कुछ दिनों तक गुंडिचा मंदिर में विराजमान रहने के बाद भगवान की बहुदा यात्रा निकाली जाती है, जिसमें वे वापस श्रीमंदिर लौटते हैं।

पुरी की रथ यात्रा में देश-विदेश से लाखों श्रद्धालु शामिल होते हैं। यह उत्सव श्रद्धा, सेवा, समानता और भक्ति का अद्भुत संगम माना जाता है।