आपके स्नैक्स पर पड़ सकता है जलवायु परिवर्तन का असर

आपके स्नैक्स पर पड़ सकता है जलवायु परिवर्तन का असर

Edited By: , September 14, 2021 / 01:21 PM IST

(चरिथ रत्नायका, यूनिवर्सिटी ऑफ द सनशाइन कोस्ट के मैकेनिकल इंजीनियरिंग में व्याख्याता)

क्वींसलैंड (ऑस्ट्रेलिया), 14 सितंबर (द कन्वरसेशन) ऑस्ट्रेलिया में जलवायु परिवर्तन के कारण बार-बार आ रहे सूखे के परिणामस्वरूप आलू और भी नरम हो जा सकते हैं, सेब सुखाना और मुश्किल हो सकता है तथा मुनक्का की खेती ही खत्म हो सकती है।

यह सुनने में अजीब लग सकता है लेकिन सूखे से फलों और सब्जियों की गुणवत्ता पर असर पड़ सकता है जिससे उन्हें सूखे खाद्य पदार्थ में बदलने मुश्किल होगा। ऑस्ट्रेलिया की खाद्य सुरक्षा और अर्थव्यवस्था पर इसके बड़े असर हैं।

सूखे खाद्य पदार्थ हमारे आहार का एक अहम हिस्सा है और ऑस्ट्रेलिया इसका करीब 77 प्रतिशत निर्यात करता है जिसकी सालाना कीमत 49 अरब ऑस्ट्रेलियाई डॉलर है। अगर सूखे खाद्य पदार्थ का स्वाद, गुणवत्ता और उपलब्धता कम होती है तो हमारे सामने इन आकर्षक बाजारों को खोने का खतरा होगा। लेकिन सुखाने की आधुनिक पद्धतियों पर चल रहे मेरे अनुसंधान का उद्देश्य सावधानीपूर्वक यह नियंत्रण करके इस चुनौती से उबरने में मदद कर सकता है कि कैसे कोशिकाएं अपना आकार और संरचना बदलती है।

सूखे की स्थिति और बिगड़ने की आशंका है:

जलवायु परिवर्तन पर अंतर-सरकारी समिति की हालिया रिपोर्ट में आगाह किया गया है कि पृथ्वी के और गर्म होने से ऑस्ट्रेलिया और शुष्क बन जाएगा जिससे सूखा अधिक पड़ेगा, मिट्टी सूख जाएगी, बड़े पैमाने पर पेड़ सूख जाएंगे आदि।

ज्यादातर पूर्वी ऑस्ट्रेलिया में हाल के सूखों से यह पता चला है कि कैसे जलवायु परिवर्तन खेती के साथ ही समाज और अर्थव्यवस्था पर कहर बरपा सकता है। उदाहरण के लिए जलवायु परिवर्तन के असर के कारण 2001 से 2020 तक खेती लाभ 23 प्रतिशत तक गिर गया।

साथ ही कोविड-19 महामारी ने यह दिखाया कि अनिश्चित पर्यावरणीय, सामाजिक और आर्थिक स्थितियों से जल्दबाजी में लोग खाद्य पदार्थ खरीद सकते हैं जो खाद्य सुरक्षा और खाद्य आपूर्ति की स्थिरता की महत्ता को दिखाता है।

यह महत्वपूर्ण है कि हमारे पास सूखे खाद्य पदार्थ का भविष्य का भंडार उपलब्ध हो क्योंकि चिप्स और सूखे मेवे आस्ट्रेलिया में कई आहार में प्रमुख है।

सूखे का असर सूखे खाद्य पदार्थ पर कैसे पड़ता है?

सुखाने की प्रक्रिया के दौरान फलों और सब्जियों की कोशिकीय सरंचना में महत्वपूर्ण बदलाव होते हैं। कोशिकाएं और ऊतक अधिक सघन रूप में सिकुड़ते हुए अपना आकार बदल सकते हैं। अगर सुखाने की प्रक्रिया को सावधानीपूर्वक नियंत्रित नहीं किया गया तो इससे अवांछित तत्व पैदा हो सकते हैं जो भोजन के स्वाद तथा उसके रंगरूप पर असर डाल सकते हैं जिससे संभावित रूप से उसकी बाजार कीमत तथा पोषण गुणवत्ता कम हो सकती है।

इस तरह सूखा पड़ने से चीजें मुश्किल हो जाती है। हम जानते हैं कि सूखे के कारण झीलों और नदियों में पानी की कमी हो जाती है लेकिन शोध से पता चलता है कि इससे छोटे पौधों की कोशिकाएं एवं ऊतक भी सूख जाते हैं। उदाहरण के लिए सूखे से पौधे जैसे कि सेब और अधिक नरम हो सकते हैं।

सुपरकम्प्यूटिंग के साथ इस समस्या को हल करना:

हम जानते हैं कि सूखे से प्रभावित फसल को सुखाने की प्रक्रिया आसान नहीं हैं। इसका स्वाद भी अकसर अलग होता है और कई बार यह खाने लायक नहीं होता। हम इसे लेकर क्या कर सकते हैं?

सबसे पहले और जरूरी वैश्विक उत्सर्जन में तेजी से और तुरंत कटौती की जाए। लेकिन क्या हो जब यह नहीं हो सकता? इस मामले में हमें प्लान बी की आवश्यकता होगी।

सबसे पहले हमें ठीक तरीके से यह समझने की आवश्यकता है कि पौधे की कोशिकाओं का असल आकार क्या है और पानी की कमी से यह कैसे बदलता है। यह चुनौतीपूर्ण है और इसमें कम्प्यूटर अनुरूपण तथा सुपरकम्प्यूटिंग प्रौद्योगिकियों की आवश्यकता है।

हालांकि इन अनुरूपण के जरिए यह पता लगाना संभव नहीं है कि क्या सुखाने की प्रक्रिया के दौरान ये कोशिकाएं क्षतिग्रस्त हो रही है। ये अनुरूपण सुखाने की आदर्श स्थितियों पर सूचना मुहैया करा सकते हैं। इसका मतलब है कि हम इन प्रतिकूल असर को कम करके तापमान, दबाव, नमी और सुखाने के समय को बेहतर ढंग से उपयोग में ला सकते हैं।

तो अगर हमें निकट भविष्य में बार-बार सूखे का सामना करना पड़ता है तो आपके आलू चिप्स का स्वाद पहले की तरह ही अच्छा रह सकता है।

द कन्वरसेशन गोला गोला शाहिद

शाहिद