सीओपी26 जीवाश्म ईंधन उद्योग के लिए बहुत सी खामियां छोड़ता है

सीओपी26 जीवाश्म ईंधन उद्योग के लिए बहुत सी खामियां छोड़ता है

Edited By: , November 12, 2021 / 12:33 PM IST

जेरेमी मॉस, राजनीतिक दर्शनशास्त्र के प्रोफेसर, यूएनएसडब्ल्यू

मेलबर्न, 12 नवंबर (द कन्वरसेशन) ग्लासगो जलवायु शिखर सम्मेलन को एक सफलता के रूप में आंकने के लिए, इसका एक महत्वपूर्ण परिणाम यह होना चाहिए था कि संबंधित पक्ष इस बात पर सहमत हों कि दुनिया के अधिकांश जीवाश्म ईंधन भंडार को जमीन के भीतर ही छोड़ दिया जाए।

जैसा कि हाल के शोध से पता चलता है कि अगर इस सदी में वैश्विक तापमान वृद्धि को 1.5 डिग्री सेल्सियस की महत्वपूर्ण सीमा के तहत रखने की 50 प्रतिशत संभावना को भी बनाए रखना है तो 89 प्रतिशत कोयले और 59 प्रतिशत गैस भंडार को जमीन में रहने देने की जरूरत है।

शिखर सम्मेलन, सीओपी26, उस महत्वाकांक्षा पर खरा नहीं उतरा है क्योंकि इसमें ऐसी बहुत सी खामियां हैं, जीवाश्म ईंधन उद्योग जिनका फायदा उठा सकता है।

कुछ आशाजनक प्रस्तावों को सामने रखा गया है, जिसमें मीथेन उत्सर्जन में कटौती करने की प्रतिज्ञा, राष्ट्रीय स्तर पर कुछ बढ़े हुए उत्सर्जन में कमी के लक्ष्य, वनों की कटाई की सीमा और जीवाश्म ईंधन के कुछ विदेशी वित्त पोषण को समाप्त करना शामिल है। कल, 13 देशों ने डेनमार्क और कोस्टा रिका के नेतृत्व में अपनी सीमाओं के भीतर गैस और तेल उत्पादन को समाप्त करने के लिए एक नया गठबंधन शुरू किया।

लेकिन अधिकांश प्रस्ताव या तो महत्वाकांक्षा की कमी या प्रमुख देशों की भागीदारी की कमी से ग्रस्त हैं।

मीथेन उत्सर्जन में कटौती के संकल्प का रूस, चीन और ऑस्ट्रेलिया जैसे कुछ सबसे बड़े मीथेन उत्सर्जको ने समर्थन नहीं किया। इसी तरह, कोयले को चरणबद्ध तरीके से समाप्त करने की योजना इंडोनेशिया जैसे कुछ हस्ताक्षरकर्ताओं को कोयले से चलने वाले बिजली संयंत्रों का निर्माण जारी रखने की अनुमति देती है।

इन प्रस्तावों और, वास्तव में, पूरी सीओपी प्रक्रिया, इस तथ्य को साबित करने में विफल रही कि अगर हम सबसे खराब जलवायु परिवर्तन से बचना चाहते हैं, तो हमें जीवाश्म ईंधन का इस्तेमाल बंद करना होगा।

जब तक राष्ट्रीय सरकारें और उनके वार्ताकार जीवाश्म ईंधन लॉबिस्टों के हितों को सुनने के लिए तैयार रहते हैं, सीओपी प्रक्रिया में खामियां बनी रहेंगी जो वास्तविक लक्ष्यों की उपलब्धि को पटरी से उतार देंगी। पांच बड़ी खामियां दिमाग में आती हैं।

1. सब्सिडी और वित्त

यह ग्लासगो फाइनेंशियल अलायंस फॉर नेट ज़ीरो (जीएफएएनजैड) से किया गया है, जो वित्तीय संस्थानों का एक वैश्विक गठबंधन है जिसका उद्देश्य अर्थव्यवस्था के डीकार्बोनाइजेशन में तेजी लाना है।

लेकिन इसके कई प्रयास विफल हो जाएंगे जबकि सरकारें जीवाश्म ईंधन उद्योग को सब्सिडी देना जारी रखेंगी। जीएफएएनजेड उत्सर्जन को रोकने के लिए अपर्याप्त है क्योंकि उत्पादन की लागत और जीवाश्म ईंधन की बिक्री को सब्सिडी देना उद्योग को व्यवहार्य बनाना जारी रखता है।

इसके अलावा जीएफएएनजैड स्वैच्छिक है, जब हम कोई प्रण लेते हैं तो उसे बाध्यकारी होने की आवश्यकता होती है। इसमें वे बैंक भी शामिल हैं जिन्होंने हाल ही में दुनिया के कुछ सबसे बड़े प्रदूषकों को जीवाश्म ईंधन वित्त में 575 अरब अमरीकी डालर प्रदान किए हैं।

2. नया उत्पादन

इस बात के भारी सबूतों के बावजूद कि दुनिया के अधिकांश जीवाश्म ईंधन भंडार जमीन में रहने चाहिए, सरकारें अभी भी नई परियोजनाओं को मंजूरी दे रही हैं। सीओपी26 का मेजबान होने के बावजूद यूके सरकार की 40 जीवाश्म ईंधन परियोजनाएं पाइपलाइन में हैं।

ऑस्ट्रेलिया भी नए गैस और कोयले के विकास को मंजूरी देना जारी रखे हुए है। एनएसडब्ल्यू सरकार ने 2030 तक राज्य के 50 प्रतिशत उत्सर्जन में कमी के लक्ष्य के बावजूद 2018 से आठ नई परियोजनाओं को मंजूरी दी है।

जब तक भविष्य की जलवायु वार्ता नई जीवाश्म ईंधन परियोजनाओं पर प्रतिबंध नहीं लगाती और वर्तमान उत्पादन स्तरों को स्पष्ट और जल्द कम करने पर सहमत नहीं हो जाती, तब तक जीवाश्म ईंधन उद्योग फलता-फूलता रहेगा।

3. हमेशा की तरह व्यापार

जीवाश्म ईंधन उद्योग के लिए एक और खामी यह है कि इसे अपने उत्पादन के विशाल स्तर को जारी रखने की अनुमति इसलिए दी जा रही है क्योंकि इसने (कुछ मामलों में) अपने संचालन को हरित बनाने का वचन दिया है।

कार्बन कैप्चर और स्टोरेज और ऑफसेटिंग जैसे उपायों को कुछ सरकारों ने उद्योग के उत्सर्जन को कम करने के समाधान के रूप में बताया है। लेकिन यदि वे जीवाश्म ईंधन के उत्पादन और उपयोग को खतरनाक स्तरों पर जारी रखने की अनुमति देते हैं तो ये वास्तविक समाधान नहीं हैं।

4. प्रभाव

ये खामियां जो जीवाश्म ईंधन के उत्पादन की अनुमति देती हैं, बेशक इत्तफाकन नहीं है। सीओपी26 में प्रतिनिधियों का सबसे बड़ा समूह जीवाश्म ईंधन उद्योग से था।

जलवायु परिवर्तन के प्रति सरकार के दृष्टिकोण की सबसे चौंकाने और परेशान करने वाली वजह यह है कि नीतियों के निर्धारण पर जीवाश्म ईंधन कंपनियों का प्रभाव है। अन्य मुद्दों (धूम्रपान, शांति वार्ता) के बारे में सोचना मुश्किल है जहां हम इस तरह के प्रभाव को सहन करते हैं।

5 उत्पादन और उत्सर्जन कटौती में संबंध

सीओपी 26 की सबसे भयावह विफलताओं में से एक उत्सर्जन कटौती को उत्पादन कटौती से जोड़ने में विफलता है। यह नॉर्वे जैसे देशों की तुलना में कहीं अधिक स्पष्ट है, जिनके पास प्रभावशाली घरेलू कमी लक्ष्य (2030 तक 55 प्रतिशत) है, फिर भी तेल और गैस के माध्यम से जीवाश्म ईंधन उत्पादन को जारी रखे हुए है।

भविष्य के सीओपी और घरेलू स्तर पर प्रगति की कुंजी इस बात को समझ लेने में है कि कोई भी जीवाश्म ईंधन उत्पादन का समर्थन करते हुए घरेलू उत्सर्जन में कटौती करके जलवायु में सुधार नहीं कर सकता है।

यदि ऑस्ट्रेलिया और नॉर्वे जैसे देश उत्पादन में कटौती पर सहमत नहीं हो सकते हैं, तो हम उन खामियों को देखना जारी रखेंगे जो उद्योग को फलने-फूलने देती हैं।

यदि हम जलवायु परिवर्तन से बचना चाहते हैं तो इस तरह की बहुपक्षीय कार्रवाई, चाहे वह सीओपी के हिस्से के रूप में हो या इसके बाहर – और, महत्वपूर्ण रूप से, इसके कारणों पर ध्यान देना चाहिए।

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