(अमीन सैकाल, द यूनिवर्सिटी ऑफ वेस्टर्न ऑस्ट्रेलिया, विक्टोरिया यूनिवर्सिटी )
सिडनी, नौ जून (द कन्वरसेशन) हाल ही में ईरान और इजराइल के बीच हुए सैन्य हमलों ने अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप पर इस अलोकप्रिय युद्ध को समाप्त करने के लिए घरेलू और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर दबाव और बढ़ा दिया है।
एक विश्लेषण में कहा गया है कि युद्ध की यह स्थिति अमेरिका और इजराइल के लिए चुनौती बन सकती है जिसे ट्रंप ने इजराइल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू के साथ मिलकर करीब तीन महीने पहले शुरू किया था।
विश्लेषण के अनुसार, नेतन्याहू चाहते हैं कि ईरान की रीढ़ तोड़ने तक यह युद्ध जारी रहे जिससे उन्हें आगामी इजराइल चुनावों में राजनीतिक लाभ मिल सके और ‘ग्रेटर इजराइल’ की अवधारणा के तहत क्षेत्रीय दबदबा बढ़ाया जा सके।
युद्ध के इस मोड़ पर, ट्रंप के लिए ‘जीत’ क्या होगी?
वह ऐसा नतीजा चाहते हैं जो युद्ध शुरू करने के उनके फैसले को सही साबित कर सके, जो बहुत महंगा साबित हुआ है और जिससे दुनिया भर में एनर्जी संकट पैदा हुआ है। साथ ही बहुत ज़्यादा आर्थिक नुकसान भी हुआ है। युद्ध इस साल के आखिर में होने वाले मध्यावधि चुनावों में भी ट्रंप के लिए राजनीतिक दिक्कतें खड़ी कर सकता है।
वह ईरान के परमाणु कार्यक्रम पर भी एक समझौता चाहते हैं जिसके बारे में वह दावा कर सकें कि यह 2015 में तेहरान द्वारा ओबामा प्रशासन और उसके अंतरराष्ट्रीय साझेदारों के साथ किए गए समझौते, जिसे संयुक्त व्यापक कार्य योजना कहा जाता है, से बेहतर हो। ट्रंप ने 2018 में अमेरिका को इस समझौते से हटा लिया था।
हालांकि, ईरान अब तक अमेरिकी शर्तों के आगे झुकने को तैयार नहीं दिखा है। विश्लेषण में कहा गया है कि तेहरान ने वैचारिक प्रतिबद्धता, राष्ट्रीयता की भावना और सैन्य क्षमता के सहारे अपनी स्थिति मजबूत की है और वह एक प्रमुख क्षेत्रीय शक्ति के रूप में उभरा है।
ईरान पर आरोप है कि उसने खाड़ी क्षेत्र में अमेरिकी ठिकानों पर हमले किए हैं और इजराइल पर ड्रोन और मिसाइल हमलों के जरिए जवाब दिया है। इसके अलावा, उसने रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण होर्मुज जलडमरू पर अपनी स्थिति को मजबूत किया है, जो वैश्विक तेल और गैस आपूर्ति के लिए अहम मार्ग माना जाता है।
विश्लेषण में यह भी कहा गया है कि संघर्ष ने ईरान के भीतर इस्लामिक सरकार और उसकी सत्ता में नयी जान डाल दी है क्योंकि बाहरी खतरे के चलते कुछ विरोधी नागरिक भी अपने राष्ट्र के प्रति प्रेम के चलते सरकार के पक्ष में एकजुट हुए हैं।
साथ ही, ईरान के इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स की भूमिका और मजबूत हुई है जिसे अमेरिका और उसके कई सहयोगी आतंकवादी संगठन के रूप में वर्गीकृत करते हैं।
लेख में यह भी कहा गया है कि ईरान पूरी तरह अलग-थलग नहीं है, क्योंकि उसे रूस और चीन का समर्थन प्राप्त है और भौगोलिक स्थिति के कारण वह क्षेत्रीय व्यापार मार्गों तक पहुंच बनाए हुए है।
विश्लेषण के अनुसार, अमेरिका और इजराइल के पास सैन्य शक्ति अधिक है और वे ईरान को गंभीर नुकसान पहुंचा सकते हैं, लेकिन ईरान की रणनीतिक स्थिति भी अब पहले से अधिक मजबूत हो चुकी है, जिससे वह वार्ता में बेहतर स्थिति में है।
ईरान के लिए यह लगभग तय है कि वह अपने परमाणु कार्यक्रम या होर्मुज जलडमरू पर नियंत्रण छोड़ने के लिए तैयार नहीं होगा।
लेख में कहा गया है कि ईरान का राजनीतिक ढांचा लंबे समय तक दबाव झेलने और टिके रहने के लिए बनाया गया है, जिससे वह अपने विरोधियों को थकाने की रणनीति अपनाता है।
1979 की गूँज
विश्लेषण में 1979–81 के ईरान बंधक संकट का उल्लेख करते हुए कहा गया है कि उस समय भी ईरान ने अमेरिकी दूतावास पर कब्जे के बाद 66 अमेरिकियों को 444 दिनों तक बंधक बनाकर और संकट को लंबा खींचकर अमेरिका पर मनोवैज्ञानिक और राजनीतिक दबाव बनाया था।
खामेनेई ने उस घटना को 444 दिनों तक खिंचने दिया ताकि वह अपनी ताकत बढ़ा सकें और अपने पूर्ववर्ती मोहम्मद रजा शाह पहलवी की पश्चिमी समर्थक राजशाही का साथ देने के लिए अमेरिका को बेइज्जत कर सकें।
उस घटना का प्रभाव इतना बड़ा था कि तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति जिमी कार्टर चुनाव हार गए थे और बंधकों को रिहा केवल जनवरी 1981 में रोनाल्ड रीगन के शपथ ग्रहण के बाद किया गया था।
लेख में दावा किया गया है कि मौजूदा टकराव अभी शुरुआती चरण में है, लेकिन ईरान इसे लंबे समय तक खींचकर अमेरिका और इजराइल पर दबाव बनाने की रणनीति अपना सकता है।
अंत में विश्लेषण में कहा गया है कि इस पूरे संकट का भविष्य इस बात पर निर्भर करेगा कि अमेरिका और इजराइल आगे क्या कदम उठाते हैं और क्या कोई ऐसा समझौता हो पाता है जो सभी पक्षों के लिए स्वीकार्य हो।
द कन्वरसेशन मनीषा नरेश
नरेश