महासागर सबसे बड़ा जलवायु नियामक, यह जलवायु नीति और कार्रवाई का मजबूत हिस्सा होना चाहिए

महासागर सबसे बड़ा जलवायु नियामक, यह जलवायु नीति और कार्रवाई का मजबूत हिस्सा होना चाहिए

Edited By: , November 26, 2021 / 11:30 AM IST

सारा सीब्रूक, माइक्रोबियल इकोलॉजिस्ट, नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ वॉटर एंड एटमॉस्फेरिक रिसर्च, एलिजाबेथ हॉलैंड, द यूनिवर्सिटी ऑफ द साउथ पैसिफिक, लिसा लेविन, यूनिवर्सिटी ऑफ कैलिफोर्निया सैन डिएगो

वाशिंगटन, 26 नवंबर (द कन्वरसेशन) जर्मन भाषाविद् हेनरिक ज़िमर ने एक बार महासागर को ‘‘अनंत और अमर … पृथ्वी पर सभी चीजों की शुरुआत और अंत’’ के रूप में वर्णित किया था।

किसी भी समुद्र के किनारे खड़े होकर उनकी इस बात को आसानी से महसूस किया जा सकता है। फिर भी, हम दुनिया के महासागरों के भीतर की असंख्य प्रक्रियाओं के बारे में जितना जानते जाते हैं, उतना ही हम यह सवाल करने लगते हैं कि वास्तव में महासागर कितना अथाह और अमर है।

महासागर पृथ्वी के सबसे बड़े जलवायु नियामकों में से एक है। यह उत्सर्जित कार्बन डाइऑक्साइड का लगभग एक तिहाई और अतिरिक्त गर्मी का 90 प्रतिशत से अधिक सोख लेता है। लेकिन संयुक्त राष्ट्र के इंटरगवर्नमेंटल पैनल ऑन क्लाइमेट चेंज (आईपीसीसी) की नवीनतम वैज्ञानिक रिपोर्ट से पता चला है कि समुद्र एक बड़ा बदलाव लाने के महत्वपूर्ण बिंदु के करीब हो सकता है।

महासागरीय अम्लीकरण , वार्मिंग और डीऑक्सीजनेशन (ऑक्सीजन की हानि) के ऐतिहासिक स्तर समुद्री जैव विविधता और महत्वपूर्ण पारिस्थितिकी तंत्र को बुरी तरह से प्रभावित कर रहे हैं।

महासागर को जलवायु नीतियों में शामिल करने की एक महत्वपूर्ण आवश्यकता के बावजूद, जलवायु, महासागर और जैव विविधता के बीच संबंध बनाने का क्रम धीमा रहा है।

इस महीने की शुरुआत में सीओपी26 के दौरान तय किया गया ग्लासगो जलवायु समझौता, एक नए युग की शुरुआत कर सकता है। पहली बार, महासागर को औपचारिक रूप से संयुक्त राष्ट्र जलवायु वार्ता प्रक्रियाओं में शामिल किया गया।

संयुक्त राष्ट्र फ्रेमवर्क कन्वेंशन ऑन क्लाइमेट चेंज (यूएनएफसीसीसी) से भी आग्रह किया गया है कि वह महासागर आधारित कार्रवाई को मजबूत करने के लिए एक वार्षिक महासागर और जलवायु परिवर्तन वार्ता आयोजित करे।

यह वार्षिक बैठक पहली महासागर और जलवायु परिवर्तन वार्ता पर आधारित होगी, जिसके संबंध में 2019 में मैड्रिड में सीओपी25 में अनुरोध किया गया था और इसे 2020 में यूएनएफसीसीसी चर्चा के हिस्से के रूप में वस्तुत: आयोजित किया गया था। इस बैठक से पहले, जलवायु शमन और अनुकूलन के लिए समुद्र से संबंधित प्राथमिकताओं और दृष्टिकोणों पर सबमिशन मांगे गए थे। ।

हमारे पेपर में, हम इन दस्तावेजों और पहली महासागर और जलवायु परिवर्तन वार्ता के गहन विश्लेषण को साझा करते हैं, जिससे इस दिशा में निरंतर प्रगति के लिए मजबूत आधार मिल सके।

यह विश्लेषण सतत विकास के लिए महासागर विज्ञान के संयुक्त राष्ट्र दशक और पारिस्थितिकी तंत्र की बहाली के संयुक्त राष्ट्र दशक पर चर्चा करने के साथ ही हाई सी, या देशों के अधिकार क्षेत्र से परे समुद्री क्षेत्रों के प्रबंधन पर चल रही बातचीत पर भी एक नजर डालता है।

कुल मिलाकर, सरकारों और गैर-सरकारी संगठनों (एनजीओ) से 47 सबमिशन थे। सरकारी सबमिशन यूएनएफसीसीसी के भीतर 197 देशों में से 120 का प्रतिनिधित्व करते हैं, जिनमें ज्यादातर महासागर प्रबंधन और नीति के एक मजबूत इतिहास के साथ तटीय अथवा द्वीपीय राष्ट्रों से थे हालांकि, इस दौरान कई प्रमुख तटीय राष्ट्र अनुपस्थित थे (अमेरिका, चीन, भारत, ब्राजील और रूसी संघ सहित)।

सीओपी26 शिखर सम्मेलन ने वार्ता में सभी समूहों का समावेश न होने का जिक्र किया। विशेष रूप से विकासशील देशों, पर्यवेक्षकों और गैर सरकारी संगठनों के लिए सीमित पहुंच। महासागर और जलवायु परिवर्तन वार्ता के स्वरूप में ही अधिक समावेशी प्रक्रिया की हिमायत की गई है। इसने कई प्रमुख मुद्दों पर सरकारी और गैर सरकारी संगठनों के प्रस्तुतीकरण के बीच विभिन्न दृष्टिकोणों का खुलासा किया।

उदाहरण के लिए, गैर-सरकारी संगठनों ने महासागर पारिस्थितिकी तंत्र के प्रभावों की बात करते हुए अकसर जल जीवों, महासागर परिसंचरण में परिवर्तन, गहरे समुद्र और पीने के पानी के भंडार में खारे पानी के मिल जाने जैसी समस्याओं पर बात की है। महासागर और जलवायु परिवर्तन वार्ता द्वारा उन बिंदुओं पर प्रकाश डाला गया है, जिसपर अधिक ध्यान दिया जाना चाहिए ताकि भविष्य में होने वाले सीओपी शिखर सम्मेलन के दौरान सभी वैश्विक चिंताओं पर बात हो सके।

सभी प्रस्तुतियाँ समाज और समुद्र द्वारा प्रदान की जाने वाली सेवाओं के बीच आंतरिक संबंधों को दर्शाती हैं, मत्स्य पालन से लेकर कार्बन सोखने तक। उन्होंने जलवायु अनुकूलन और शमन और संबंधित नीतियों के बीच कई मुद्दों पर भी प्रकाश डाला।

जैसा कि ग्लासगो जलवायु समझौते में देखा गया है, कई सबमिशन समुद्र, जलवायु और जैव विविधता के मुद्दों में शामिल हो गए। यह केवल वायुमंडलीय या स्थलीय घटकों पर ध्यान केंद्रित करने के बजाय, उन कार्यों और नीतियों पर बढ़ते जोर को दर्शाता है जो जलवायु संकट पर समग्र रूप से विचार करते हैं।

अधिकांश सबमिशन उन नीतियों की आवश्यकता पर प्रकाश डालते हैं जो पारिस्थितिकी तंत्र के लचीलेपन को बढ़ावा देती हैं और महत्वपूर्ण पारिस्थितिकी तंत्र कार्यों का समर्थन करने के लिए जैव विविधता प्रबंधन शामिल करती हैं, जैसे कि कार्बन को बांधना।

इसमें प्रकृति-आधारित समाधान शामिल थे, जैसे तूफानों से तटरेखा संरक्षण बढ़ाने और स्वस्थ मत्स्य पालन को बढ़ावा देने के लिए मैंग्रोव वनों को बहाल करना, और ‘‘ब्लू कार्बन’’ को बढ़ावा देना, जो वनों की तुलना में प्रति इकाई क्षेत्र में अधिक कार्बन को रोकने में सक्षम होते हैं।

महासागर और जलवायु परिवर्तन वार्ता में जलवायु लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए पर्याप्त धन सुनिश्चित करने पर ध्यान केंद्रित किया गया। सभी प्रस्तुतियों में से आधे से अधिक में धन के मुद्दे को संदर्भित किया गया था, लेकिन इसे सरकारों की तुलना में गैर सरकारी संगठनों द्वारा अधिक दृढ़ता से उठाया गया था।

सीओपी26 में वित्त एक महत्वपूर्ण मुद्दा था, जिसे सबसे चुनौतीपूर्ण विषयों में से एक माना गया था और विभिन्न प्रस्तुतियों में वित्त से जुड़े कई पहलुओं को उठाया गया।

महासागर प्रबंधन, शमन और अनुकूलन उपायों के संबंध में प्रस्तुतियाँ में मानवाधिकार के मुद्दों और पारदर्शी, समावेशी, निष्पक्ष शासन (सुशासन) के महत्व का उल्लेख कई बार किया गया।

महासागर और जलवायु परिवर्तन वार्ता और ग्लासगो जलवायु समझौते के माध्यम से एकीकृत जलवायु कार्रवाई की दिशा में निरंतर विकास एक बड़ी जीत है। हालाँकि, संवेदनशील समुद्री पारिस्थितिक तंत्र और उन पर निर्भर लोगों पर गंभीर जलवायु प्रभावों को रोकने के लिए और अधिक काम करने की आवश्यकता होगी।

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