जन्मदर में गिरावट का अभिप्राय स्कूलों का बंद होना और पूरे समुदाय पर प्रभाव

जन्मदर में गिरावट का अभिप्राय स्कूलों का बंद होना और पूरे समुदाय पर प्रभाव

जन्मदर में गिरावट का अभिप्राय स्कूलों का बंद होना और पूरे समुदाय पर प्रभाव
Modified Date: July 29, 2026 / 05:09 pm IST
Published Date: July 29, 2026 5:09 pm IST

(एलिस ब्रैडबरी और एल्नोर फागन, यूनिवर्सिटी कॉलेज लंदन)

लंदन, 29 जुलाई (द कन्वरसेशन) इंग्लैंड में एक और शैक्षणिक वर्ष के समाप्त होने के साथ, बच्चों की घटती संख्या की वजह से कुछ स्कूल हमेशा के लिए बंद हो जाएंगे। देश में गत एक दशक में जन्म दर में गिरावट के कारण 100 से अधिक स्कूल जिनमें से अधिकतर शहरी इलाकों में स्थित थे, हमेशा के लिए बंद हो गए हैं।

हाल के समय में यह घटना अभूतपूर्व है। 2000 के दशक में जब छात्रों की संख्या में कमी आई थी, तो विद्यालयों को बंद करने के बजाय अधिक वित्तपोषण और कम छात्रों वाली कक्षाओं के जरिए उस समस्या का समाधान किया गया था।

स्कूल बंद होने का बच्चों, शिक्षकों और परिवारों पर क्या असर पड़ता है, इसे ठीक से समझा नहीं गया है। शिक्षा विभाग के इस आकलन के अलावा कि देश भर में विद्यालयों में पर्याप्त जगह है, इसकी वास्तविक सच्चाई अक्सर छिपी रहती है।

हम यह पता लगाने के लिए अध्ययन कर रहे हैं कि इन बंद होने रहे विद्यालयों के नजदीक रहने वाले समुदायों पर क्या असर पड़ता है। हमारे विश्लेषण में सामने आया है कि इनका सबसे अधिक प्रभाव उन समुदायों पर पड़ रहा है जो ज्यादा अभाव का सामना कर रहे हैं।

हमने बंद होने की कगार पर पहुंच चुके विद्यालयों में प्रत्येक के प्रधान शिक्षक, स्कूल के दो कर्मचारियों, शासी बोर्ड के अध्यक्ष और अभिभावकों के एक संगठन के प्रतिनिधि से बात की, ताकि यह पता लगाया जा सके कि स्कूल के बंद होने से समुदाय पर क्या असर पड़ेगा।

प्राथमिकी विद्यालयों विशेषकर वे जो मुश्किल हालात और कम सुविधाओं वाले इलाकों में हैं, समुदाय की भावना बनाने में एक खास भूमिका निभाते हैं। स्कूल के शासी निकाय के प्रमुख ने कहा कि विद्यालय के बिना: ‘‘(स्थानीय) पीढ़ियां एक-दूसरे के लिए अजनबी होंगी, क्योंकि स्थानीय समुदाय में एक ऐसी जगह कम हो जाएगी जहां उन्हें एक-दूसरे को जानने का मौका मिलता है।’’

अध्ययन में सामने आया कि यह जुड़ाव तब और भी जरूरी हो जाता है जब स्कूल पिछड़े इलाकों में हों, जहां स्कूल केवल पठन-पाठन से कहीं अधिक सुविधाएं दे सकते हैं। हमने अपने हालिया अनुसंधान में जाना कि कैसे विद्यालयों ने परिवारों को बड़े पैमाने पर मदद दी, जिसमें भोजन बैंक के साथ काम करना, स्कूली वर्दी दान करना और कम कीमत पर नाश्ता क्लब की सुविधा देना शामिल था।

स्थानीय स्कूलों को बचाने के लिए माता-पिता द्वारा चलाए गए और मीडिया में दिखाए गए अभियान से संकेत मिलता है कि ये स्कूल अपने समुदायों के लिए कितने महत्वपूर्ण हैं। हालांकि, कुछ स्कूल बिना किसी खास बहस के चुपचाप बंद हो जाते हैं — खासकर तब, जब वे किसी बहु अकादमी न्यास का हिस्सा हों, क्योंकि ऐसा न्यास बिना किसी औपचारिक सार्वजनिक सलाह-मशविरे के ही स्कूल बंद कर सकता है।

जो समुदाय पहले से ही कई तरह की मुश्किलों का सामना कर रहे हैं, उनके पास स्कूल बंद करने के फैसलों को चुनौती देने के बहुत कम रास्ते हैं। लोगों ने हमें बताया कि सार्थक बातचीत न होने से वे कितने निराश थे। प्रधान शिक्षक ने कहा, ‘‘उस दौरान हमने जो कुछ भी कहा, उससे (स्कूल बंद करने की) प्रक्रिया के किसी भी हिस्से में कोई बदलाव नहीं आया।’’

क्या होता है जब आपका स्कूल बंद हो जाता है ?

हमारे अध्ययन में सामने आया कि स्कूल बंद होने के बाद बच्चों को दूसरी जगहों पर भेजने के मामले में ठीक से सोच-विचार नहीं किया गया। कुछ बच्चों को उनके दोस्तों या सहपाठियों के बिना ही दूसरे विद्यालयों में स्थानांतरित कर दिया गया।

हमने पाया कि अभिभावकों को स्थानीय प्रशासन द्वारा चलाई जाने वाली सामान्य आवंटन प्रक्रिया के जरिए ही नये विद्यालय में अपने बच्चों को प्रवेश दिलाना पड़ता है। इससे उन पर न केवल दोस्तों के साथ जगह पाने का, बल्कि घर से आसानी से पहुंचने लायक स्कूल खोजने का भी भारी दबाव रहता है।

अगर नए स्कूल में जाने के फैसले में सार्वजनिक परिवहन और उससे जुड़ा खर्च भी शामिल हो, तो यह मामला और भी पेचीदा हो जाता है। एक अभिभावक ने कहा, ‘‘मैं काम पर कैसे जाऊंगा? मैं इस नए बदलाव को कैसे संभालूंगा? आप चाहते हैं कि यह बदलाव उनके लिए एक अच्छा अनुभव हो।’’

स्कूल बंद करने पर विचार करते समय छात्रों पर पड़ने वाले इन असर को ध्यान में रखना ज़रूरी है। विशेषतौर पर पांचवीं कक्षा के उन छात्रों के लिए, जिन्हें माध्यमिक विद्यालय जाने से पहले एक साल के लिए दूसरे स्कूल में जाना पड़ा है।

क्या विद्यालयों को कम छात्रों के साथ संचालित करने का विकल्प बेहतर है?

हमारे अध्ययन से यह संकेत नहीं मिलता कि स्कूल कभी बंद नहीं होने चाहिए। बेशक, इस बात का जोखिम है कि कम छात्रों वाले स्कूल को अच्छी शिक्षा के लिए जरूरी शिक्षक, संसाधन और पाठ्यक्रम की विविधता उपलब्ध कराने में मुश्किल हो सकती है। इसके बजाय, हमारा कहना यह है कि कौन-से स्कूल बंद किए जाते हैं, यह मायने रखता है। हम चाहेंगे कि फैसले केवल छात्रों के पंजीकरण के आंकड़ों और आर्थिक स्थिति के आधार पर ही न लिए जाएं, बल्कि जिन समुदायों को सेवा दी जा रही है, उन पर भी अच्छी तरह विचार किया जाए। इसमें पिछड़ेपन का स्तर, विशेष शैक्षिक जरूरतों और दिव्यांग बच्चों की संख्या, जातीय और सांस्कृतिक विविधता और भौगोलिक स्थिति जैसे पहलू शामिल हों।

यदि इन कारकों को नजरअंदाज किया जाता है, तो खतरा यह है कि स्कूल बंद होना शिक्षा का एक और पहलू बन जाएगा जिसमें असमानताएं और भी बढ़ जाएंगी।

स्कूल बंद होने के असर को बेहतर ढंग से समझने के लिए और अध्ययन की बहुत जरूरत है। साथ ही, छोटे विद्यालयों को खुला रखने के असर को भी समझना ज़रूरी है। हालांकि हम अब इस साल कुछ विद्यालयों के बंद होने को लेकर अध्ययन कर रहे हैं, फिर भी इस बढ़ती समस्या और खासकर वंचित बच्चों पर इसके असर को पूरी तरह समझना मुश्किल है, क्योंकि हालात तेजी से बदल रहे हैं और कभी-कभी फैसले लेने की प्रक्रिया स्पष्ट नहीं होती।

हालांकि, हम रेखांकित करना चाहते हैं कि यह मुद्दा केवल शिक्षा क्षेत्र का नहीं, बल्कि व्यापक समाज का है। विद्यालयों वाले मोहल्ले आपस में बेहतर ढंग से जुड़े होते हैं, अधिक जीवंत होते हैं और एक-दूसरे से अधिक सक्रिय समन्वय करते हैं और अधिक कमजोर परिवारों की मदद करने में अधिक सक्षम होते हैं।

स्कूल बंद होने का अभिप्राय केवल एक इमारत खोना नहीं है बल्कि इसका मतलब है एक ऐसी अहम संस्था को खोना जो पूरे समुदाय पर असर डालती है।

(द कन्वरसेशन) धीरज नरेश

नरेश


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