ईरान पर हमले के मामले पर अमेरिकी संसद में होगी चर्चा
ईरान पर हमले के मामले पर अमेरिकी संसद में होगी चर्चा
वाशिंगटन, दो मार्च (एपी) ईरान पर अमेरिका की बमबारी के बाद अमेरिकी संसद युद्ध शुरू करने की राष्ट्रपति की शक्तियों पर चर्चा कर सकती है।
संसद के दोनों सदनों प्रतिनिधि सभा और सीनेट ने इस सप्ताह युद्ध से जुड़ी शक्तियों को लेकर प्रस्ताव तैयार किए हैं, जिनपर बहस के बाद मतदान होना है।
इन हमलों में अमेरिकी करदाताओं का बेहिसाब पैसा खर्च हो रहा है। ये हमले हफ्तों तक जारी रहने की आशंका है, जिसका कोई स्पष्ट लक्ष्य और परिणाम नहीं है।
ग्यारह सितंबर 2001 के हमलों के बाद साल 2003 में इराक युद्ध से पहले अमेरिकी संसद में लंबी बहस हुई थीं, लेकिन इस बार ऐसा नहीं हुआ। इसके अलावा हाल ही में वेनेजुएला में अमेरिका ने सीमित सैन्य हमले किए थे। लेकिन ईरान के खिलाफ ‘ऑपरेशन एपिक फ्यूरी’ नाम से शुरू किए गए इस अभियान का निकट भविष्य में अंत होता प्रतीत नहीं हो रहा है।
ईरान के जवाबी हमलों में अमेरिका के कम से कम तीन सैन्य कर्मियों की मौत हो चुकी है। ट्रंप ने रविवार को आगाह किया था कि जान गंवाने वाले अमेरिकियों की संख्या बढ़ सकती है।
यह समय संसद के लिए महत्वपूर्ण है। अमेरिकी संविधान के तहत केवल संसद के पास युद्ध की घोषणा करने का अधिकार होता है।
निगरानी संगठन ‘प्रोजेक्ट ऑन गवर्नमेंट ओवरसाइट’ में द कंस्टीट्यूशन प्रोजेक्ट के कार्यकारी निदेशक डेविड जानोव्स्की ने कहा, ‘संविधान का उद्देश्य किसी एक सरकारी संस्था या व्यक्ति को सर्वशक्तिशाली होने से रोकना है।”
उन्होंने कहा, ‘वास्तविक जन प्रतिनिधि संसद सदस्य होते हैं, राष्ट्रपति नहीं। हालांकि, हम आम तौर पर राष्ट्रपति पर ही सबका ध्यान रहता है। हमें ऐसे जन प्रतिनिधियों की जरूरत है, जो यह तय करें कि यु्द्ध में शामिल होना है या नहीं।”
अमेरिका में युद्ध की घोषणा, युद्ध की मंजूरी या सैन्य बल के उपयोग के लिए संसद की मंजूरी जरूरी होती है। लेकिन ऐसा कभी कभार ही होता है।
वास्तव में, संसद ने देश के इतिहास में केवल पांच बार युद्ध की घोषणा की है। आखिरी बार संसद ने 1941 में पर्ल हार्बर हमले के एक दिन बाद दूसरे विश्व युद्ध में दाखिल होने की घोषणा की थी। संसद ने 1990 के खाड़ी युद्ध के लिए सैन्य बल उपयोग प्राधिकरण (एयूएमएफ) को मंजूरी दी थी और फिर 9/11 के बाद 2001 और 2002 में भी इस प्राधिकरण ने अफगानिस्तान और फिर इराक में युद्ध की शुरुआत की थी।
लेकिन कांग्रेस ने वियतनाम युद्ध के समय के दौरान ‘वार पावर रेजोल्यूशन’ भी बनाया था। इसे एक राष्ट्रपति के खिलाफ इस्तेमाल किया गया था, जिसने संसद की मंजूरी के बिना सैन्य अभियान शुरू किए थे।
सीनेट की इंटेलिजेंस कमेटी के प्रमुख और डेमोक्रेटिक सदस्य मार्क वार्नर ने कहा कि राष्ट्रपति की हैसियत से ट्रंप ‘इस काम को अकेले नहीं कर सकते।’
वार्नर ने सीएनएन के ‘स्टेट ऑफ द यूनियन’ कार्यक्रम में कहा, “जब राष्ट्रपति अमेरिकी बलों को किसी निर्धारित युद्ध में भेजते हैं, तो उन्हें संसद और अमेरिकी जनता के सामने आकर युद्ध की घोषणा के बारे में राय लेनी होती है।”
एक ओर सांसद ईरानी शासन और उसकी परमाणु महत्वाकांक्षाओं की आलोचना कर रहे हैं, तो दूसरी ओर डेमोक्रेटिक पार्टी के सांसदों ने कहा कि ट्रंप ने युद्ध के लिए कोई ठोस कारण नहीं बताया है या यह स्पष्ट नहीं किया है कि अगले कदम क्या होंगे। इसके अलावा, ट्रंप के ‘मेक अमेरिका ग्रेट अगेन’ (एमएजीए) गठबंधन में भी दरार पैदा हो गई है, क्योंकि उसे लगता है कि राष्ट्रपति ‘अमेरिका फर्स्ट’ के अपने चुनावी वादे को पूरा करने में विफल रहे हैं, और अब वह अमेरिका को विदेश में एक युद्ध में धकेल रहे हैं।
कई सांसद युद्ध में लंबे समय तक फंसे रहने को लेकर आगाह कर चुके हैं। उनका कहना है कि इस अभियान में ईरान के सर्वोच्च नेता अआतुल्ला अली खामेनेई समेत सैंकड़ों लोग मारे गए हैं, इसलिये यह युद्ध लंबा खिंच सकता है।
व्हाइट हाउस के अधिकारी इस सप्ताह सांसदों को युद्ध के बारे में विस्तारपूर्वक जानकारी दे सकते हैं, लेकिन सवाल-जवाब सत्र बंद दरवाजों के पीछे होंगे।
अपने-अपने समय में दोनों प्रमुख राजनीतिक दलों के राष्ट्रपति सैन्य हमले करने के लिए बहुत अधिक अधिकार हासिल कर चुके हैं, लिहाजा वे बिना संसद की मंजूरी के राष्ट्रीय सुरक्षा के अपने लक्ष्यों को पूरा कर सकते हैं।
उदाहरण के लिए, डेमोक्रेटिक पार्टी के बराक ओबामा ने लीबिया और रिपब्लिकन पार्टी के जॉर्ज एच.डब्ल्यू. बुश ने पनामा में बिना संसद की मंजूरी के सैन्य कार्रवाई की।
लेकिन राष्ट्रपति की युद्ध से जुड़ी शक्तियों पर अंकुश लगाना एक मुश्किल काम है, और संसद ने इसपर बहुत कम काम किया है। अगर संसद ट्रंप को ईरान में सैन्य कार्रवाई से रोकने के लिए एक प्रस्ताव पारित कर भी दे, तो राष्ट्रपति का वीटो रोकने के लिए दो-तिहाई बहुमत पाना मुश्किल होगा।
ट्रंप ने संसद की शक्ति को नजरअंदाज किया है, जो यह तय करती है कि वह क्या कर सकते हैं और क्या नहीं।
उन्होंने अपने हाल के भाषण में ईरान का बहुत कम जिक्र किया और संसद के समर्थन को ज्यादा तवज्जो नहीं दी।
कैलिफोर्निया विश्वविद्यालय के प्रोफेसर जॉन यू का कहना है कि राष्ट्रपति और संसद इन मुद्दों पर आपस में टकराते रहते हैं, लेकिन संसद के पास एक खास ताकत है, क्योंकि वह सरकारी खर्चों को नियंत्रित करती है।
उन्होंने कहा, ‘संसद जानती है कि अगर वह चाहे तो इसे रोक सकती है।”
यू ने यह भी बताया कि जब वियतनाम युद्ध खत्म हुआ था, तो संसद ने ही फंडिंग रोक दी थी।
लेकिन संसद में रिपब्लिकन पार्टी के पास बहुमत है, जो ईरान के खिलाफ सैन्य शक्ति का इस्तेमाल करने के ट्रंप के विचार से सहमत है। हाल ही में, उन्होंने पेंटागन के लिए बड़े पैमाने पर नए फंड को मंजूरी दी थी।
यू के अनुसार चूंकि संसद में रिपब्लिकन पार्टी के पास बहुमत है, इसलिए यह कोई आश्चर्य की बात नहीं है कि पार्टी के सांसद ट्रंप के फैसलों का विरोध नहीं करेंगे, बल्कि उनसे सहमति जताएंगे।
एपी जोहेब दिलीप
दिलीप

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