पश्चिमी नेता चीन के साथ संबंधों के भविष्य को लेकर विभाजित हैं |

पश्चिमी नेता चीन के साथ संबंधों के भविष्य को लेकर विभाजित हैं

पश्चिमी नेता चीन के साथ संबंधों के भविष्य को लेकर विभाजित हैं

: , December 1, 2022 / 03:32 PM IST

स्टीफन वोल्फ, बर्मिंघम विश्वविद्यालय में अंतर्राष्ट्रीय सुरक्षा के प्रोफेसर)

बर्मिंघम, एक दिसंबर (द कन्वरसेशन) यूरोपीय परिषद के अध्यक्ष चार्ल्स मिशेल एक दिसंबर को बीजिंग के लिए रवाना हुए, पिछले एक साल में जब से शी जिनपिंग ने माओत्से तुंग के बाद देश के सबसे शक्तिशाली नेता के रूप में अपनी स्थिति मजबूत कर ली है, उनके साथ मुलाकात के लिए चीन जाने वाले पश्चिमी नेताओं की सूची में यह नया नाम है ।

शी ने इससे पहले 2022 में बीजिंग ओलंपिक में 20 से अधिक शासनाध्यक्षों से मुलाकात की थी, लेकिन इनमें से अधिकांश लोकतंत्र का प्रतिनिधित्व नहीं करते थे। एक वरिष्ठ यूरोपीय राजनेता मिशेल की यात्रा, चीन के तेजी से मुखर भू-राजनीतिक रुख के प्रति पश्चिमी दृष्टिकोण पर ध्यान केंद्रित करेगी। और इसके बीजिंग से निपटने के तरीके पर पश्चिम में गहरे विभाजन को उजागर करने की संभावना है।

पहला विभाजन ट्रान्साटलांटिक है। यह सच है कि अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडेन ने हाल ही में इंडोनेशिया में जी20 शिखर सम्मेलन में शी के साथ अपनी बैठक में अधिक समझौतावादी स्वर अपनाया। लेकिन वाशिंगटन आम तौर पर यूरोपीय संघ के प्रमुख सदस्यों, विशेष रूप से फ्रांस और जर्मनी की तुलना में चीन के प्रति अधिक कठोर दृष्टिकोण अपना रहा है।

अक्टूबर के अंत में जारी की गई सबसे हालिया अमेरिकी राष्ट्रीय सुरक्षा रणनीति, चीन को ‘‘अंतर्राष्ट्रीय व्यवस्था को फिर से आकार देने के इरादे से एकमात्र प्रतियोगी और इसे करने के लिए आर्थिक, राजनयिक, सैन्य और तकनीकी शक्ति’’ के रूप में दर्शाती है। यह ‘‘पीआरसी पर एक स्थायी प्रतिस्पर्धात्मक बढ़त बनाए रखने’’ को एक अमेरिकी प्राथमिकता बनाता है।

इसके विपरीत, विदेश मामलों और सुरक्षा नीति के लिए यूरोपीय संघ के उच्च प्रतिनिधि, जोसेप बोरेल ने 22 नवंबर को यूरोपीय संसद में बोलते हुए, यूरोनीय संघ के चीन के साथ सहयोग पर जोर दिया। चीन के साथ मतभेदों को ध्यान में रखते हुए – लोकतंत्र, मानवाधिकारों और बहुपक्षवाद सहित – बोरेल ने यह भी कहा: ‘‘चीन तेजी से मुखर होता जा रहा है और कड़ी प्रतिस्पर्धा विकसित कर रहा है।’’ लेकिन, महत्वपूर्ण रूप से, उन्होंने यह कहकर अपना भाषण समाप्त किया: ‘‘अमेरिका हमारा सबसे महत्वपूर्ण सहयोगी है, लेकिन कुछ मामलों में, हम चीन के प्रति समान स्थिति या समान दृष्टिकोण पर नहीं होंगे।’’ अमेरिका ने यूरोपीय संघ के सहयोगियों पर चीन के प्रति अपने कठोर रूख का अनुसरण करने का दबाव बढ़ाना शुरू कर दिया है, यूरोपीय लोग इससे पीछे हट रहे हैं। ऐसी खबरें हैं कि चीन पर नए अमेरिकी निर्यात प्रतिबंधों को लेकर डच चिंतित है।

फ्रांसीसी राष्ट्रपति, इमैनुएल मैक्रॉन, जो एक दिसंबर को वाशिंगटन में बाइडेन से मिलने वाले हैं, उनकी चर्चाओं में यूरोपीय संघ-चीन संबंधों पर बात होने की उम्मीद है।

और शायद सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि जर्मन चांसलर ओलाफ शोल्ज़ की हाल की चीन यात्रा के दौरान, राजनीतिक प्रतिस्पर्धा की तुलना में आर्थिक सहयोग पर बहुत अधिक जोर दिया गया था। फिर भी यह मान लेना बहुत सरल होगा कि एक स्पष्ट विभाजक रेखा है जो अटलांटिक से होकर गुजरती है। यूरोपीय संघ के भीतर, चीन से कैसे संपर्क किया जाए, इस पर स्पष्ट मतभेद हैं, और उन्हें कागज पर उतारना मुश्किल है।

उदाहरण के लिए, निवेश पर यूरोपीय संघ-चीन व्यापक समझौता, जिस पर दिसंबर 2020 में बहुत धूमधाम और आलोचना के साथ हस्ताक्षर किए गए थे, की पुष्टि की जानी अभी बाकी है।

लिथुआनिया, यूरोपीय संघ के सबसे छोटे सदस्य देशों में से एक, ने ताइवान को लिथुआनियाई राजधानी विलनियस में एक व्यापार कार्यालय खोलने की अनुमति दी। इस दौरान राजधानी के लिए प्रचलित नाम ताइपे के स्थान पर ताइवान नाम का उपयोग किया गया। इससे चीन के साथ एक बड़ा विवाद पैदा हो गया, जिसने इसे वन चाइना पॉलिसी से हटना माना।

इसने यूरोपीय संघ को अपने एक सदस्य देश के लिए खड़े होने और ताइवान को चीन के हिस्से के रूप में मान्यता देने वाली अपनी लंबे समय से चली आ रही आधिकारिक नीति को बनाए रखने के बीच एक मुश्किल स्थिति में डाल दिया।

शोल्ज़ की बीजिंग यात्रा भी बिना विवाद के नहीं रही। कथित तौर पर कई नेताओं ने चीन के साथ अलग सौदे की संभावना पर चिंता जताई जो यूरोपीय संघ की एकता को कमजोर कर सकता है।

इसके अलावा, यूरोपीय संघ की एकता का संकेत देने के लिए चीन की एक संयुक्त मैक्रॉन-शोल्ज़ यात्रा के एक फ्रांसीसी प्रस्ताव को शोल्ज़ ने स्पष्ट रूप से अस्वीकार कर दिया था, जिन्होंने केवल जर्मन राजनीतिक और व्यापारिक प्रतिनिधिमंडल का समर्थन किया था।

एक तीसरी विभाजक रेखा उन देशों के भीतर मौजूद है जहां राजनीतिक और व्यापारिक नेता अक्सर आपस में और एक-दूसरे के साथ इस बात पर असहमत होते हैं कि चीन के प्रति कौन सा दृष्टिकोण अपनाना है।

यूके का ही उदाहरण लें। लंदन में लॉर्ड मेयर के भोज – ब्रिटेन के नेताओं के लिए अपनी विदेश नीति की प्राथमिकताओं को निर्धारित करने के लिए एक पारंपरिक स्थल – में एक भाषण में ब्रिटेन के मौजूदा प्रधान मंत्री ऋषि सुनक ने चीन के प्रति ‘‘मजबूत व्यावहारिक’’ दृष्टिकोण की वकालत की।

यह उनकी अपनी पार्टी के कट्टरपंथियों जो चीन के प्रति एक कठोर दृष्टिकोण अपनाने के पक्षधर है और चीन के साथ व्यापार करने वाले कई व्यवसायों के हितों के बीच संतुलन बनाने का प्रयास था।

लेकिन ब्रिटेन सरकार द्वारा हाल ही में निगरानी प्रणाली में चीनी कैमरों के उपयोग पर प्रतिबंध लगाने के निर्णय से संकेत मिलता है कि, फिलहाल, ब्रिटिश कट्टरपंथी इस बहस में जीत रहे हैं।

जर्मनी में भी ऐसी ही बहस हो रही है. सरकार चीन के साथ निजी क्षेत्र के संबंधों पर नए नियमों पर बहस कर रही है जिसका उद्देश्य जर्मन कंपनियों को कहीं और बाजार तलाशने और चीन पर निर्भरता कम करने के लिए प्रोत्साहित करना है।

जवाब में, जर्मन कार निर्माता मर्सिडीज-बेंज के मुख्य कार्यकारी अधिकारी ओला कैलेनियस ने कहा कि चीनी बाजार से बाहर निकलना कल्पना से परे है।

इस रुख को वोक्सवैगन और बीएमडब्ल्यू, साथ ही रसायन दिग्गज बीएएसएफ द्वारा साझा किए जाने की संभावना है, जो मर्सिडीज के साथ 2018 और 2021 के बीच चीन में सभी यूरोपीय प्रत्यक्ष विदेशी निवेश का एक तिहाई हिस्सा रखते हैं।

जर्मन गठबंधन सरकार भी चीन पर एकजुट होने से दूर है। ग्रीन पार्टी, जिसके पास चांसलर शोल्ज़ की कैबिनेट में अर्थशास्त्र और विदेशी मामलों के विभाग हैं, विशेष रूप से चीन को संदेह का लाभ देने के लिए कतई अनिच्छुक है।

अमेरिकी दबाव और चीन की संदिग्ध गतिविधियों की क्षमता पर खुफिया रिपोर्टों से उत्साहित, ग्रीन्स ने कुछ बड़े तर्क दिए। जिससे जर्मन सरकार ने दो चिप निर्माताओं में चीनी निवेश पर प्रतिबंध लगाने और हैम्बर्ग बंदरगाह में चीनी हिस्सेदारी को कम करने जैसे फैसले किए।

इन हालात में, यह संभावना नहीं है कि मिशेल की यात्रा से यूरोपीय संघ-चीन संबंधों में कोई मौलिक परिवर्तन होगा। दो आर्थिक दिग्गजों के बीच सबसे कम विवाद का विषय यह है कि उनके व्यापार संबंधों में स्थिरता बनी हुई है।

यह चीन के लिए उतना ही महत्वपूर्ण है जितना कि यह यूरोपीय संघ के लिए है, इनमें से कोई भी अस्थिर घरेलू और वैश्विक अर्थव्यवस्थाओं को और झटके नहीं दे सकता है। न ही वे अन्य महत्वपूर्ण चुनौतियों जैसे कि जलवायु परिवर्तन और यूक्रेन में युद्ध और वैश्विक खाद्य और ऊर्जा की कीमतों के लिए इसके निहितार्थों पर काम करने की कोशिश करना छोड़ सकते हैं।

हालाँकि, आर्थिक चिंताओं की वर्तमान प्रधानता, यूरोपीय संघ और चीन के बीच मूलभूत राजनीतिक मतभेदों को हमेशा के लिए खत्म नहीं कर सकती है। ब्रसेल्स को अंततः उनका सामना करने की आवश्यकता होगी, चाहे वह बीजिंग के साथ सामान्य व्यापार संबंध को कितना भी पसंद करे।

द कन्वरसेशन एकता एकता

एकता

 

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