नीतीश के राज्यसभा जाने से बिहार में पहली ‘भाजपा सरकार’ बनने की संभावना

नीतीश के राज्यसभा जाने से बिहार में पहली ‘भाजपा सरकार’ बनने की संभावना

नीतीश के राज्यसभा जाने से बिहार में पहली ‘भाजपा सरकार’ बनने की संभावना
Modified Date: March 5, 2026 / 02:59 pm IST
Published Date: March 5, 2026 2:59 pm IST

पटना, पांच मार्च (भाषा) जनता दल यूनाइटेड (जदयू)के प्रमुख नीतीश कुमार की “राज्यसभा सदस्य बनने की इच्छा” ने राज्य में नई सरकार के गठन का रास्ता साफ कर दिया है और अब भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) उस एकमात्र हिंदी भाषी राज्य में अपना “स्वयं का मुख्यमंत्री” बनाने की स्थिति में दिख रही है, जहां अब तक यह पद उसके पास नहीं रहा।

इस बात के संकेत तभी मिल गए थे जब चार महीने से भी कम समय पहले हुए विधानसभा चुनाव में भाजपा 89 सीटों के साथ सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी थी और उसने 2020 के बाद दूसरी बार जदयू से बेहतर प्रदर्शन किया था।

शपथ ग्रहण समारोह भी लगभग भाजपा का कार्यक्रम ही प्रतीत हुआ, क्योंकि नए मंत्रिपरिषद में पार्टी को बड़ा हिस्सा मिला और उसे सबसे अहम गृह विभाग भी मिला। समारोह में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी, केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह और उनके कई मंत्रिमंडलीय सहयोगियों के अलावा भाजपा शासित कई राज्यों के मुख्यमंत्री भी मौजूद थे।

राष्ट्रीय जनता दल (राजद) के राष्ट्रीय कार्यकारी अध्यक्ष और विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष तेजस्वी यादव ने संवाददाताओं से कहा, “भाजपा ने बिहार में महाराष्ट्र जैसा किया है। यह पार्टी हमेशा दलितों और अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) के खिलाफ रही है। अब यह समाजवादी गढ़ में अपना एजेंडा लागू करने की कोशिश करेगी।”

गौरतलब है कि नीतीश कुमार, राजद प्रमुख लालू प्रसाद के पुत्र तेजस्वी यादव के पिता और राजद प्रमुख लालू प्रसाद की तरह, 1990 के दशक के मंडल आंदोलन से उभरी राजनीति के प्रतिनिधि रहे हैं, जिसने बिहार की राजनीति में सवर्ण वर्चस्व को समाप्त किया था।

चर्चाएं हैं कि भाजपा भी सामाजिक समीकरणों को ध्यान में रखते हुए कमजोर वर्गों से किसी नेता को मुख्यमंत्री बना सकती है।

मुख्यमंत्री पद के संभावित दावेदारों में उपमुख्यमंत्री सम्राट चौधरी का नाम भी चर्चा में है, जिनके बारे में भाजपा के प्रमुख रणनीतिकार माने जाने वाले केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने विधानसभा चुनाव प्रचार के दौरान उन्हें “बड़ा आदमी” बनाने का वादा किया था।

वर्तमान में उप मुख्यमंत्री व गृह विभाग जैसे महत्वपूर्ण मंत्रालय का जिम्मा संभाल रहे चौधरी कोइरी समुदाय से आते हैं, जो एक ओबीसी जाति है और लंबे समय से इस बात को लेकर असंतोष जताती रही है कि उसे अब तक “अपना मुख्यमंत्री” नहीं मिला।

यह देखना हालांकि बाकी है कि विचारधारा को प्राथमिकता देने के लिए जानी जाने वाली भाजपा चौधरी पर कितना भरोसा जताती है, जिन्होंने अपने राजनीतिक करियर की शुरुआत राजद से की थी और एक दशक से भी कम समय पहले भाजपा में शामिल हुए थे।

मुख्यमंत्री पद की चर्चा में केंद्रीय गृह राज्य मंत्री नित्यानंद राय का नाम भी सामने आ रहा है। राय संघ परिवार से जुड़े वरिष्ठ नेता हैं और उन्होंने अपने राजनीतिक जीवन की शुरुआत उस समय एबीवीपी के एक तेजतर्रार कार्यकर्ता के रूप में की थी जब अयोध्या आंदोलन अपने चरम पर था।

राय यादव समुदाय से आते हैं, जो बिहार की सबसे बड़ी जातियों में से एक है और अब तक मुख्य रूप से लालू प्रसाद और उनकी पार्टी राजद के साथ जुड़ी रही है।

भाजपा के सूत्रों के अनुसार, राय को मुख्यमंत्री बनाने में “ऊंची जातियों की नाराजगी और संख्यात्मक रूप से छोटे कुर्मी समुदाय की चिंता का खतरा हो सकता है, जिससे नीतीश कुमार आते हैं। इसके अलावा अत्यंत पिछड़ा वर्ग भी यादवों को अत्यधिक आक्रामक मानता है।”

भाजपा के सूत्र यह भी मानते हैं कि बिहार का अगला मुख्यमंत्री पार्टी का कोई अपेक्षाकृत कम चर्चित नेता भी हो सकता है, जैसा हाल ही में मध्य प्रदेश, राजस्थान, दिल्ली और ओडिशा जैसे राज्यों में देखा गया है।

भाजपा के एक नेता ने नाम न छापने की शर्त पर कहा, “सवर्ण मुख्यमंत्री की संभावना को भी पूरी तरह खारिज नहीं किया जाना चाहिए। हमने दिखाया है कि भाजपा में सभी के लिए जगह है। लेकिन मंडल आंदोलन के बाद गलत धारणा बन गई थी कि राज्यों में मुख्यमंत्री का पद सवर्णों के लिए मानो निषिद्ध हो गया है।”

उन्होंने कहा, “भाजपा ने उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र और राजस्थान में इस धारणा को बदलने में सफलता हासिल की है, जहां जातीय समीकरण होने के बावजूद योग्यता के आधार पर शीर्ष पद दिया गया। हाल के विधानसभा चुनाव में हमने राजद जैसे जातिवादी दलों को करारी शिकस्त दी है, इसलिए बिहार में भी ऐसा होने की पूरी संभावना है।”

इस बीच जदयू में उथल-पुथल की स्थिति बनी हुई है और उसके प्रभाव में कमी लगभग तय मानी जा रही है। यह भी अटकलें लगाई जा रही हैं कि नीतीश कुमार के पुत्र निशांत, जिनके राजनीति में प्रवेश की घोषणा दो दिन पहले हुई थी, भले ही नीतीश कुमार वंशवाद की राजनीति के विरोधी रहे हों, को उपमुख्यमंत्री बनाया जा सकता है।

जदयू के एक नेता ने हालांकि नाम न बताने की शर्त पर कहा, “अब हमारे लिए चीजें पहले जैसी नहीं रहने वाली हैं। हमारी पार्टी के सभी मंत्री, चाहे उनमें ‘साहेब’ (नीतीश कुमार) के बेटे ही क्यों न हों, अब अपने राजनीतिक अस्तित्व के लिए भाजपा की सद्भावना पर निर्भर रहेंगे।”

भाषा कैलाश प्रशांत

प्रशांत


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