शराब चीज ही ऐसी है…

शराब चीज ही ऐसी है...

शराब चीज ही ऐसी है…
Modified Date: November 29, 2022 / 01:53 am IST
Published Date: May 2, 2020 11:14 am IST

शराब के बिना शराबी नहीं बल्कि खुद सरकार ही नहीं रह सकती। क्योंकि ऐसा नहीं होता तो लॉकडाउन में वो शराब दुकान खुलवाने के लिए इतनी उतावली नहीं होती। केंद्र सरकार ने लॉकडाउन-3 के ऐलान के साथ ही जिन आवश्यक सेवाओं को बहाल किया है, उसमें शराब भी है। आज मालूम पड़ा कि जीवन रक्षक चीजों में शराब भी शामिल है। कोढ़ पर खाज (गुटखाप्रेमी सोने पर सुहागा पढ़ें) ये कि शराब के साथ ही पान-गुटखा की दुकानें भी खुलने वाली हैं। वाकई! सरकारें जनता की मूलभूत आवश्यकताओं का कितना ध्यान रखती हैं।

लॉकडाउन ने जीवन की जिन निरर्थकताओं से साक्षात्कार कराया उनमें नशा भी शामिल है। नशे के बिना भी जिंदगी जी जा सकती है, इसका अहसास लॉकडाउन में हुआ। दरअसल नशे की जकड़न से छूट नहीं पाने के पीछे सबसे बड़ा कारक आत्मबल की कमी का होना होता है। ऐसे लोगों के लिए लॉकडाउन वरदान बनकर आया। नशीले पदार्थों की अनुपलब्धता की मजबूरी विलपॉवर की मजबूती बनकर सामने आई। और इसका सकारात्मक नतीजा ये हुआ कि कई लोग शराब, गुटखा, सिगरेट से दूरी बनाने में सफल हो गए। अब इस विलपॉवर को बनाए रखना एक चुनौती है। उम्मीद की जानी कि लोग खुद से किए गए वादे को निभाने में सफल होंगे।

कोरोना ने सरकारों को भी ये मौका दिया है कि वो शराबबंदी लागू करने की दिशा में आगे बढ़ें। छत्तीसगढ़ में तो पूर्ण शराबबंदी यहां की सरकार के चुनावी वचन पत्र में शामिल है। लेकिन सरकार एक झटके में शराबबंदी कर देने से शराबियों पर पड़ने वाले दुष्प्रभावों की आड़ लगाकर इसे लागू करने से कतराती रही है। प्रभावों का अध्ययन करने के लिए तीन-तीन समितियां तक बनाई जा चुकी हैं। लेकिन लॉकडाउन में लागू हुई शराबबंदी से मिली जमीनी रिपोर्ट से प्रमाणिक रिपोर्ट भला कहां मिल सकती है? सो अब परीक्षा शराबियों के नहीं बल्कि सरकार के विलपॉवर की है। लेकिन जैसा कि असद मुल्तानी फरमाते हैं-
रहें न रिंद जाहिद के बस की बात नहीं,
तमाम शहर हैं दो चार दस की बात नहीं।

इसीलिए शराबबंदी को प्रदेश नहीं बल्कि राष्ट्रीय स्तर पर लागू किए जाने की जरूरत है। उपलब्धता की गुंजाइश खत्म करके ही तस्करी की आशंका को खत्म किया जा सकता है।

अब ये सरकारों के विवेक पर निर्भर करता है कि वो अपना आर्थिक हित देखती हैं या फिर जनता का। ये सही है कि सरकारों की कमाई का बड़ा जरिया आबकारी से मिलने वाला राजस्व है, जो लॉकडाउन की वजह से काफी प्रभावित हुआ है। लेकिन लॉकडाउन में लोगों की कमाई पर जो बुरा असर पड़ा है, उसका क्या? काम-धंधा चौपट होने से एक बड़ी आबादी आर्थिक संकट में घिर चुकी है। निम्न आय वर्ग के पास इतनी जमा पूंजी नहीं है कि वो आगे आने वाले बेकारी के दिनों को काट सके। और ऐसे गंभीर संकट के दौर में शराब बिक्री का रास्ता खोलकर सरकार ने दरअसल इस वर्ग की बर्बादी का ही रास्ता खोला है। तय मानिए, बेचारों की जो भी जमा पूंजी है, वो भी दारू की भेंट चढ़ने जा रही है। सोशल डिस्टेंसिंग की जो धज्जियां उड़ेंगी, सो अलग।

इस खतरे को भांपते हुए ही छत्तीसगढ़ के बालोद के देवरी गांव की महिलाओं ने मुख्यमंत्री को पत्र लिखकर प्रदेश में पूर्ण शराबबंदी करने का अनुरोध किया है। कुछ ऐसी ही चिट्टी बनारस की महिलाओं ने भी मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को लिखी है। इन चिट्ठियों में शराबबंदी से मिले जिन सार्थक परिणामों का जिक्र है, उसमें सबसे अहम घरेलू हिंसा में आई कमी और घरेलू बजट में हुआ सुधार शामिल है।

कोरोना आपदा ने सरकारों को इतिहास रचने का मौका दिया है। बात-बात में बापू के आदर्शों की दुहाई देने वाली सरकारों को सुअवसर मिला है कि वे नशामुक्त समाज की स्थापना का रास्ता आसान बनाकर उनके सपने को पूरा करने का यश कमा सकें। मौका है और दस्तूर भी, अब बस हिम्मत दिखाने की देरी है। है हिम्मत…?

सौरभ तिवारी

डिप्टी एडिटर, IBC24

 

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