चुनाव दर चुनाव कांग्रेस के लिए एक उम्मीद की किरण बन कर उभर रहा छत्तीसगढ़ मॉडल - सौरभ राज |

चुनाव दर चुनाव कांग्रेस के लिए एक उम्मीद की किरण बन कर उभर रहा छत्तीसगढ़ मॉडल – सौरभ राज

Chhattisgarh model ray of hope for Congress : आखिर कांग्रेस की छत्तीसगढ़ मॉडल बाकी प्रदेश कांग्रेस संगठनों से अलग क्यों नजर आती है? चुनाव दर चुनाव छत्तीसगढ़ मॉडल क्यों कांग्रेस के लिए एक उम्मीद की किरण बन कर उभर रही है?

Edited By: , December 9, 2022 / 03:38 PM IST

रायपुर। गुजरात और दिल्ली एमसीडी चुनाव के बीच हिमाचल प्रदेश विधानसभा में कांग्रेस की जीत भारतीय राजनीति में एक निर्णायक मोड़ है. हिमाचल चुनाव के परिणाम ने तमाम राजनीतिक विश्लेषकों को धत्ता बता दिया है. हिमाचल में कांग्रेस की जीत देश की राजनीति में एक अलग मोड़ ले सकती है. इस जीत ने दो प्रमुख तर्कों को पुख्ता कर दिया है. पहला, इस जीत ने प्रियंका गांधी की नेतृत्व क्षमता पर मुहर लगाया है और दूसरा, इस जीत ने ‘छत्तीसगढ़ मॉडल’ की महत्ता को पुनः स्थापित किया है.

जहां हिमाचल प्रदेश विधानसभा चुनाव में प्रचार का नेतृत्व प्रियंका गांधी की कन्धों पर था, वहीं चुनावी प्रबंधन की जिम्मेदारी छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री भूपेश बघेल एवं उनकी टीम संभाल रही थी. परिणाम स्पष्ट संकेत दे रहे हैं कि बतौर राजनीतिक विद्यार्थी, हमें छत्तीसगढ़ के चुनावी प्रबंधन मॉडल को और बारीकी से अध्ययन करने की जरूरत है. आखिर कांग्रेस की छत्तीसगढ़ मॉडल बाकी प्रदेश कांग्रेस संगठनों से अलग क्यों नजर आती है? चुनाव दर चुनाव छत्तीसगढ़ मॉडल क्यों कांग्रेस के लिए एक उम्मीद की किरण बन कर उभर रही है?

इन सवालों का उत्तर जानने के लिए हमें वापस 2018 छत्तीसगढ़ विधानसभा चुनाव की ओर देखने की आवश्यकता है. देश के बड़े-बड़े राजनीतिक विश्लेषकों ने जब छत्तीसगढ़ में कांग्रेस को नजरंदाज कर दिया था, उस समय कांग्रेस को मिली प्रचंड बहुमत ने कई धारणाओं को तोड़ने का काम किया था. मेरा मानना है कि चुनाव जीतने के लिए किसी भी पार्टी को चार पहलूओं की आवश्यकता पड़ती है – नीति, नीयत, नेता और नवाचार. भूपेश बघेल की नेतृत्व वाली छत्तीसगढ़ मॉडल इन चारों को पहलूओं से लैस दिखती है. जहां छत्तीसगढ़ कांग्रेस सरकार की नीतियों की चर्चा अन्य राज्य के चुनावों में होती है. तो वहीं राज्य में बीस हजार से अधिक बूथों पर संगठन का विस्तार छत्तीसगढ़ मॉडल की मजबूत एवं सकारात्मक नीयत पर भी ठप्पा लगाती है. नेता और नवाचार की बात करें तो छत्तीसगढ़ प्रदेश के मुख्यमंत्री ने अपनी नेतृत्व को सरकार के साथ साथ संगठन में भी स्थापित किया है. वहीं छत्तीसगढ़ के कांग्रेस कार्यकर्त्ता से लेकर बड़े नेताओं तक रचनात्मक चुनावी राजनीति करने से कभी नहीं चूके. बतौर तात्कालीन प्रदेश अध्यक्ष भूपेश बघेल की विकास खोजो यात्रा से लेकर बतौर मुख्यमंत्री भेंट-मुलाकात कार्यक्रम तक छत्तीसगढ़ मॉडल की नवाचार एवं रचनात्मक राजनीति को दर्शाता है.

अब अगर हिमाचल प्रदेश चुनाव की और रुख करें तो चुनावी प्रबंधन में छत्तीसगढ़ मॉडल की झलक स्पष्ट दिखती है. प्रियंका गांधी की नेतृत्व ने “नेता और नीयत” की जरूरत को पूरा किया. वहीं, छत्तीसगढ़ मॉडल ने “नीति और नवाचार” का मोर्चा संभाला. छत्तीसगढ़ विधानसभा चुनाव की तर्ज पर पुरानी पेंशन योजना को सबसे महत्वपूर्ण चुनावी मुद्दा बनाया. इसके अलावा “आ रही है कांग्रेस” जैसे चुनावी नारों ने हिमाचल प्रदेश कांग्रेस के कार्यकर्ताओं के बीच वही जोश एवं विश्वाश जगाया जो छत्तीसगढ़ में “कांग्रेस की सरकार आने वाली है” और “गढ़बो नवा छत्तीसगढ़” जैसे चुनावी नारों ने किया था. छत्तीसगढ़ मॉडल ने ना सिर्फ हिमाचल प्रदेश में खुद को साबित किया है, बल्कि असम जैसे मुश्किल राज्य में भाजपा को तगड़ी टक्कर देते नजर आई थी.

हिमाचल प्रदेश की जीत ने कांग्रेस के जख्मों पर मरहम लगाने का काम किया है. इसके साथ-साथ यह एक तरह से संजीवनी बनकर भी उभरी है. कांग्रेस चुनाव जीतने का जो आत्मविश्वास खो रही थी, उसे एक ताकत फिर से जरुर मिली होगी. हिमाचल की जीत और छत्तीसगढ़ मॉडल ने कांग्रेस को जीत का फार्मूला दिखा दिया है. बस आवश्यकता इसकी देश के अन्य प्रदेश कांग्रेस संगठन इकाईयों में भी ईमानदार क्रियान्वयन की है. हालांकि अगले वर्ष होने वाली छत्तीसगढ़ विधानसभा चुनाव भूपेश बघेल की नेतृत्व वाली छत्तीसगढ़ मॉडल का एक और लिटमस टेस्ट होगा. विजय रथ पर सवार भाजपा और महत्वाकांक्षी आम आदमी पार्टी इस लड़ाई को और भी दिलचस्प बना सकते हैं.

(लेखक अज़ीम प्रेमजी विश्वविद्यालय में अध्ययनरत हैं एवं यूरोपियन सेंटर फॉर पॉपुलिज्म स्टडीज के साथ जुड़े हैं.)

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