मुफ्तखोरी योजनाओं से ज़िंदगी में भर रहे खुशियों और सुकून के रंग
मुफ्तखोरी योजनाओं से ज़िंदगी में भर रहे खुशियों और सुकून के रंग, Political Parties Freebies Scheme Analysis
- परमेन्द्र मोहन
बताइए भला.. किसानों का कर्जा माफी, साड़ी, टीवी, साइकिल, टैबलेट जैसे सिर्फ एक बार का मुफ्त फायदा देकर पार्टियां पांच साल के लिए सत्ता बटोर लिया करती थीं! जनता का शोषण इस कदर होता था कि घर चलाने, ज़िंदा रहने तक के लिए धूप-सर्दी-बारिश में भी काम करना पड़ता था। आज़ादी के सात-आठ दशक के बाद भी अपने ही देश में अपना ही परिवार चलाने के लिए करोड़ों लोगों को मेहनत-मजदूरी, काम-धंधे पर लगाए रखने जैसा शोषण सरेआम किया जाता रहा, किसी ने भी कभी नहीं सोचा कि जब भगवान ने पेट दिया है तो खाना भी देंगे ही तो उन्हें इस प्राकृतिक न्याय से क्यों वंचित किया जाए? खैर.. देर आए, दुरुस्त आए और अब जाकर मुफ्तखोरी योजनाओं से बेरंग सी ज़िंदगी में खुशियों और सुकून के रंग भर रहे हैं।
वैसे भी चार्वाक जी कह गए हैं कि यावज्जीवेत सुखं जीवेद ऋणं कृत्वा घृतं पिवेत, भस्मीभूतस्य देहस्य पुनरागमनं कुत: यानी जब तक जिएं सुख से जिएं, कर्ज लेकर भी घी पियें क्योंकि ये शरीर तो नश्वर है, फिर से जीवन थोड़े ना मिलना है। अब क्या है कि साठ-सत्तर साल तक देश चलाने वाली कांग्रेस को तो कभी हिंदू ऋषियों-मुनियों की वाणी का सम्मान करने का ख्याल रहा नहीं… अब जाकर चार्वाक जी के शब्दों को आकार मिलना शुरू हुआ है और देश को ये भरोसा जगा है कि विकास का मतलब ये होता है कि बिना हाथ-पांव हिलाए भी मुफ्त खाना, मुफ्त इलाज, मुफ्त आवास, मुफ्त राशि मिले और जीवन बिना कुछ करे-धरे भी मुफ्त में ही कट जाए।
सरकार ऐसी दीजिए..सब कुछ मुफ्त दिलाए..
खाट पड़े जीवन कटे..क्यों हाथ-पैर हिलाए..
हर माह सौगात बरसे… ऐसी नीति चलाए..
मोबाइल डेटा भरा रहे..ज़िंदगी मस्त कट जाए!
मुफ्तखोरी वैसे भी बड़ी मस्त चीज है, समृद्ध इतिहास और सुखद परंपरा रही है इसकी। जैसे ही पता चलता है कि मुफ्त में खाना बंट रहा है, वहीं लाइन लग जाती है। जिस शॉप पर 500 के सामान के साथ 500 ग्राम चीनी फ्री लिखा दिख जाए, वहीं भीड़ लग जाती है। ऐसे भी मुफ्तखोरी योजनाएं भी अपने देश के लिए कतई नई नहीं है, लेकिन हालिया विधानसभा चुनावों में ये योजना काफी हद तक सिर्फ महिलाओं तक सीमित होती चली जा रही थी, जिसे अब जाकर विस्तार मिल रहा है, योजना राशि अपग्रेड करके इसे स्तरीय बनाया जा रहा है। योजना की लोकप्रियता को देखते हुए उम्मीद की जाने लगी है कि मुफ्तखोरी योजना राशि अगले 5-10 वर्षों में सरकारी वेतनभोगी कर्मचारियों की तरह ही और अधिक सम्मानजनक लेवल तक विकास कर लेगी।
अब बंगाल को ही देख लें, ममता बनर्जी सिर्फ 1500 रुपये की महिला मुफ्तखोरी योजना की पक्षधर हैं, लेकिन बीजेपी का मास्टरस्ट्रोक ये है कि वहां महिलाओं को 3000 प्रति महीने, प्रेगनेंट महिलाओं को 21,000 रुपये मिलेंगे। योजना विस्तार भी देखिए.. बेरोजगार बंगाली युवाओं को भी 3000 रुपये हर महीने मुफ्त मिलेंगे। सबका साथ, सबका विश्वास ना सिर्फ बीजेपी का वादा है, बल्कि इसे ज़मीन पर सौ फीसदी उतारने का पक्का इरादा भी है, इसलिए बंगाली किसानों को भी सम्मान निधि अब 6000 नहीं बल्कि 9000 रुपये मिलेगी, हालांकि ये सालाना है लेकिन जब परिवार की महिला और बेरोजगार दोनों को तीन-तीन हजार रुपये साथ में मिलेंगे तो किसी तरह काम चल ही जाएगा, अगले चुनाव में अपग्रेड होने की उम्मीद तो बनी रहेगी ही।
अब इसके बाद भी अगर किसी को ये शिकायत है कि कुछ और मिलना चाहिए था, तो हर महीने पांच किलो अनाज वाली मुफ्त राशन योजना, आयुष्मान से 5 लाख तक के मुफ्त इलाज जैसी सुविधाएं भी जारी ही हैं भाई…सबकुछ क्या एक ही पार्टी की सरकार से चाहिए? जिन्होंने इतने साल तक मुफ्तखोरी के नाम पर सिर्फ चरणामृत चटाया, उनसे जाकर पूछें कि अब जब सबकुछ मुफ्त में मिल रहा है तो तब आख़िर उस समय की सरकारों ने क्यों नहीं दिया था? बेचारे तब के लोग 50-60 साल की उम्र में भी काम करते रहते थे, अब 25-30 की उम्र में भी मुफ्त सरकारी आवास के बाहर पेड़ के नीचे खाट लगाकर मस्त मोबाइल चलाते हैं, तो हैप्पीनेस इंडेक्स में देश को बढ़ाने के लिए मुफ्तखोरी की कल्याणकारी सोच क्यों नहीं आई?
मुफ्तखोरी योजनाओं का अखिल भारतीय विस्तार और छप्परफाड़ लोकप्रियता में डीएमके की मुफ्त कूपन योजना भी है, जिसमें 8000 रुपये के कूपन में फ्रिज, टीवी, वाशिंग मशीन है। AIADMK भी फ्री रेफ्रिजेरेटर देगी, अब दौर चला हुआ है तो वोटर्स के कल्याण के लिए तमाम जनसेवक पार्टियां मुफ्तखोरी योजनाओं में होड़ लगा रही हैं।
एक बात और…जैसे शुरुआत में आरक्षण ये कह कर लाया गया था कि इसकी समीक्षा होगी, लेकिन बाद में ये अधिकार ही बन गया, वैसे ही एक बार जो मुफ्तखोरी योजना लागू हुई है या हो रही है या होगी, वो भी आगे चलकर मुफ्तखोरों के अधिकार ही बनेगी क्योंकि ये अधिकार किसी ने छीनने की कोशिश की तो फिर वोट नहीं मिलने तय है। देश की एक भी पार्टी में ये साहस नहीं है कि वो बिना मुफ्तखोरी योजना के चुनाव मैदान में उतर सके, भले ही ये चेहरा…वो संगठन…ये नीति, वो रणनीति के कितने भी दावा कर ले। तो वोटर्स अपने वोट की अहमियत समझें और घर बैठे हर महीने मुफ्त में ज्यादा कमाई करने का सुनहरा मौका भुनाएं। अबकी बार भी अगर चूक गए तो फिर वही डेढ़-दो हज़ार की मुफ्तखोरी से काम चलाना होगा, उसमें भी दिक्कत की आशंका बनी रहेगी, तो सोच-समझकर करें मतदान ताकि नतीजों के बाद मिलता रहे मुफ्त का खाना और जलपान।

लेखक, IBC24 न्यूज चैनल में मैनेजिंग एडिटर हैं)
Disclaimer- ब्लॉग में व्यक्त विचारों से IBC24 अथवा SBMMPL का कोई संबंध नहीं है। हर तरह के वाद, विवाद के लिए लेखक व्यक्तिगत तौर से जिम्मेदार हैं।

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