सस्ती, अच्छी शिक्षा के चलते भारतीय छात्रों का यूरोप, सिंगापुर की ओर रुझान बढ़ा: रिपोर्ट

सस्ती, अच्छी शिक्षा के चलते भारतीय छात्रों का यूरोप, सिंगापुर की ओर रुझान बढ़ा: रिपोर्ट

सस्ती, अच्छी शिक्षा के चलते भारतीय छात्रों का यूरोप, सिंगापुर की ओर रुझान बढ़ा: रिपोर्ट
Modified Date: March 14, 2026 / 07:10 pm IST
Published Date: March 14, 2026 7:10 pm IST

मुंबई, 14 मार्च (भाषा) किफायती और उच्च गुणवत्ता वाली शिक्षा के कारण भारतीय छात्र तेजी से स्पेन, जर्मनी, सिंगापुर, यूएई और दक्षिण कोरिया जैसे देशों को पढ़ाई के लिए चुन रहे हैं। एक रिपोर्ट में यह बात कही गई।

शिक्षा क्षेत्र पर केंद्रित गैर-बैंकिंग वित्तीय कंपनी ऑक्सिलो फिनसर्व की रिपोर्ट में कहा गया कि अमेरिका, कनाडा, ब्रिटेन और ऑस्ट्रेलिया जैसे देश अब भी भारतीय छात्रों के लिए काफी आकर्षक बने हुए हैं, खासकर विज्ञान, प्रौद्योगिकी, इंजीनियरिंग और गणित से जुड़े पाठ्यक्रमों के लिए। हालांकि, अब भारतीय छात्र पढ़ाई के लिए अन्य देशों को भी तेजी से अपने विकल्प के रूप में चुन रहे हैं।

रिपोर्ट के अनुसार इस बदलाव के पीछे कम लागत, अच्छे शिक्षण संस्थान, वीजा के आसान नियम, प्रशिक्षण और नौकरी के बेहतर अवसर तथा छात्रों की सुरक्षा जैसे कुछ कारण हैं।

ऑक्सिलो फिनसर्व में विदेशी शिक्षा ऋण से जुड़ी मुख्य अधिकारी श्वेता गुरु ने कहा कि आज भारतीय छात्र विदेश में पढ़ाई के मामले में अधिक व्यावहारिक हो गए हैं और वे खर्च के बदले मिलने वाले लाभ को ध्यान में रखकर निर्णय ले रहे हैं।

उन्होंने बताया कि स्पेन, जर्मनी और न्यूजीलैंड जैसे देशों में पढ़ाई के लिए मांग तेजी से बढ़ रही है, क्योंकि वहां अच्छी गुणवत्ता की शिक्षा, कम खर्च, स्पष्ट वीजा प्रक्रिया और पढ़ाई के बाद रोजगार के बेहतर अवसर मिलते हैं, खासकर स्नातकोत्तर स्तर और विज्ञान, प्रौद्योगिकी, इंजीनियरिंग तथा गणित से जुड़े पाठ्यक्रमों में।

रिपोर्ट में कहा गया कि यूरोप के कई नए शिक्षा केंद्रों में वर्ष 2023 से 2025 के बीच लगातार मजबूत वृद्धि दर्ज की गई है।

रिपोर्ट के अनुसार इन देशों में पढ़ाई का कुल खर्च लगभग 18 से 40 लाख रुपये प्रति वर्ष है, जबकि ब्रिटेन जैसे पारंपरिक देशों में यह 60 से 90 लाख रुपये प्रति वर्ष तक पहुंच जाता है। वहीं जर्मनी, स्पेन और अन्य उभरते देशों में पढ़ाई पूरी करने के बाद नौकरी मिलने में औसतन छह से नौ महीने लगते हैं, जबकि पारंपरिक देशों में यह समय नौ से 15 महीने तक हो सकता है।

रिपोर्ट में कहा गया कि इन देशों में शुरुआती वेतन लगभग 25 से 45 लाख रुपये सालाना होता है, जबकि पारंपरिक देशों में यह 45 से 75 लाख रुपये तक हो सकता है।

भाषा योगेश पाण्डेय

पाण्डेय


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