सदस्यता आधारित टैक्सी मंचों को जीएसटी दायरे में लाने का पड़ेगा प्रतिकूल असरः रिपोर्ट

सदस्यता आधारित टैक्सी मंचों को जीएसटी दायरे में लाने का पड़ेगा प्रतिकूल असरः रिपोर्ट

सदस्यता आधारित टैक्सी मंचों को जीएसटी दायरे में लाने का पड़ेगा प्रतिकूल असरः रिपोर्ट
Modified Date: July 2, 2026 / 03:21 pm IST
Published Date: July 2, 2026 3:21 pm IST

नयी दिल्ली, दो जुलाई (भाषा) सदस्यता आधारित टैक्सी सेवा मंचों तक माल एवं सेवा कर (जीएसटी) देनदारी बढ़ाने से ड्राइवरों की आमदनी घट सकती है, उनकी भागीदारी कम हो सकती है और यात्रियों की मांग पर भी प्रतिकूल असर पड़ सकता है। एक रिपोर्ट में यह आशंका जताई गई है।

एस्या सेंटर की यह रिपोर्ट देश के 13 शहरों में 2,100 से अधिक ड्राइवर और यात्रियों पर किए गए सर्वेक्षण पर आधारित है।

इस अध्ययन में रैपिडो, भारत टैक्सी जैसे मंचों के सदस्यता या ‘एक सेवा के रूप में सॉफ्टवेयर’ मॉडल का विश्लेषण किया गया है। इस मॉडल में ड्राइवर मंचों को एक निश्चित शुल्क देते हैं और किराया सीधे यात्रियों के साथ तय करते हैं।

इसके उलट, ऊबर और ओला जैसे कमीशन आधारित टैक्सी एग्रीगेटर मॉडल में मंच आमतौर पर किराया तय करते हैं, भुगतान एकत्र करते हैं और कमीशन काटकर शेष राशि ड्राइवर को देते हैं।

रिपोर्ट के मुताबिक, जीएसटी ढांचे में केंद्रीय माल एवं सेवा कर अधिनियम की धारा 9(5) के तहत कुछ अधिसूचित सेवाओं के लिए कर देनदारी मंचों पर स्थानांतरित कर दी जाती है।

हालांकि, सदस्यता आधारित मॉडल पर इस प्रावधान को लागू करने में कुछ व्यावहारिक मुश्किलें हैं। इसका कारण यह है कि ऐसे मंच न तो किराया तय करते हैं और न ही भुगतान एकत्र करते हैं।

रिपोर्ट कहती है, ‘‘कोई मंच उस लेनदेन मूल्य पर कर नहीं जमा कर सकता, जिसका संग्रह वह खुद नहीं करता और जिसकी उसे जानकारी भी नहीं है।’’

अध्ययन में कहा गया है कि सेवा प्रदाता के रूप में ड्राइवर सामान्यतः जीएसटी के दायरे में आते हैं, लेकिन अधिकांश का वार्षिक कारोबार 20 लाख रुपये की पंजीकरण सीमा से नीचे ही रहता है।

रिपोर्ट के मुताबिक, वर्ष 2017 की अधिसूचना के जरिये यात्री परिवहन सेवाओं को धारा 9(5) के तहत लाया गया था, जिसका उद्देश्य मुख्य रूप से कमीशन आधारित एग्रीगेटर मॉडल को शामिल करना था।

हालांकि, सदस्यता आधारित टैक्सी सेवा का मॉडल सामने आने से नियामकीय अस्पष्टता बढ़ी है और अग्रिम निर्णय प्राधिकरण (एएआर) के अलग-अलग फैसलों ने स्थिति को और जटिल बना दिया है।

सर्वेक्षण में शामिल तीन-चौथाई से अधिक ड्राइवर ने कहा कि पांच प्रतिशत जीएसटी का बोझ उनकी शुद्ध आय घटाएगा और काम के घंटे कम कर सकता है।

वहीं, करीब दो-तिहाई यात्रियों ने कहा कि किराया बढ़ने पर वे सेवाओं का उपयोग कम कर देंगे, जिससे कीमत के प्रति संवेदनशीलता का संकेत मिलता है, विशेषकर महिलाओं और कम आय वर्ग में।

रिपोर्ट के मुताबिक, लागत बढ़ने से ड्राइवर एवं यात्री दोनों ही अनौपचारिक परिवहन विकल्पों की ओर रुख कर सकते हैं।

भाषा प्रेम प्रेम अजय

अजय


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