आरआईएल, विदेशी कंपनियों ने न्यायालय में ओएनजीसी की गैस निकालने के आरोपों को खारिज किया

आरआईएल, विदेशी कंपनियों ने न्यायालय में ओएनजीसी की गैस निकालने के आरोपों को खारिज किया

आरआईएल, विदेशी कंपनियों ने न्यायालय में ओएनजीसी की गैस निकालने के आरोपों को खारिज किया
Modified Date: May 21, 2026 / 08:14 pm IST
Published Date: May 21, 2026 8:14 pm IST

नयी दिल्ली, 21 मई (भाषा) रिलायंस इंडस्ट्रीज लिमिटेड (आरआईएल) ने बृहस्पतिवार को उच्चतम न्यायालय में केंद्र सरकार के उस दावे का कड़ा विरोध किया, जिसमें आरोप लगाया गया है कि कंपनी और उसकी दो विदेशी साझेदार फर्म ने कृष्णा-गोदावरी (केजी) बेसिन से उस गैस को अवैध रूप से निकाला है, जो सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनी ओएनजीसी के गैस क्षेत्र से रिसकर उनके इलाके में आ गई थी।

प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति विपुल एम. पंचोली की पीठ रिलायंस बीपी एक्सप्लोरेशन (अल्फा) लिमिटेड और निको (एनईसीओ) लिमिटेड की अपीलों पर सुनवाई कर रही थी। ये अपील दिल्ली उच्च न्यायालय के उस फैसले के खिलाफ दायर की गई हैं, जिसने केंद्र के साथ गैस विवाद में कंपनियों के पक्ष में दिए गए मध्यस्थता निर्णय को रद्द कर दिया था।

इन कंपनियों ने उच्च न्यायालय के 14 फरवरी, 2025 के उस आदेश को चुनौती दी है, जिसने एकल-न्यायाधीश पीठ के फैसले को रद्द कर दिया था। एकल-न्यायाधीश ने रिलायंस इंडस्ट्रीज और इसके दो भागीदारों के पक्ष में आए मध्यस्थता निर्णय को बरकरार रखा था। उन पर आरोप था कि उन्होंने उन गैस भंडारों से कथित तौर पर गैस निकाली थी, जिसके दोहन का उनके पास कोई अधिकार नहीं था।

पेट्रोलियम मंत्रालय ने चार नवंबर, 2016 को रिलायंस-बीपी-निको पर 1.47 अरब डॉलर की मांग का नोटिस थमाया था। मंत्रालय का दावा था कि 31 मार्च, 2016 को समाप्त हुए सात वर्षों में कंपनियों ने लगभग 33.83 करोड़ ब्रिटिश थर्मल यूनिट गैस का उत्पादन किया, जो बंगाल की खाड़ी में ओएनजीसी के ब्लॉक से रिसकर या बहकर उनके पास के केजी-डी6 ब्लॉक में आ गई थी।

रिलायंस की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता अभिषेक मनु सिंघवी ने कहा कि यह आरोप लगाया गया है कि कंपनियों ने अनुचित तरीके से गैस निकाली या बल्कि उस गैस को चुराया है, जो ओएनजीसी के गैस क्षेत्र से बहकर उनके क्षेत्र में आई थी।

सिंघवी ने कहा, ‘दो स्थानों के बीच दबाव में अंतर के कारण गैस रिसकर आ सकती है।’

उन्होंने सवाल उठाया कि जब ओएनजीसी खुद कई वर्षों तक सोई रही और उसने अपने क्षेत्र से गैस नहीं निकाली, तो रिलायंस पर गैस चोरी का आरोप कैसे लगाया जा सकता है।

सिंघवी ने कहा, ‘ओएनजीसी गैस निकालने की प्रक्रिया शुरू करने के मामले में 10 साल तक सोई रही।’

उन्होंने पूछा कि ऐसे में रिलायंस और उसके भागीदारों पर गैस के रिसाव का कारण बनने का आरोप कैसे लगाया जा सकता है।

पीठ ने इस पर टिप्पणी करते हुए कहा कि यह दलील सही है क्योंकि गैस का रिसाव जानबूझकर नहीं किया जा सकता, यह आकस्मिक या स्वाभाविक हो सकता है।

उन्होंने कहा कि अगर यह मान भी लिया जाए कि रिलायंस और अन्य ने ओएनजीसी की गैस ली, तो इसकी मात्रा का सटीक आकलन कैसे किया जा सकता है।

एक विदेशी फर्म की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल ने भी इन्हीं दलीलों को दोहराया।

उन्होंने कहा कि अगर स्थिति इसके विपरीत होती और मान लें कि ओएनजीसी ने गैस निकालना शुरू कर दिया होता और रिलायंस व अन्य ने ऐसा नहीं किया होता… तो क्या सरकार इसी तरह काम करती और ओएनजीसी से हमें मुआवजा देने के लिए कहती?’

उन्होंने यह भी कहा कि ‘गैस चोरी का पूरा आरोप ही पूरी तरह से गलत था।’

भाषा अजय योगेश

अजय


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