पश्चिम एशिया संकट से सरकारी तेल कंपनियों को महीने में 30,000 करोड़ रुपये का नुकसान
पश्चिम एशिया संकट से सरकारी तेल कंपनियों को महीने में 30,000 करोड़ रुपये का नुकसान
(अम्मार जैदी)
नयी दिल्ली, आठ मई (भाषा) पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव के बीच वैश्विक ऊर्जा कीमतों में तेज उछाल के बावजूद देश की सरकारी तेल विपणन कंपनियों को पेट्रोल, डीजल और एलपीजी के दाम स्थिर होने की वजह से प्रतिदिन 700-1,000 करोड़ रुपये का नुकसान उठाना पड़ा है।
सूत्रों के मुताबिक, पश्चिम एशिया संकट के बाद सार्वजनिक पेट्रोलियम कंपनियों इंडियन ऑयल, बीपीसीएल और एचपीसील को प्रतिदिन करीब 700 से 1,000 करोड़ रुपये का नुकसान हो रहा है, जो मासिक आधार पर लगभग 30,000 करोड़ रुपये बैठता है।
पेट्रोलियम कंपनियों की लागत और खुदरा मूल्य के बीच का अंतर मार्च-अप्रैल में तेजी से बढ़ा है। हालांकि बाद में इसमें कुछ नरमी आई। अप्रैल में पेट्रोल पर करीब 18 रुपये प्रति लीटर और डीजल पर 25 रुपये प्रति लीटर तक का नुकसान होने का अनुमान है।
पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस मंत्रालय में संयुक्त सचिव सुजाता शर्मा ने पश्चिम एशिया के घटनाक्रम पर आयोजित एक संवाददाता सम्मेलन में कहा कि अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में भारी उतार-चढ़ाव है और आपूर्ति भी प्रभावित हुई है।
उन्होंने बताया कि कच्चे तेल की कीमत दो महीने पहले करीब 70 डॉलर प्रति बैरल थी, लेकिन अब यह बढ़कर लगभग 120 डॉलर प्रति बैरल हो गई है।
शर्मा ने कहा, “सरकार का अब तक प्रयास रहा है कि कीमतों को स्थिर रखा जाए और उपभोक्ताओं पर कोई बढ़ोतरी न डाली जाए। इससे तेल विपणन कंपनियों की वित्तीय स्थिति पर असर पड़ा है…। मासिक नुकसान करीब 30,000 करोड़ रुपये पर है।”
हालांकि, उन्होंने यह बताने से इनकार कर दिया कि क्या पेट्रोल और डीजल की खुदरा कीमतें आगे भी स्थिर रहेंगी। उन्होंने कहा, “जैसा कि मैंने कहा, अब तक प्रयास यही रहा है कि कीमतों में कोई बढ़ोतरी न हो।”
सरकार ने पेट्रोलियम कंपनियों पर आए दबाव को कम करने के लिए उत्पाद शुल्क में कटौती की है। पेट्रोल पर विशेष अतिरिक्त उत्पाद शुल्क 13 रुपये प्रति लीटर से घटाकर तीन रुपये और डीजल पर 10 रुपये से घटाकर शून्य कर दिया गया।
सूत्रों के मुताबिक, यदि उत्पाद शुल्क में कटौती नहीं की जाती तो यह बोझ करीब 62,500 करोड़ रुपये तक पहुंच सकता था।
शर्मा ने कहा कि उत्पाद शुल्क में कटौती की वजह से सरकार खुद भी हर महीने करीब 14,000 करोड़ रुपये का राजस्व नुकसान उठा रही है।
विशेषज्ञों का कहना है कि ऊंची कच्चे तेल की कीमतों और खुदरा दरों को स्थिर रखने के फैसले से तेल कंपनियों के बहीखाते और मार्जिन पर दबाव बढ़ा है। लंबे समय तक यह स्थिति बनी रहने पर कंपनियों को कार्यशील पूंजी के लिए अधिक कर्ज लेना पड़ सकता है और पूंजीगत व्यय योजनाओं की समीक्षा करनी पड़ सकती है।
हालांकि, रिफाइनिंग विस्तार, ऊर्जा सुरक्षा और वैकल्पिक ईंधन से जुड़ा निवेश सरकार के समर्थन से जारी रहने की संभावना है।
पश्चिम एशिया में तनाव बढ़ने और होर्मुज जलडमरूमध्य के रास्ते तेल एवं गैस की आपूर्ति को लेकर अनिश्चितता बने रहने से वैश्विक कच्चे तेल बाजार में भारी उतार-चढ़ाव आया। इस दौरान ब्रेंट क्रूड की कीमतों में भी तेज वृद्धि दर्ज की गई।
इसके बावजूद भारत में 28 फरवरी के बाद से खुदरा ईंधन कीमतों में कोई बदलाव नहीं किया गया। इसके उलट स्पेन, जापान, जर्मनी और ब्रिटेन जैसे देशों में पेट्रोल-डीजल की कीमतों में 20 से 30 प्रतिशत तक वृद्धि देखी गई है।
मामले से परिचित सूत्रों ने कहा कि परिवहन लागत, आपातकालीन कच्चे तेल की खरीद, बीमा प्रीमियम और रिफाइनरी समायोजन जैसी अतिरिक्त लागतों ने भी कंपनियों पर दबाव बढ़ाया। हालांकि देशभर में ईंधन और एलपीजी की आपूर्ति सामान्य बनी रही।
ब्रेंट क्रूड की कीमत 28 फरवरी को पश्चिम एशिया संघर्ष शुरू होने से पहले करीब 72 डॉलर प्रति बैरल थी। लेकिन संघर्ष तेज होने और होर्मुज जलडमरूमध्य के रास्ते जहाजों की आवाजाही बाधित होने से कीमतों में तेज उछाल आया।
हालत यह हो गई कि ब्रेंट क्रूड की कीमतें कुछ समय के लिए लगभग 144 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गईं। हालांकि तनाव थमने की उम्मीद से अब यह नरम होकर 100 डॉलर प्रति बैरल के करीब आ चुका है।
भाषा प्रेम
प्रेम रमण
रमण

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