उच्चतम न्यायालय ने खनिजों पर रॉयल्टी की गणना से जुड़े प्रावधानों को वैध ठहराया

उच्चतम न्यायालय ने खनिजों पर रॉयल्टी की गणना से जुड़े प्रावधानों को वैध ठहराया

उच्चतम न्यायालय ने खनिजों पर रॉयल्टी की गणना से जुड़े प्रावधानों को वैध ठहराया
Modified Date: July 13, 2026 / 06:38 pm IST
Published Date: July 13, 2026 6:38 pm IST

नयी दिल्ली, 13 जुलाई (भाषा) उच्चतम न्यायालय ने सोमवार को प्रमुख खनिजों पर रॉयल्टी की गणना से जुड़े प्रावधानों की संवैधानिक वैधता बरकरार रखते हुए केंद्र सरकार के खिलाफ किर्लोस्कर फेरस इंडस्ट्रीज की याचिका खारिज कर दी।

न्यायमूर्ति जे बी पारदीवाला और न्यायमूर्ति के वी विश्वनाथन की पीठ ने अपने एक महत्वपूर्ण फैसले में कहा कि संबंधित नियमों के तहत खनिजों के ‘बिक्री मूल्य’ की गणना में रॉयल्टी एवं अन्य वैधानिक भुगतान को शामिल किया जाना वैध है।

पीठ की तरफ से 82 पृष्ठ का फैसला लिखते हुए न्यायमूर्ति विश्वनाथन ने 2016 के खनिज (परमाणु और हाइड्रोकार्बन ऊर्जा खनिजों को छोड़कर) रियायत नियमों के नियम 38 को चुनौती देने वाली याचिका खारिज कर दी।

याचिका में इन प्रावधानों को संविधान के अनुच्छेद 14 (समानता का अधिकार) और अनुच्छेद 19(1)(ग) (व्यवसाय करने की स्वतंत्रता) का उल्लंघन बताया गया था।

किर्लोस्कर फेरस इंडस्ट्रीज ने नियम 38 की व्याख्याओं को चुनौती दी थी, जिनमें कहा गया है कि खनिजों के ‘बिक्री मूल्य’ की गणना करते समय रॉयल्टी, जिला खनिज प्रतिष्ठान (डीएमएफ) और राष्ट्रीय खनिज अन्वेषण न्यास (एनएमईटी) के भुगतान को घटाया नहीं जाएगा।

पीठ ने कहा, “हमारा मत है कि 2016 के नियमों में शामिल नियम 38 की व्याख्याएं और 2017 के नियमों के प्रावधान, औसत बिक्री मूल्य निर्धारण के लिए रॉयल्टी, डीएमएफ और एनएमईटी के भुगतान को शामिल करने की स्थिति में, वैध एवं संवैधानिक हैं।”

शीर्ष अदालत ने कहा कि संबंधित प्रावधान संविधान के अनुच्छेद 14 एवं 19(1)(ग) का उल्लंघन नहीं करते हैं और न ही वे खान एवं खनिज (विकास एवं विनियमन) अधिनियम की धारा 9 के विपरीत हैं।

केंद्र सरकार ने अपनी दलील में कहा था कि यदि इन नियमों को निरस्त किया जाता है तो नीलाम हुई खदानों की 50 वर्ष की अवधि में राज्यों को लगभग सात लाख करोड़ रुपये का भारी नुकसान हो सकता है।

पीठ ने कर चोरी रोकने के लिए ‘लीगल फिक्शन’ के विधायिका के अधिकार को मान्यता देते हुए कहा कि इस तरह के उपाय में कुछ भी अवैध नहीं है।

इसके साथ ही पीठ ने कोयला और लौह अयस्क के बीच भेदभाव के तर्क को खारिज करते हुए कहा कि दोनों की तुलना नहीं की जा सकती। कोयला क्षेत्र मुख्यतः एकाधिकार (कोल इंडिया) के अधीन है, जबकि लौह अयस्क क्षेत्र में कई निजी कंपनियों के होने से अलग नियामकीय व्यवस्था जरूरी है।

पीठ ने कहा कि जटिल आर्थिक मामलों में न्यायपालिका को विधायिका और नीति-निर्माताओं के प्रति उचित सम्मान (डिफरेंस) दिखाना चाहिए। उसने यह भी स्पष्ट किया कि किसी व्यक्तिगत कठिनाई के आधार पर सार्वजनिक हित से जुड़ी वित्तीय नीति को निरस्त नहीं किया जा सकता है।

फैसले में कहा गया कि जनता का कल्याण सर्वोपरि है और राज्यों की वित्तीय स्थिति की रक्षा के लिए निजी अधिकारों को सार्वजनिक हित के सामने पीछे हटना होगा।

भाषा प्रेम

प्रेम अजय

अजय


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