देहरादून वन प्रभाग में साल के 19170 पेड़ ‘होपलो’ से प्रभावित, केंद्र से कार्रवाई की अनुमति मांगी गयी
देहरादून वन प्रभाग में साल के 19170 पेड़ ‘होपलो’ से प्रभावित, केंद्र से कार्रवाई की अनुमति मांगी गयी
ऋषिकेश, दो अप्रैल (भाषा) उत्तराखंड के देहरादून वन प्रभाग में ‘होपलो सिरेंबिक्स स्पाइनिकॉर्निस’ (साल बोरर) नामक कीट के लार्वा से प्रभावित साल के 19,170 पेड़ों को काटने तथा ‘ट्री ट्रैप ऑपरेशन’ चलाने के लिए राज्य सरकार ने केंद्रीय वन, पर्यावरण एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय से अनुमति मांगी है। राज्य के वन मंत्री सुबोध उनियाल ने यह जानकारी दी ।
उनियाल ने बताया कि वन प्रभाग की थानो, आशारोड़ी और झाझरा रेंज में होपलो कीट के लार्वा के आक्रमण की जानकारी मिलने के बाद वन विभाग ने वन अनुसंधान संस्थान (एफआरआई) से संपर्क किया जिसके बाद उनकी विशेषज्ञ टीम ने साल के 19,170 पेड़ों को लार्वा से प्रभावित बताया।
वन मंत्री ने बताया कि इनमें से कुछ पेड़ छत्र या ‘कैनोपी’ तक सूख चुके हैं जिन्हें गिराया जाएगा।
उन्होंने कहा कि शेष पेड़ों पर बरसात के मौसम में ‘ट्री ट्रैप ऑपरेशन’ चलाया जाएगा।
विशेषज्ञों के अनुसार, होपलो के लार्वा साल के पेड़ों की जड़ों में छेद कर तने के बीच ‘जाइलम’ (जड़ों द्वारा अवशोषित जल और खनिज लवणों को पौधे के विभिन्न भागों तक पहुंचाने वाले ऊतक) को छेदते हुए वृक्ष को अंदर से खोखला कर देते हैं, फलस्वरूप वे अंततः सूख जाते हैं।
‘ट्री ट्रैप ऑपरेशन’ में साल के कुछ हरे पेड़ों को काट कर चार-चार फीट के लठ्ठे बना कर बरसात के पानी में डाल दिए जाते हैं। साल के इन लठ्ठों से उठती गंध ‘होपलो’ को आकर्षित करती है। इन कीटों को चिमटी से पकड़कर मिट्टी के तेल में डाल दिया जाता है जिससे ये मर जाते हैं। यह एक वृहद पैमाने पर चलाए जाना वाला अभियान है जिसमें प्रायः महिलाओं के स्वयं सहायता समूहों की मदद ली जाती है।
विशेषज्ञों के अनुसार वन प्रभाग में इतनी बड़ी संख्या में पेड़ों का ‘होपलो’ से प्रभावित होना पर्यावरण संतुलन की दृष्टि से काफी गंभीर बात है। उन्होंने कहा कि यह कीट प्राकृतिक रूप से कठ फोड़वा (वुड पैकर) नामक पक्षी का आहार है और जिस जंगल में यह पक्षी पाया जाता है, वहां साल के पेड़ों पर ‘होपलो’ का हमला अमूमन नहीं होता ।
वर्ष 1990 के दशक की शुरुआत में भी वन प्रभाग की थानों रेंज में होपलो का आक्रमण हुआ था और अब करीब 36 साल बाद फिर से यह मामला सामने आया है।
विशेषज्ञों के मुताबिक यह भी सवाल उठ रहा है कि क्या स्थानीय पारिस्थितिकी तंत्र टूटने या जलवायु परिवर्तन होने से साल के जंगलों पर ये कहर तो नहीं टूटा है? पिछले वर्ष उत्तराखंड में बारिश बहुत ज्यादा हुई थी और विशेषज्ञों के मुताबिक, अतिवर्षा भी होपलो के आक्रमण के लिए जिम्मेदार कई कारणों में से एक माना जाता है।
वन मंत्री ने भी होपलो के प्रकोप के कारण व समाधान को लेकर एक विस्तृत वैज्ञानिक अध्ययन की जरूरत बताई ।
भाषा सं दीप्ति राजकुमार
राजकुमार

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