स्तनपान से बच्चों को अतिसक्रियता के लक्षणों से बचाया जा सकता है : अध्ययन

स्तनपान से बच्चों को अतिसक्रियता के लक्षणों से बचाया जा सकता है : अध्ययन

स्तनपान से बच्चों को अतिसक्रियता के लक्षणों से बचाया जा सकता है : अध्ययन
Modified Date: June 29, 2026 / 03:57 pm IST
Published Date: June 29, 2026 3:57 pm IST

नयी दिल्ली, 29 जून (भाषा) अगर मां बच्चे को छह महीने की उम्र तक स्तनपान कराए तो उसमें तीन से आठ साल की उम्र में उभरने वाले एकाग्रता में कमी एवं अतिसक्रियता संबंधी एडीएचडी विकार के लक्षणों को कम किया जा सकता है। यह दावा नार्वे में करीब 36 हजार परिवारों पर किये अध्ययन के आधार पर किया गया है।

अटेंशन डेफिसिट हाइपरएक्टिविटी डिसऑर्डर अथवा ध्यान अभाव एवं अतिसक्रियता (एडीएचडी) तंत्रिका से जुड़ी स्थिति है, जिसमें ध्यान न दे पाना और बेचैन व्यवहार जैसे लक्षण दिखाई देते हैं। इसके लक्षण आमतौर पर बचपन में ही रहते हैं, लेकिन कुछ मामलों में ये वयस्क होने तक भी बने रह सकते हैं।

अध्ययन के मुताबिक शिशुओं के लिए पोषण का मुख्य स्रोत, मां का दूध होता है और इसमें विकास और मस्तिष्क के विकसित होने वाले सहायक तत्व होते हैं जैसे लंबी प्रोटीन श्रृंखला वाले फैटी एसिड, अमीनो एसिड, एंटीबॉडी और फायदेमंद बैक्टीरिया।

नॉर्वे के बर्गन विश्वविद्यालय सहित कई केंद्रों के अनुसंधानकर्ताओं ने अपने अध्ययन में यह समझने की कोशिश की कि स्तनपान बच्चे के दिमाग के विकास और प्रतिरोधक क्षमता पर को कैसे प्रभावित करता है।

‘बायोलॉजिकल साइकियाट्री’ नामक पत्रिका में प्रकाशित अनुसंधानपत्र के मुताबिक अध्ययन के दौरान इस बात का पता लगाने की कोशिश की गई कि शिशु को कितने महीनों तक केवल मां का दूध पिलाया गया और बच्चे में एडीएचडी के लक्षण विकसित होने के जोखिम से उसका क्या संबंध है।

बर्गन विश्वविद्यालय के बायोमेडिसिन विभाग में मनोवैज्ञानिक और अनुसंधानकर्ता और इस अनुसंधानपत्र की लेखिका डॉ. बेरिट स्क्रेटींग सोलबर्ग ने कहा, ‘‘हमने पाया कि बच्चे को जितने ज्यादा समय तक (छह महीने तक) सिर्फ मां का दूध पिलाया गया- तीन, पांच और आठ साल की उम्र में उनमें एडीएचडी के लक्षण उतने ही कम दिखे।’’

उन्होंने बताया कि इस अध्ययन में शामिल नार्वे के परिवारों के आंकड़ों का विश्लेषण किया गया। प्रश्नावली के जरिए, अनुसंधानकर्ताओं ने यह पता लगाया कि हर बच्चे को कितने महीनों तक केवल मां का दूध पिलाया गया।

अनुसंधान पत्र के लेखकों ने लिखा, ‘‘हर महीने पूरी तरह से स्तनपान करने वाले बच्चों में एडीएचडी के लक्षण कम सामने आए, जिससे ज्ञात होता है कि पूरी तरह से स्तनपान कराने का संबंध एडीएचडी के निम्न लक्षणों से है।’’

उन्होंने कहा कि यह संबंध लड़कों और लड़कियों, दोनों में देखा गया। स्तनपान करने वालों पर प्रभाव तीन और पांच साल की उम्र में सबसे अधिक था और आठ साल की उम्र में थोड़ा कमज़ोर था।

अनुसंधान टीम ने कहा कि स्तनपान से मिलने वाले सुरक्षात्मक लाभ इसकी अवधि और बारम्बारता से बढ़ते हैं, और छह महीने की उम्र तक केवल स्तनपान कराने पर ये सबसे ज़्यादा असरदार होते हैं।

उन्होंने कहा कि आनुवंशिक कारक आंशिक रूप से एडीएचडी की व्याख्या करते हैं।

अनुसंधानकर्ताओं ने कहा कि उदाहरण के लिए,अनुसंधान में सामने आया कि एडीएचडी के लक्षणों वाली माएं दूसरी माओं की तुलना में अपने बच्चों को कम स्तनपान कराती हैं और उनके बच्चों में भी एडीएचडी के लक्षण होने की आशंका अधिक हो सकती है। साथ ही, एडीएचडी के लक्षणों वाले बच्चों को स्तनपान कराना ज़्यादा मुश्किल हो सकता है।

सोलबर्ग ने कहा, ‘‘इससे बच्चों में कम स्तनपान और एडीएचडी के बढ़ते लक्षणों के बीच के संबंध को कुछ हद तक समझा जा सकता है।’’

संभावित कारण-संबंधों को बेहतर ढंग से समझने के लिए, इस अध्ययन में एडीएचडी के ज्ञात आनुवांशिकी जोखिम और सामाजिक-जनसांख्यिकीय कारकों का भी विश्लेषण किया गया। इसके तहत एक ही परिवार के भीतर स्तनपान के अलग-अलग तरीकों की तुलना करते हुए भाई-बहनों पर उसके असर को देखा गया।

सोलबर्ग ने कहा, ‘‘इन बदलावों के बाद भी, बाद में दिखने वाले एडीएचडी के लक्षणों पर केवल स्तनपान की अवधि का साफ लेकिन सीमित सुरक्षात्मक असर देखा गया।’’

उन्होंने कहा कि चूंकि यह एक अवलोकन-आधारित अध्ययन है, इसलिए कारण-प्रभाव के संबंध के बारे में पुख्ता तौर पर नहीं कहा जा सकता एवं अधिक गहन अनुसंधान की जरूरत है।

भाषा

धीरज नरेश

नरेश


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