फ्लैट का कब्जा लेने के बाद भी देरी के लिए मुआवजा मांग सकता है खरीदार: न्यायालय

फ्लैट का कब्जा लेने के बाद भी देरी के लिए मुआवजा मांग सकता है खरीदार: न्यायालय

फ्लैट का कब्जा लेने के बाद भी देरी के लिए मुआवजा मांग सकता है खरीदार: न्यायालय
Modified Date: June 27, 2026 / 01:58 pm IST
Published Date: June 27, 2026 1:58 pm IST

नयी दिल्ली, 27 जून (भाषा) उच्चतम न्यायालय ने कहा है कि कोई घर खरीदार फ्लैट का कब्जा मिलने के बाद भी उसे सौंपे जाने में देरी के लिए मुआवजे के अपने दावे पर फैसले का अनुरोध कर सकता है।

शीर्ष अदालत ने राष्ट्रीय उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग (एनसीडीआरसी) के 2016 के उस आदेश को रद्द कर दिया जिसमें कहा गया था कि याचिकाकर्ता शिकायत दर्ज कराए जाने के समय उपभोक्ता नहीं था, क्योंकि वह बिना किसी विरोध के फ्लैट का कब्जा पहले ही ले चुका था। शिकायत में फ्लैट का कब्जा सौंपने में देरी को सेवा में कमी बताते हुए मुआवजा दिए जाने का अनुरोध किया गया था।

न्यायमूर्ति विक्रम नाथ और न्यायमूर्ति वी. मोहना की पीठ ने उस घर खरीदार की याचिका पर यह आदेश दिया जो जनवरी 2003 में दिल्ली की एक सहकारी समूह आवास समिति का सदस्य बना था और उसे एक फ्लैट आवंटित किया गया था। उसने एनसीडीआरसी के आदेश को चुनौती दी थी।

शीर्ष अदालत ने कहा कि कब्जा देने में देरी के लिए मुआवजे का दावा स्वाभाविक रूप से उस अवधि से जुड़ा होता है, जो वास्तव में कब्जा सौंपे जाने से पहले की है।

पीठ ने चार जून के अपने आदेश में कहा, ‘‘बाद में कब्जा मिल जाने मात्र से खरीदार का कथित देरी के लिए मुआवजे के दावे पर फैसले का अधिकार समाप्त नहीं हो जाता।’’

याचिकाकर्ता ने फ्लैट का कब्जा सौंपने में देरी को सेवा में कमी बताते हुए जिला उपभोक्ता फोरम में शिकायत दर्ज कराई थी।

जिला उपभोक्ता फोरम ने जुलाई 2009 में पक्षकारों को मध्यस्थता के लिए भेजा था। दिल्ली राज्य उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग ने फरवरी 2013 में इस आदेश को बरकरार रखा।

इसके बाद अपीलकर्ता ने एनसीडीआरसी का रुख किया जिसने जनवरी 2016 में उसकी पुनरीक्षण याचिका खारिज कर दी।

उच्चतम न्यायालय ने कहा कि जिला फोरम ने उपभोक्ता शिकायत स्वीकार कर समिति को नोटिस जारी किया था। इसके बाद समिति ने विवाद को मध्यस्थता के लिए भेजने का अनुरोध करते हुए आवेदन दाखिल किया।

अपीलकर्ता ने शीर्ष अदालत में दलील दी कि पक्षकारों के बीच समझौते में मध्यस्थता संबंधी प्रावधान होने मात्र के आधार पर उपभोक्ता की शिकायत को मध्यस्थता के लिए नहीं भेजा जा सकता था।

पीठ ने अपील पर विचार करते हुए उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम, 1986 का उल्लेख किया और कहा कि यह उपभोक्ताओं को वस्तुओं में खराबी या सेवा में कमी की शिकायत पर सरल, सस्ता और त्वरित उपाय उपलब्ध कराने वाला जनहितकारी कानून है।

अदालत ने कहा कि अधिनियम की धारा तीन के अनुसार, इस कानून के तहत उपलब्ध उपाय अन्य कानूनी उपायों के अतिरिक्त है और यह उनके अधिकार को कम नहीं करता।

पीठ ने कहा, ‘‘इसलिए विवाद के निपटारे के लिए कोई अन्य मंच या तरीका उपलब्ध होने मात्र से उपभोक्ता फोरम का अधिकार क्षेत्र समाप्त नहीं हो जाता।’’

न्यायालय ने कहा कि एनसीडीआरसी के आदेश में एक और गंभीर खामी थी।

पीठ ने कहा, ‘‘राष्ट्रीय आयोग के समक्ष मुख्य प्रश्न यह था कि क्या जिला फोरम और राज्य आयोग का शिकायत को मध्यस्थता के लिए भेजना उचित था लेकिन राष्ट्रीय आयोग ने पुनरीक्षण याचिका इस आधार पर खारिज कर दी कि शिकायत दर्ज करते समय अपीलकर्ता उपभोक्ता नहीं था, क्योंकि वह बिना विरोध के फ्लैट का कब्जा पहले ही ले चुका था।’’

अदालत ने कहा कि ऐसा करते समय एनसीडीआरसी जिला फोरम और राज्य आयोग के आदेशों से उत्पन्न अधिकार क्षेत्र संबंधी मुख्य प्रश्न पर विचार करने में विफल रहा।

पीठ ने कहा कि एनसीडीआरसी की दलील को स्वीकार नहीं किया जा सकता।

उसने कहा कि अपीलकर्ता ने केवल फ्लैट का कब्जा दिलाने के लिए शिकायत नहीं की थी बल्कि उसकी शिकायत यह थी कि फ्लैट का कब्जा सौंपने में देरी हुई और वह इसके लिए मुआवजे का हकदार है।

पीठ ने कहा कि कब्जा सौंपने में वास्तव में देरी हुई या नहीं, इसके लिए समिति जिम्मेदार थी या नहीं और अपीलकर्ता ने बिना किसी शर्त के कब्जा स्वीकार किया था या नहीं-इन सभी मुद्दों पर मामले के गुण-दोष के आधार पर फैसला किया जाना जरूरी है।

पीठ ने याचिका स्वीकार करते हुए एनसीडीआरसी, राज्य आयोग और जिला फोरम के आदेशों को रद्द कर दिया।

अदालत ने उपभोक्ता की शिकायत बहाल कर दी और उसे गुण-दोष के आधार पर फैसले के लिए द्वारका जिला उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग के समक्ष रखने का निर्देश दिया।

शीर्ष अदालत ने कहा कि जिला आयोग दोनों पक्षों को सुनवाई और साक्ष्य पेश करने का उचित अवसर देने के बाद शिकायत पर फैसला करेगा।

पीठ ने कहा, ‘‘चूंकि यह शिकायत 2005 की है, इसलिए द्वारका जिला उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग इस आदेश की प्रति मिलने की तारीख से यथासंभव एक वर्ष के भीतर इसका निपटारा करने का प्रयास करे।’’

भाषा सिम्मी रंजन

रंजन


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