भारत के लिए कॉलेजियम प्रणाली फिलहाल सबसे उपयुक्त है: पूर्व प्रधान न्यायाधीश गवई

भारत के लिए कॉलेजियम प्रणाली फिलहाल सबसे उपयुक्त है: पूर्व प्रधान न्यायाधीश गवई

भारत के लिए कॉलेजियम प्रणाली फिलहाल सबसे उपयुक्त है: पूर्व प्रधान न्यायाधीश गवई
Modified Date: March 22, 2026 / 07:13 pm IST
Published Date: March 22, 2026 7:13 pm IST

बेंगलुरु, 22 मार्च (भाषा) देश के पूर्व प्रधान न्यायाधीश न्यायमूर्ति बी आर गवई ने रविवार को कहा कि कम से कम फिलहाल के लिए कॉलेजियम प्रणाली भारत के लिए सबसे उपयुक्त है।

उन्होंने इस बात पर भी जोर दिया कि सरकार को अदालतों में लंबित मामलों को कम करने के उद्देश्य से राष्ट्रीय मुकदमा नीति पर गंभीरता से विचार करना चाहिए।

भारत के पूर्व प्रधान न्यायाधीश (सीजेआई) ‘सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन’ (एससीबीए) के पहले राष्ट्रीय सम्मेलन -2026 के समापन सत्र को संबोधित कर रहे थे, जिसका शीर्षक था ‘न्यायिक शासन की पुनर्कल्पना: लोकतांत्रिक न्याय के लिए संस्थानों को मजबूत करना।’

गवई ने कहा, ‘‘कॉलेजियम के कामकाज के संबंध में एक मुद्दा उठाया गया था। मैं यह नहीं कहूंगा कि कॉलेजियम प्रणाली एक त्रुटिहीन प्रणाली है। कोई भी प्रणाली परिपूर्ण नहीं हो सकती। हर प्रणाली के अपने फायदे और नुकसान होते हैं। लेकिन इतने वर्षों तक काम करने के बाद, मुझे लगता है कि कम से कम फिलहाल के लिए, कॉलेजियम प्रणाली हमारे देश के लिए सबसे उपयुक्त है।’’

उन्होंने कहा कि कॉलेजियम मनमाने ढंग से काम नहीं करता है। उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश और दो वरिष्ठतम न्यायाधीशों की कॉलेजियम द्वारा न्यायाधीशों के नामों की सिफारिश की जाती है, और उसके बाद यह केंद्र सरकार को भेजा जाता है।

उन्होंने कहा, ‘‘केंद्र सरकार, खुफिया विभाग और सभी पक्षों से सुझाव एकत्र किए जाते हैं, और उसके बाद उच्चतम न्यायालय की कॉलेजियम अंतिम निर्णय लेती है। नामों को भेजे जाने के बाद भी यदि सरकार या कार्यपालिका को कोई आपत्ति होती है, तो उन आपत्तियों को कॉलेजियम के समक्ष रखा जाता है। कॉलेजियम आपत्तियों पर विचार करता है और उसके बाद अंतिम फैसला किया जाता है।’’

उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों की स्वीकृत संख्या और न्यायाधीशों की नियुक्तियों के बीच भारी अंतर पर पूर्व प्रधान न्यायाधीश ने कहा कि उच्चतम न्यायालय ने कई बार अपने फैसले में कहा है कि कॉलेजियम द्वारा दूसरी बार सिफारिश किए जाने पर कार्यपालिका नियुक्ति करने के लिए बाध्य है।

उन्होंने कहा, ‘‘लेकिन मुझे यह खेद है कि कई ऐसे नाम हैं, जिन्हें दूसरी सिफारिश के बाद भी कार्यपालिका ने अभी तक मंजूरी नहीं दी है। यह आरोप-प्रत्यारोप का खेल नहीं है, पर इस मुद्दे को मुझे उठाना ही होगा।’’

उन्होंने रेखांकित किया कि उच्च न्यायालय के न्यायाधीश उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीशों से कमतर नहीं हैं। न्यायमूर्ति गवई ने न्यायाधीशों के स्थानांतरण के संबंध में कहा कि दोनों ही संवैधानिक पदाधिकारी हैं, लेकिन कुछ विशेष परिस्थितियों में स्थानांतरण करना आवश्यक हो जाता है।

उन्होंने कहा, ‘‘मैं एक प्रश्न पूछता हूँ कि यदि कोई विशेष न्यायाधीश एक से अधिक अवसरों पर उच्चतम न्यायालय के निर्णयों की अवहेलना करता है, और किसी मामले में शीर्ष अदालत द्वारा स्पष्ट किए गए विचारों के विपरीत रुख अपनाता है, तो क्या कॉलेजियम को शांत बैठना चाहिए या सुधारात्मक कदम उठाने चाहिए? चूँकि बार (अधिवक्ता संघ) न्यायाधीशों की जननी है, इसलिए मैं यह मुद्दा बार के समक्ष रखना चाहता हूँ।’’

पर्यावरण संरक्षण और सतत विकास के बीच संतुलन बनाए रखने का पक्ष लेते हुए पूर्व प्रधान न्यायाधीश ने कहा कि अदालतें केवल हस्तक्षेप करने के लिए पर्यावरण के मामलों में दखल नहीं देतीं; बल्कि वास्तविकता यह है कि अदालतों के फैसलों के कारण ही देश के जंगल सुरक्षित हैं।

उन्होंने कहा, ‘‘उच्चतम न्यायालय के फैसलों के कारण ही प्रदूषण से जुड़े मुद्दों का समाधान किया गया है। लेकिन मैं इस आलोचना को स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं हूँ कि ऐसे मामलों में न्यायपालिका एक बाधा के रूप में कार्य करती है। जहाँ भी आवश्यक हुआ, न्यायपालिका ने हस्तक्षेप किया है, लेकिन जहाँ भी अदालत ने पाया कि पर्यावरण की चिंता और सतत विकास के बीच संतुलन बना हुआ है, वहाँ अदालत ने हमेशा उनके पक्ष में फैसला सुनाया है।’’

न्यायमूर्ति गवई ने कहा, ‘‘उन मामलों में जहाँ किसी व्यक्ति को उसकी सजा का 70 प्रतिशत से अधिक समय जेल में बिताने के बाद जमानत दी जाती है, राज्य (सरकार) एक नियमित प्रक्रिया के तौर पर उस जमानत आदेश को चुनौती देता है। उन्होंने सवाल किया, ‘‘ऐसे में यह पूछा जाना चाहिए कि मुकदमों के इस भारी अंबार (लंबित मामलों) के लिए समान रूप से और कौन जिम्मेदार है?’’

उन्होंने कहा कि राष्ट्रीय वाद नीति के बारे में वर्षों से चर्चा हो रही है, लेकिन यह अभी तक अस्तित्व में नहीं आई है। उन्होंने कहा, ‘‘मुझे लगता है कि यदि कार्यपालिका राष्ट्रीय वाद नीति को लागू करने या उसे लाने के लिए कुछ करती है, तो इससे लंबित मामलों की संख्या कम करने में वास्तव में मदद मिल सकती है।’’

गवई ने कहा कि ‘विकसित भारत’ की परिकल्पना विकास और कानून के शासन के बीच संतुलन स्थापित करना होना चाहिए।

पूर्व प्रधान न्यायाधीश ने कहा कि अदालतें हमेशा संयम बरतती हैं, और वे अपनी शक्तियों का प्रयोग तब करती हैं जब उन्हें लगता है कि नागरिकों के मौलिक अधिकारों का उल्लंघन हो रहा है; या फिर कार्यपालिका, न्यायपालिका और संसद को सौंपी गई शक्तियों के बीच के संतुलन को बिगाड़ने का प्रयास किया जा रहा है।

उन्होंने कहा, ‘‘जब कार्यपालिका अपनी शक्ति का प्रयोग करते हुए किसी व्यक्ति के अपराधी होने के संदेह पर उसके घर ध्वस्त कर देती है, तो क्या न्यायपालिका से यह अपेक्षा की जाती है कि वह चुपचाप बैठी रहे और कार्यपालिका को ऐसे कृत्य को अंजाम देने की अनुमति दे, जो कानून के शासन पर प्रहार करता है? यह एक ऐसा प्रश्न है जिस पर विचार किया जाना चाहिए।’’

भाषा संतोष दिलीप

दिलीप


लेखक के बारे में