मतदान के अधिकार को मौलिक अधिकार बनाने के पक्ष में कांग्रेस
मतदान के अधिकार को मौलिक अधिकार बनाने के पक्ष में कांग्रेस
नयी दिल्ली, 21 जून (भाषा) कांग्रेस ने मतदान के अधिकार को मौलिक अधिकार बनाने की जोरदार वकालत करते हुए रविवार को कहा कि यह कदम मतदाता सूचियों के विशेष गहन परीक्षण (एसआईआर) के तहत विभिन्न राज्यों में ‘अत्यधिक संख्या’ में मतदाताओं के नाम हटाये जाने या उन्हें जानबूझकर अयोग्य ठहराये जाने के खिलाफ सुरक्षा कवच प्रदान करने में एक सशक्त कदम होगा।
कांग्रेस नेता जयराम रमेश ने कहा कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह के ‘‘इशारे पर काम कर रहे’’ निर्वाचन आयोग के ‘‘घोर पक्षपातपूर्ण कामकाज’’ के पूरी तरह उजागर होने के बाद, अब समय आ गया है कि मतदान के अधिकार को एक मौलिक अधिकार का दर्जा दिया जाए।’’
उन्होंने कहा कि इससे इसे उच्चतम स्तर की न्यायिक समीक्षा और सुरक्षा मिल सकेगी।
रमेश ने उल्लेख किया कि बीते शुक्रवार को ही उच्चतम न्यायालय के दो न्यायाधीशों की पीठ ने संविधान के तहत फुटपाथ पर चलने के अधिकार को मौलिक अधिकार घोषित किया है।
उन्होंने याद दिलाया कि संविधान सभा ने सरदार पटेल की अध्यक्षता में मौलिक अधिकारों, अल्पसंख्यकों और जनजातीय एवं अपवर्जित क्षेत्रों पर एक सलाहकार समिति का गठन किया था। इक्कीस-22 अप्रैल 1947 को हुई इसकी बैठक में मतदान के अधिकार को मौलिक अधिकार बनाने पर तीखी बहस हुई थी, जिसमें डॉ. भीमराव आंबेडकर और बाबू जगजीवन राम ने इसके पक्ष में पुरजोर दलीलें दी थीं।
रमेश ने कहा कि सरदार पटेल, सी. राजगोपालाचारी और कुछ अन्य नेताओं का मानना था कि यदि मतदान के अधिकार को मौलिक अधिकार बना दिया गया, तो रियासतें भारतीय संघ में शामिल होने में झिझक सकती हैं, और संविधान में सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार का प्रावधान करना ही काफी है।
उन्होंने कहा, ‘‘सरदार पटेल ने खुद यह रुख अपनाया था कि सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार अपने आप में एक अंतर्निहित मौलिक अधिकार है। यही अनुच्छेद 326 की पृष्ठभूमि है, जो सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार के आधार पर चुनावों का प्रावधान करता है।’
कांग्रेस नेता ने कहा कि पिछले सात दशकों से इस बात पर लगातार बहस चल रही है कि मतदान का अधिकार जन प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 द्वारा प्रदान किया गया एक वैधानिक अधिकार है या यह एक स्पष्ट मौलिक अधिकार है।
रमेश ने रेखांकित किया, ‘‘विभिन्न दृष्टिकोण व्यक्त किए गए हैं। मार्च 2023 के ‘अनूप बरनवाल बनाम भारत संघ’ के फैसले में (शीर्ष अदालत की पीठ में शामिल) न्यायमूर्ति अजय रस्तोगी ने अपनी असहमति की राय में माना था कि मतदान का अधिकार एक मौलिक अधिकार है।’’
उन्होंने कहा कि उच्चतम न्यायालय ने खुद यह स्वीकार किया है कि मतदाताओं को उम्मीदवारों की आपराधिक पृष्ठभूमि, उनके वित्तीय हितों और राजनीतिक चंदा के स्रोतों को जानने का संवैधानिक और मौलिक अधिकार है।
रमेश ने तर्क दिया, ‘‘इसने (शीर्ष अदालत ने) मत की गोपनीयता की रक्षा की है और नोटा (इन विकल्पों में से कोई नहीं) के माध्यम से सभी उम्मीदवारों को खारिज करने के अधिकार को मान्यता दी है। इसलिए, यह और भी अधिक असंगत है कि मतदान का अधिकार केवल एक वैधानिक अधिकार बना हुआ है। इससे मिलते जुलते सभी अधिकारों को मौलिक घोषित कर दिया गया है, लेकिन वैसा मूल अधिकार जिसके बिना पहले वाले (अधिकार) अस्तित्व में नहीं रह सकते, वह अब भी वैधानिक (अधिकार बना) है।’’
उन्होंने कहा, ‘‘प्रधानमंत्री और केंद्रीय गृह मंत्री के इशारे पर काम कर रहे भारत के निर्वाचन आयोग के घोर पक्षपातपूर्ण कामकाज के पूरी तरह उजागर होने के बाद, अब समय आ गया है कि मतदान के अधिकार को एक मौलिक अधिकार का दर्जा दिया जाए। इससे इसे उच्चतम स्तर की न्यायिक समीक्षा और सुरक्षा मिल सकेगी।’’
रमेश ने कहा, ‘‘यह कदम ‘एसआईआर’ प्रक्रिया के तहत विभिन्न राज्यों में ‘अत्यधिक संख्या’ में मतदाताओं के नाम हटाये जाने या उन्हें जानबूझकर अयोग्य ठहराए जाने के खिलाफ सुरक्षा कवच प्रदान करने में एक शक्तिशाली कदम होगा। इसका यह भी अर्थ होगा कि निर्वाचन आयोग के कामकाज पर शीर्ष अदालत की अधिक निगरानी रहेगी।’’
शीर्ष अदालत ने जब शुक्रवार को फैसला सुनाया कि फुटपाथ पर चलने का अधिकार एक मौलिक अधिकार है, तो रमेश ने कहा था कि मतदान के अधिकार को भी एक मौलिक अधिकार घोषित करने के बारे में क्या राय है, क्योंकि भारतीय लोकतंत्र को उसकी मौजूदा ‘विनाशकारी स्थिति’ से बचाने के लिए यह सर्वोपरि है।
शीर्ष अदालत ने एक महत्वपूर्ण फैसले में माना है कि सीमांकित मार्गों पर फुटपाथ पर चलने के अधिकार को मोटर वाहनों पर प्राथमिकता मिलेगी और यह अनुच्छेद 19(1)(डी) के तहत गारंटीकृत आवागमन के अधिकार तथा अनुच्छेद 21 (जीवन और स्वतंत्रता का अधिकार) सहित अन्य मौलिक अधिकारों का हिस्सा है।
न्यायमूर्ति पी. एस. नरसिम्हा और न्यायमूर्ति ए. एस. चंदूरकर की पीठ ने माना कि किसी नागरिक का सीमांकित फुटपाथ पर चलने का अधिकार प्राथमिक है और इसे मोटर वाहनों के आवागमन पर प्राथमिकता दी जाएगी।
भाषा सुरेश नेत्रपाल
नेत्रपाल

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