टिकट को लेकर असंतोष, एसआईआर से समीकरण में बदलाव ने प.बंगाल चुनाव को रोचक बनाया

टिकट को लेकर असंतोष, एसआईआर से समीकरण में बदलाव ने प.बंगाल चुनाव को रोचक बनाया

टिकट को लेकर असंतोष, एसआईआर से समीकरण में बदलाव ने प.बंगाल चुनाव को रोचक बनाया
Modified Date: March 21, 2026 / 04:59 pm IST
Published Date: March 21, 2026 4:59 pm IST

(प्रदीप्त तापदर)

कोलकाता, 21 मार्च (भाषा) पश्चिम बंगाल में विभिन्न दलों के बीच टिकट वितरण को लेकर खुली बगावत के साथ ही मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) की प्रक्रिया से मतदाताओं की संख्या में आए बदलाव ने राज्य के राजनीतिक परिदृश्य में अनिश्चितता की एक नयी परत जोड़ दी है।

उम्मीदवारों की सूची घोषित होने के तुरंत बाद,राज्य में सत्तारूढ़ तृणमूल कांग्रेस और मुख्य विपक्षी भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) दोनों को ही विरोध प्रदर्शन, इस्तीफे और टिकट से वंचित कार्यकर्ताओं और नेताओं की नाराजगी का सामना करना पड़ा है। हालांकि पूर्व में भी चुनाव के समय दलों को ऐसी परिस्थिति का सामना करना पड़ा है, लेकिन विश्लेषकों का कहना है कि इस बार इस तरह की बगावत के चुनावी परिणाम अधिक गंभीर हो सकते हैं।

बगावत के ये सुर राजनीतिक रूप से संवेदनशील समय पर सामने आए हैं क्योंकि निर्वाचन आयोग द्वारा एसआईआर की प्रक्रिया कराए जाने के दौरान बड़े पैमाने पर मतदाताओं के नाम कटे हैं और यह एक ऐसा घटनाक्रम है जिसके बारे में राजनीतिक पर्यवेक्षकों का मानना ​​है कि यह कई करीबी मुकाबले वाली सीटों में चुनावी समीकरण को बदल सकता है।

सत्तारूढ़ तृणमूल से लेकर विपक्षी भाजपा तक, असंतुष्ट नेताओं और जमीनी स्तर के कार्यकर्ताओं के बीच पनप रही नाराजगी ने उन आंतरिक तनावों को उजागर कर दिया है जो अक्सर बड़े पैमाने पर चुनावी फेरबदल के साथ आते हैं।

विश्लेषकों का कहना है कि दलों के भीतर असहमति और संगठनात्मक मतभेद के साथ-साथ मतदाता सूचियों में होने वाले बदलावों के कारण बूथ स्तर पर लामबंदी और अभियान में एकजुटता पिछले चुनावों की तुलना में अधिक महत्वपूर्ण हो सकती है।

तृणमूल ने इस बार व्यापक पैमाने पर प्रत्याशियों को लेकर फेरबदल किया है। पार्टी ने अपने एक तिहाई यानी 74 मौजूदा विधायकों को टिकट नहीं दिया। उसने 294 सदस्यीय विधानसभा के लिए अबतक 291 उम्मीदवारों की घोषणा की है। यह तृणमूल नेतृत्व द्वारा सत्ता विरोधी लहर का मुकाबला करने, युवा चेहरों को मौका देने और इस महत्वपूर्ण मुकाबले से पहले स्थानीय राजनीतिक समीकरणों को संतुलित करने का एक सुनियोजित प्रयास प्रतीत होता है।

राज्य सरकार में मौजूदा मंत्री एवं तीन बार के विधायक ताजमुल हुसैन को मालदा की हरिश्चंद्रपुर सीट से टिकट न देकर तृणमूल ने इस बार मतिउर रहमान पर दांव लगाया है। हुसैन ने पार्टी के इस फैसले को ‘विश्वासघात’ का करार दिया है।

रहमान ने 2021 के विधानसभा चुनावों में भाजपा उम्मीदवार के रूप में इसी सीट से चुनाव लड़ा था।

हुसैन ने कहा, ‘‘मैंने पार्टी के लिए 15 साल काम किया। अचानक कोई आता है और टिकट हासिल कर लेता है। पार्टी ने मेरे साथ विश्वासघात किया है, और उसे इसके परिणाम भुगतने होंगे।’’

उनके समर्थकों ने एक कदम आगे बढ़कर आरोप लगाया कि सीट ‘‘धन के लिए बेची गई’’। तृणमूल ने इन आरोपों पर अबतक आधिकारिक रूप से कोई प्रतिक्रिया नहीं दी है।

उत्तर बंगाल के जलपाईगुड़ी की राजगंज सीट से तृणमूल ने मौजूदा विधायक खागेश्वर रॉय के स्थान पर एशियाई खेलों की स्वर्ण पदक विजेता स्वप्ना बर्मन को टिकट दिया है। इस फैसले से नाराज रॉय ने पार्टी की जिला इकाई के अध्यक्ष पद से इस्तीफा दे दिया।

उत्तर 24 परगना की आमदांगा सीट से तीन बार के विधायक रफीक उर रहमान को इस बार टिकट नहीं मिला है और उनकी जगह तृणमूल ने पीरजादा कासिम सिद्दीकी को उम्मीदवार बनाया है। पार्टी के इस फैसले का विरोध शुरू हो गया है और रहमान के समर्थकों ने सड़कें जाम कर दीं, टायर जलाए और पार्टी से अपने फैसले पर पुनर्विचार करने की मांग करते हुए नारेबाजी की।

रहमान ने कहा,‘‘मैं पार्टी का कार्यकर्ता बना रहूंगा, लेकिन मैं नेतृत्व से इस फैसले पर पुनर्विचार करने का आग्रह करता हूं। मुझे नहीं पता कि इस बार हम कितने सफल होंगे।’’

हुगली के चिनसुराह में भी असंतोष सामने आया, जहां पार्टी ने तीन बार के विधायक असित मजूमदार के स्थान पर युवा नेता एवं सूचना प्रौद्योगिकी प्रकोष्ठ प्रमुख देबांशु भट्टाचार्य को इस बार अपना उम्मीवार बनाया है।

मजूमदार ने सार्वजनिक रूप से निराशा व्यक्त की और राजनीति से संन्यास के संकेत दिए हैं।

भाजपा को भी उम्मीदवार चयन को लेकर कुछ क्षेत्रों में विरोध का सामना करना पड़ा है।

उम्मीदवारों की दूसरी सूची की घोषणा के बाद पार्टी कार्यकर्ताओं ने कोलकाता में भाजपा के राज्य मुख्यालय के बाहर विरोध प्रदर्शन किया और आरोप लगाया कि जमीनी स्तर के नेताओं की अनदेखी की गई है। कुछ प्रदर्शनकारियों ने चेतावनी दी कि जब तक नेतृत्व अपने फैसलों पर पुनर्विचार नहीं करता, वे कुछ उम्मीदवारों को चुनाव प्रचार करने की अनुमति नहीं देंगे।

भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष समिक भट्टाचार्य ने कहा, ‘‘हम अपने कार्यकर्ताओं की भावनाओं को समझते हैं, लेकिन केंद्रीय नेतृत्व का निर्णय अंतिम है और हम सभी को इसका पालन करना होगा।’’

परंपरागत रूप से मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी (माकपा) को एक अत्यंत अनुशासित संगठन माना जाता है लेकिन वहां पर भी आंतरिक कलह देखने को मिली है। नदिया के कालीगंज में वाम मोर्चे ने पिछले वर्ष चुनाव संबंधी हिंसा में मारे गए एक व्यक्ति की मां सबीना यास्मीन को अपना उम्मीदवार बनाया है जिसका विरोध करते हुए कुछ पार्टी कार्यकर्ताओं ने स्थानीय पार्टी कार्यालय में तोड़फोड़ की। बाद में पार्टी ने इस घटना में शामिल पार्टी के सात सदस्यों को निष्कासित कर दिया।

राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि टिकट को लेकर बड़े पैमाने पर नाराजगी इस बार दलों के लिए गंभीर परिणाम वाले हो सकते हैं क्योंकि एसआईआर प्रक्रिया की वजह से कई स्थानों की मतदाता सूची में बड़े पैमाने पर बदलाव आया है।

राज्य के 294 विधानसभा क्षेत्रों से संकलित आंकड़ों से ज्ञात होता है कि 200 से अधिक सीट पर एसआईआर प्रक्रिया के दौरान हटाए गए या जांच के दायरे में आए मतदाताओं की संख्या 2024 के लोकसभा चुनावों में दर्ज जीत के अंतर से अधिक है।

आंकड़ों के मुताबिक कम से कम 120 विधानसभा सीट ऐसी हैं जहां हटाए गए मतदाताओं की संख्या उन सीट पर लोकसभा की जीत के अंतर से अधिक है, जबकि लगभग 40 क्षेत्रों में यह 2021 के विधानसभा चुनावों में दर्ज किए गए अंतर से भी अधिक है।

राजनीतिक विश्लेषक विश्वनाथ चक्रवर्ती ने कहा, ‘‘ऐसे परिदृश्य में जहां जीत का अंतर कम होता है, बूथ स्तर पर संगठन की ताकत निर्णायक हो जाती है। यदि स्थानीय नेताओं या कार्यकर्ताओं के कुछ वर्ग टिकट वितरण को लेकर असंतोष के कारण निष्क्रिय रहते हैं, तो यह मतदान और लामबंदी को प्रभावित कर सकता है।’’

पश्चिम बंगाल में 2021 के विधानसभा चुनाव में तृणमूल ने 8,000 से कम मतों के अंतर से लगभग 45 सीट जीती थीं जबकि भाजपा को इस अंतर से 20 सीट पर कामयाबी मिली थी, जो रेखांकित करता है कि मतों में अपेक्षाकृत छोटे बदलाव भी कड़े मुकाबले वाले चुनाव में निर्णायक साबित हो सकते हैं।

पश्चिम बंगाल की विधानसभा के लिए दो चरणों में 23 और 29 अप्रैल को मतदान होगा जबकि मतों की गिनती के लिए चार मई की तारीख तय की गई है।

भाषा

धीरज खारी

खारी


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