समानता की दिशा में पहला कदम कानून तक समान पहुंच मुहैया करना : सीजेआई सूर्यकांत

समानता की दिशा में पहला कदम कानून तक समान पहुंच मुहैया करना : सीजेआई सूर्यकांत

समानता की दिशा में पहला कदम कानून तक समान पहुंच मुहैया करना : सीजेआई सूर्यकांत
Modified Date: June 25, 2026 / 05:11 pm IST
Published Date: June 25, 2026 5:11 pm IST

नयी दिल्ली, 25 जून (भाषा) भारत के प्रधान न्यायाधीश (सीजेआई) सूर्यकांत ने कहा है कि समानता की दिशा में पहला कदम कानून तक समान पहुंच मुहैया करना है और उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि यह केवल खानापूर्ति के रूप में नहीं होना चाहिए।

रूस के 14वें ‘सेंट पीटर्सबर्ग इंटरनेशनल लीगल फोरम’ में अपने संबोधन में बुधवार को प्रधान न्यायाधीश ने कहा कि कानून तक समान पहुंच की अवधारणा वास्तविक अधिकारों के प्रदान किये जाने में फलीभूत होनी चाहिए, न कि मात्र खोखली वैधानिक घोषणाओं में।

उन्होंने कहा, ‘‘हमें खुद से यह पूछना चाहिए कि कानून के समक्ष समानता को वास्तविक बनाने के लिए असल में क्या जरूरी है? दुनिया की सबसे बड़ी और सबसे जटिल न्यायिक प्रणालियों की अध्यक्षता करने के अपने अनुभव के आधार पर मेरा जवाब यह है कि समानता की दिशा में पहला कदम कानून तक समान पहुंच सुनिश्चित करना है।’’

प्रधान न्यायाधीश ने कहा, ‘‘इस तरह की पहुंच केवल खानापूर्ति नहीं हो सकती, यह खोखले कानूनी बयानों के बजाय वास्तविक अधिकार दिलाने वाला होना चाहिए।’’

उन्होंने कहा कि समानता का उत्पत्ति स्थल जरूरी नहीं कि 1215 ईस्वी का अधिकारों का ऐतिहासिक घोषणापत्र ही हो।

प्रधान न्यायाधीश ने कहा, ‘‘मेरा व्यक्तिगत रूप से मानना है कि समानता की अवधारणा की जड़ें कौटिल्य के ‘अर्थशास्त्र’ में मिलती हैं। इसमें चौथी शताब्दी में ही समानता के सिद्धांत का उल्लेख किया गया था।’’

न्यायमूर्ति सूर्यकांत ने कहा कि भारतीय संविधान ने अपने लागू होने के समय एक नयी सुबह का वादा किया था और लोगों को कई मौलिक अधिकार दिये, जिनमें कानून के समक्ष समानता, गरिमा के साथ जीने का अधिकार और समान न्याय शामिल हैं।

उन्होंने कहा, ‘‘असली चुनौती केवल इन गारंटियों (अधिकारों) को दोहराने की नहीं है, बल्कि उन्हें देश के हर व्यक्ति तक पहुंचाने की है, चाहे वह कहीं भी रहता हो और उसे आर्थिक-सामाजिक कठिनाइयों, भाषा की बाधाओं या सांस्कृतिक विविधताओं का सामना क्यों न करना पड़ता हो।’’

प्रधान न्यायाधीश ने कहा कि समानता की राह में सबसे बड़ी रुकावट कानूनी या वैधानिक समर्थन की कमी नहीं है, बल्कि यह भौगोलिक, सामाजिक और आर्थिक असमानताओं की वजह से पैदा होती है।

उन्होंने कहा, ‘‘…भारतीय संवैधानिक अदालतों (उच्चतम न्यायालय और उच्च न्यायालयों) ने ऐसी सभी बाधाओं को दूर करने के लिए संवैधानिक गारंटियों की व्यापक और विस्तृत व्याख्या की है। यह दृष्टिकोण सुनिश्चित करता है कि कानून और न्याय तक पहुंच केवल एक तकनीकी सुविधा न होकर, शासन का एक ऐसा बुनियादी सिद्धांत हो जिसमें कोई भेदभाव न हो।’’

प्रधान न्यायाधीश ने कहा कि समान न्याय और समान कानून केवल रस्मी शब्द नहीं हैं, बल्कि ये वे शर्तें हैं जिनके आधार पर ही कोई कानूनी व्यवस्था खुद को सही मायने में कानून कह सकती है।

अंतरराष्ट्रीय कानूनी ढांचे के बारे में उन्होंने कहा कि दुनिया के पूर्वी और दक्षिणी हिस्सों के कई देश अभी भी उपनिवेशवाद के प्रभाव से निपट रहे हैं और गरीबी का सामना कर रहे हैं।

भाषा सुभाष देवेंद्र

देवेंद्र


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