नौका गीतों से लेकर केले के पत्तों तक: अरनमुला की भव्य दावत की अनोखी परंपरा

नौका गीतों से लेकर केले के पत्तों तक: अरनमुला की भव्य दावत की अनोखी परंपरा

नौका गीतों से लेकर केले के पत्तों तक: अरनमुला की भव्य दावत की अनोखी परंपरा
Modified Date: September 15, 2026 / 12:41 pm IST
Published Date: September 15, 2026 12:41 pm IST

पथनमथिट्टा (केरल), 15 सितंबर (भाषा) केरल के दक्षिणी जिले पथनमथिट्टा का ऐतिहासिक गांव अरनमुला आस्था और भोजन के अनूठे संगम का गवाह बन रहा है, जहां सदियों पुरानी परंपरा के तहत भगवान पार्थसारथी को अर्पित किए जाने वाले ‘वल्लसद्या’ में केले के पत्ते पर 64 तरह के व्यंजन परोसे जाते हैं।

इस भव्य दावत में शामिल होने के लिए हजारों श्रद्धालु मंदिर पहुंच रहे हैं।

वल्लसद्या महज एक पारंपरिक भोजन नहीं है, बल्कि इसे एक धार्मिक अनुष्ठान माना जाता है। मान्यता है कि इसमें शामिल होने से श्रद्धालुओं की मनोकामनाएं पूरी होती हैं। दावत में परोसे जाने वाले हर व्यंजन का अपना स्थान है—परिप्पु, घी, अवियल और सांभर से लेकर विभिन्न प्रकार के पायसम, अचार और अन्य व्यंजनों तक।

प्रसिद्ध अरनमुला पार्थसारथी मंदिर में आयोजित होने वाली वल्लसद्या का संबंध पंपा नदी की पवित्र सर्प नौकाओं ‘पल्लियोडम’ और उनसे जुड़े समुदायों से भी है।

विभिन्न धार्मिक अनुष्ठानों के बीच आयोजित होने वाली यह दावत मंदिर परिसर को भोजन, आस्था और सदियों पुरानी परंपराओं के अनूठे संगम में बदल देती है।

मंदिर अधिकारियों ने बताया कि इस वर्ष वल्लसद्या का मौसम अब समाप्ति की ओर है। अंतिम 37 दावतें चार दिनों में आयोजित की जानी थीं, जिनमें सात दावतें समापन दिवस 16 सितंबर को होनी हैं।

अधिकारियों के अनुसार, अब तक 520 वल्लसद्या आयोजित की जा चुकी हैं। कुल 577 दावतों के लिए बुकिंग हुई थी, जिनमें से 20 को अगले वर्ष के लिए स्थगित कर दिया गया है।

वल्लसद्या की खासियत केवल केले के पत्ते पर परोसे जाने वाले व्यंजनों की संख्या नहीं है। इसकी विशेषता भोजन से जुड़े विस्तृत धार्मिक अनुष्ठानों में है। मान्यता है कि भोजन का हर निवाला, हर गीत और हर निमंत्रण भगवान को अर्पित किए जाने वाले प्रसाद का हिस्सा है।

परंपरागत रूप से वल्लसद्या में 64 व्यंजन होते हैं। चावल, दाल, घी, अवियल, सांभर, थोरन, पचड़ी, किचड़ी, अचार, एरिसेरी, कालान, ओलन, रसम और छाछ इस भोजन का मुख्य हिस्सा हैं।

इसके बाद मिठाइयों और तले हुए व्यंजनों की बारी आती है। इनमें अदा प्रदमन, पाल पायसम, पझम प्रदमन और कडला प्रदमन के साथ केले के चिप्स, चेम्बु और चेना उप्पेरी, शर्करा पुरट्टी, तिल के लड्डू, परिप्पु वड़ा और उन्नियप्पम शामिल हैं।

इस दावत में कुछ ऐसे व्यंजन और सामग्री भी शामिल हैं जो इसे अरनमुला की विशिष्ट पहचान देते हैं। इनमें गन्ना, अदरक वाला दही, कटे हुए केले, जीरे का पानी, अवल और मलर शामिल हैं।

हालांकि, केले के पत्ते पर परोसे गए व्यंजनों के साथ यह दावत समाप्त नहीं होती।

पल्लियोडम से जुड़े नौका गीतों ‘वंचिप्पाट्टु’ के जरिए भी पारंपरिक रूप से कुछ व्यंजनों की मांग की जाती है। इन गीतों के माध्यम से चीनी, मक्खन, विभिन्न प्रकार के केले, शहद, सोंठ का पानी, अलग-अलग तरह के थोरन, बैंगन मेझुक्कुपुरट्टी, अंबाझांगा, उप्पुमांगा, पके आम की करी, चांदी के पात्र में परोसा जाने वाला दूध और पंपा तीर्थम जैसी चीजें मांगी जा सकती हैं।

भोजन परोसने से पहले ही धार्मिक अनुष्ठान शुरू हो जाते हैं।

इस वर्ष भारी बारिश और बाढ़ के कारण चार दिनों की वल्लसद्या रद्द करनी पड़ी, जिसके चलते दावतों का आयोजन अपेक्षाकृत कम अवधि में करना पड़ा। इसके बावजूद इस आयोजन का पैमाना प्रभावशाली बना हुआ है। इस वर्ष अब तक करीब 1.5 लाख लोग वल्लसद्या में हिस्सा ले चुके हैं।

प्रवासी कारोबारी फिलेंद्रन राजू ने कहा कि वल्लसद्या आयोजित करना उनके जीवन में एक आशीर्वाद के समान है।

अरनमुला में वर्षों से वल्लसद्या आयोजित करने वाले अधिवक्ता पुण्य मनोज माधवशेरिल ने कहा कि इस दावत का महत्व व्यंजनों की संख्या से नहीं आंका जा सकता।

मनोज ने कहा, ‘‘अरनमुला सद्या में उपलब्ध व्यंजनों की संख्या महत्वपूर्ण नहीं है, बल्कि इससे मिलने वाला आशीर्वाद महत्वपूर्ण है। वल्लसद्या में हिस्सा लेना अपने आप में एक आशीर्वाद है। ऐसा आशीर्वाद दुनिया में कहीं और देखा या प्राप्त नहीं किया जा सकता।’’

पल्लियोडा सेवा संगम के अध्यक्ष के. वी. संबदेवन के लिए यह परंपरा केवल दावत तक सीमित नहीं है।

भाषा मनीषा वैभव

वैभव


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