कणाद के ‘परमाणु’ से लेकर इसरो मिशन तक, नयी पाठ्यपुस्तक भारत की वैज्ञानिक विरासत को दर्शाती हैं

कणाद के ‘परमाणु’ से लेकर इसरो मिशन तक, नयी पाठ्यपुस्तक भारत की वैज्ञानिक विरासत को दर्शाती हैं

कणाद के ‘परमाणु’ से लेकर इसरो मिशन तक, नयी पाठ्यपुस्तक भारत की वैज्ञानिक विरासत को दर्शाती हैं
Modified Date: July 15, 2025 / 08:40 pm IST
Published Date: July 15, 2025 8:40 pm IST

नयी दिल्ली, 15 जुलाई (भाषा) प्राचीन दार्शनिक आचार्य कणाद की ‘परमाणु’ संबंधी अवधारणा से लेकर भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) के अभियानों तक, राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद (एनसीईआरटी) द्वारा कक्षा आठ की विज्ञान की नयी पाठ्यपुस्तक ‘क्यूरियोसिटी’ ने पारंपरिक भारतीय ज्ञान को समकालीन विज्ञान के साथ जोड़ने की विरासत को दर्शाया है।

पुस्तक की प्रस्तावना में कहा गया है, ‘‘आधुनिक वैज्ञानिक शिक्षा के साथ पारंपरिक ज्ञान के इस एकीकरण का उद्देश्य जिज्ञासा, पर्यावरण जागरूकता, नैतिक मूल्यों और आलोचनात्मक सोच को विकसित करना है।’’

‘स्वास्थ्य: परम खजाना’ अध्याय में ‘हमारी वैज्ञानिक विरासत’ शीर्षक से एक खंड में लिखा है, ‘‘आधुनिक टीकों से बहुत पहले, भारत में चेचक से बचाव के लिए ‘वैरियोलेशन’ नामक एक पारंपरिक विधि थी।’’

वैरियोलेशन एक ऐसी पद्धति है जो टीकाकरण पर एडवर्ड जेनर के कार्य से भी पुरानी है।

इस अध्याय में ‘क्या आपने कभी सुना है?’ खंड भी शामिल है, जिसमें वैश्विक स्वास्थ्य में भारत के हालिया योगदान पर प्रकाश डाला गया है।

इसमें प्राचीन पद्धतियों को आधुनिक प्रगति से जोड़ते हुए कहा गया है, ‘‘भारतीय टीका कंपनियों ने कोविड-19 महामारी के दौरान महत्वपूर्ण भूमिका निभाई और वैश्विक स्वास्थ्य प्रयासों को समर्थन देना जारी रखा है।’’

पाठ्यपुस्तक में ‘पदार्थ की कणिकीय प्रकृति’ अध्याय में उल्लेख किया गया है कि ‘‘प्राचीन भारतीय दार्शनिक आचार्य कणाद ने पहली बार परमाणु के विचार के बारे में बात की थी’’।

‘पदार्थ की प्रकृति: तत्व, यौगिक और मिश्रण’ शीर्षक वाले एक अन्य अध्याय में कहा गया है कि प्राचीन भारतीय ग्रंथों में औषधीय प्रयोजनों के लिए मिश्र धातुओं के उपयोग का उल्लेख किया गया है।

पुस्तक में इसरो के विभिन्न मिशन भी शामिल हैं, जैसे चंद्रमा का अध्ययन करने के लिए चंद्रयान 1, 2 और 3, सूर्य का अध्ययन करने के लिए आदित्य एल1 और मंगल ग्रह का अध्ययन करने के लिए मंगलयान।

पाठ्यपुस्तक के अध्याय ‘प्रकाश: दर्पण और लेंस’ में कहा गया है कि 800 वर्ष पूर्व भास्कर द्वितीय के समय में भारतीय खगोलशास्त्री परावर्तन के माध्यम से ‘‘आकाश में तारों और ग्रहों की स्थिति को मापने’’ और उनका निरीक्षण करने के लिए उथले पानी के कटोरे और कोणीय नलिकाओं का उपयोग करते थे, जो साहित्य में परावर्तन के नियमों के अभाव के बावजूद परावर्तन के नियमों की व्यावहारिक समझ का सुझाव देता है।

कक्षा आठ के विद्यार्थी अब अपनी अद्यतन एनसीईआरटी अंग्रेजी पाठ्यपुस्तक में प्रथम परमवीर चक्र विजेता मेजर सोमनाथ शर्मा की वीरता और बडगाम के ऐतिहासिक युद्ध के बारे में पढ़ेंगे।

यह पुस्तक बच्चों को जल संरक्षण का महत्व भी सिखाती है और ‘गिल्ली डंडा’ तथा हॉकी के पाठों के साथ सीखने को मज़ेदार भी बनाती है।

भाषा नेत्रपाल माधव

माधव


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