सीओपी33 में नई आम सहमति बनाने का दबाव पड़ता, इसलिए मेजबानी से अलग हुई सरकार: कांग्रेस

सीओपी33 में नई आम सहमति बनाने का दबाव पड़ता, इसलिए मेजबानी से अलग हुई सरकार: कांग्रेस

सीओपी33 में नई आम सहमति बनाने का दबाव पड़ता, इसलिए मेजबानी से अलग हुई सरकार: कांग्रेस
Modified Date: April 9, 2026 / 11:23 am IST
Published Date: April 9, 2026 11:23 am IST

नयी दिल्ली, नौ अप्रैल (भाषा) कांग्रेस ने बृहस्पतिवार को दावा किया कि सरकार ने वर्ष 2028 में आयोजित होने वाले संयुक्त राष्ट्र के वार्षिक जलवायु सम्मेलन ‘कॉन्फ्रेंस ऑफ द पार्टीज’ (सीओपी33) की मेजबानी नहीं करने का फैसला किया क्योंकि इस सम्मेलन के अध्यक्ष के रूप में भारत पर जलवायु परिवर्तन के संदर्भ में एक नई आम सहमति बनाने के लिए अधिक दबाव पड़ सकता था, जिसमें भविष्य के लिए लक्ष्यों को बढ़ाना भी शामिल होता।

भारत ने वर्ष 2028 में आयोजित होने वाले सीओपी33 की मेजबानी करने के अपने प्रस्ताव को वापस ले लिया है।

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने वर्ष 2023 में दुबई में आयोजित सीओपी28 के दौरान भारत को सीओपी33 के मेजबान के रूप में प्रस्तावित किया था। आम तौर पर किसी भी सीओपी सम्मेलन का आयोजन स्थल दो वर्ष पहले तय किया जाता है।

कांग्रेस महासचिव जयराम रमेश ने प्रधानमंत्री मोदी के दो बयानों के वीडियो साझा करते हुए ‘एक्स’ पर पोस्ट किया, ‘एक दिसंबर 2023 को, प्रधानमंत्री ने दुबई में बड़ी घोषणा की थी कि भारत 2028 के अंत में भारत में वार्षिक संयुक्त राष्ट्र जलवायु परिवर्तन सम्मेलन (सीओपी) की मेजबानी करेगा। स्पष्ट रूप से उनका इरादा 2029 के लोकसभा चुनाव से पहले के महीनों में इस वैश्विक सभा का लाभ उठाने का था, जैसा कि नरेन्द्र मोदी ने 2024 के लोकसभा चुनाव से कुछ महीने पहले नई दिल्ली में जी 20 शिखर सम्मेलन आयोजित करके किया था।’

उन्होंने कहा कि अप्रत्याशित रूप से बुधवार रात यह घोषणा की गई कि भारत सीओपी 2028 सम्मेलन की मेजबानी नहीं करेगा।

रमेश ने दावा किया, ‘अचानक लिए गए इस फैसले का कोई कारण नहीं बताया गया है। लेकिन यह लघु और मध्यम अवधि में कार्बन उत्सर्जन संबंधी अधिक लक्ष्यों को प्राप्त करने की मोदी सरकार की सच्ची प्रतिबद्धता पर सवाल उठाता है। 2028 तक, आईपीसीसी (जलवायु परिवर्तन पर अंतर सरकारी समिति) की सातवीं मूल्यांकन रिपोर्ट प्रकाशित हो सकती है और यह 2028 सम्मेलन के अध्यक्ष के रूप में भारत पर एक नई आम सहमति बनाने के लिए अधिक दबाव डाल सकती थी जिसमें निस्संदेह, भविष्य के लिए महत्वाकांक्षाओं को बढ़ाना शामिल होगा।’

रमेश ने कटाक्ष करते हुए कहा, ‘ क्या हमें याद है कि प्रधानमंत्री ने कुछ साल पहले जलवायु परिवर्तन के बारे में अपने दृष्टिकोण पर बच्चों के एक समूह से क्या कहा था? उन्होंने टिप्पणी की थी कि ‘लोग बदल गए हैं, जलवायु नहीं।’ अजीबोगरीब बात है।’

भाषा हक खारी मनीषा

मनीषा


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