महिला आरक्षण विधेयक का सैद्धांतिक समर्थन, क्षेत्रीय असंतुलन नहीं होना चाहिए: वाईएसआरसीपी

महिला आरक्षण विधेयक का सैद्धांतिक समर्थन, क्षेत्रीय असंतुलन नहीं होना चाहिए: वाईएसआरसीपी

महिला आरक्षण विधेयक का सैद्धांतिक समर्थन, क्षेत्रीय असंतुलन नहीं होना चाहिए: वाईएसआरसीपी
Modified Date: April 17, 2026 / 02:12 pm IST
Published Date: April 17, 2026 2:12 pm IST

नयी दिल्ली, 17 अप्रैल (भाषा) वाईएसआर कांग्रेस पार्टी ने महिला आरक्षण अधिनियम में संशोधन संबंधी विधेयक का सैद्धांतिक रूप से समर्थन करते हुए कहा है कि परिसीमन में क्षेत्रीय असंतुलन नहीं होना चाहिए।

वाईएसआर कांग्रेस पार्टी के नेता मिथुन रेड्डी ने लोकसभा में महिला आरक्षण अधिनियम से संबंधित ‘संविधान (131वां) संशोधन विधेयक 2026’, ‘परिसीमन विधेयक, 2026’ और ‘संघ राज्य विधि (संशोधन) विधेयक, 2026’ पर चर्चा में भाग लेते हुए कहा कि सीटों के निर्धारण में कोई क्षेत्रीय असंतुलन नहीं होना चाहिए।

उनका यह भी कहना था कि परिसीमन को विपक्ष को दबाने के लिए हथियार के रूप में इस्तेमाल नहीं किया जाना चाहिए।

रेड्डी ने कहा कि उनकी पार्टी सैद्धांतिक रूप से इस विधेयक का समर्थन करती है।

वाईएसआर कांग्रेस नेता ने कहा कि सरकार को उनकी मांगों पर विचार करना चाहिए।

जनता दल (यू) नेता राजीव रंजन सिंह उर्फ ललन सिंह ने कहा कि ये तीनों विधेयक सबका साथ, सबका विकास, सबका विश्वास और सबका प्रयास के दृष्टिकोण से लाए गए हैं।

उन्होंने कहा कि विपक्ष द्वारा महिलाओं के साथ न्याय को रोकने के लिए जो ‘आनाकानी’ की जा रही है, उसे महिलाएं कभी माफ नहीं करेंगी।

सिंह ने दावा किया कि कांग्रेस किसी भी सामाजिक परिवर्तन के कदमों को रोकने का प्रयास करती है।

उन्होंने प्रियंका गांधी के भाषणों का हवाला देते हुए कहा, ‘‘कांग्रेस की मंशा सामने आ चुकी है।’’

सिंह ने कहा, ‘‘प्रियंका गांधी जी ने कहा कि यदि विधेयक पारित हुआ तो लोकतंत्र खत्म हो जाएगा। महिलाओं को इस सदन में 50 प्रतिशत आरक्षण मिलने से लोकतंत्र कैसे खत्म हो जाएगा?’’

तेलुगू देसम पार्टी के लावू श्री कृष्ण देवरायलु ने कहा कि उनकी पार्टी विधेयक का समर्थन करती है।

उनका कहना था कि आरक्षण चाहे 543 सीटों पर लागू हो या अधिक सीटों पर लागू हो, तेदेपा समर्थन करेगी।

उन्होंने कहा कि सीटों की संख्या में जिस अनुपात में बढ़ोतरी हो रही है, उससे आंध्र प्रदेश का नुकसान नहीं होगा।

भाषा हक

हक वैभव

वैभव


लेखक के बारे में