हंबनटोटा बंदरगाह के निकट रणनीतिक हवाई अड्डे को पट्टे पर देने की श्रीलंका की योजना पर भारत की नजर
हंबनटोटा बंदरगाह के निकट रणनीतिक हवाई अड्डे को पट्टे पर देने की श्रीलंका की योजना पर भारत की नजर
नयी दिल्ली, 17 मई (भाषा) भारत, चीन के नियंत्रण वाले हंबनटोटा बंदरगाह के निकट स्थित श्रीलंका के एक हवाई अड्डे के संचालन में विदेशी निवेशकों को हिस्सेदारी देने की योजना पर करीबी नजर रखे हुए है। मामले से परिचित लोगों ने रविवार को यह जानकारी दी।
मामले से जुड़े लोगों ने कहा कि यह कदम हिंद महासागर क्षेत्र में रणनीतिक उपस्थिति मजबूत करने की इच्छुक भारतीय कंपनियों के लिए एक महत्वपूर्ण अवसर साबित हो सकता है।
श्रीलंका सरकार ने हंबनटोटा स्थित मट्टाला राजपक्षे अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे (एमआरआईए) के संचालन और विकास के लिए 30-वर्षीय निर्माण-संचालन-हस्तांतरण (बीओटी) मॉडल के तहत घरेलू और विदेशी निवेशकों से नौ जून तक अभिरुचि-पत्र आमंत्रित किए हैं।
चीन ने 2017 में सामरिक महत्व वाले हंबनटोटा बंदरगाह का नियंत्रण 99-वर्ष के पट्टे पर हासिल किया था। इस घटनाक्रम ने इस बड़े पारगमन केंद्र की स्थिति को देखते हुए नयी दिल्ली की चिंताएं बढ़ा दी थीं।
पिछले वर्ष अप्रैल में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की श्रीलंका यात्रा के बाद दोनों पड़ोसी देशों के बीच व्यापारिक और रणनीतिक संबंधों को मजबूत करने की कोशिशें तेज हुई हैं। ऐसे में भारत इस नए अवसर पर विशेष नजर रखे हुए है।
कोलंबो से लगभग 250 किलोमीटर दूर स्थित मट्टाला राजपक्षे अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डा अपने शुरुआती दशक में अपेक्षित सफलता हासिल नहीं कर पाया। वर्ष 2013 में बड़े लक्ष्य के साथ शुरू की गई इस परियोजना पर 20.9 करोड़ अमेरिकी डॉलर खर्च हुए थे, जिसका अधिकांश वित्तपोषण चीन के निर्यात-आयात बैंक ने किया था।
हालांकि, आधुनिक टर्मिनल भवन और 3,500 मीटर लंबे रनवे के बावजूद यह हवाई अड्डा पर्याप्त यात्रियों और विमानन कंपनियों को आकर्षित नहीं कर सका। इसी कारण लंबे समय तक इसे दुनिया का सबसे खाली हवाई अड्डा कहकर इसकी आलोचना की गई।
अब श्रीलंका सरकार ने नए सिरे से अभिरुचि-पत्र जारी करते हुए घरेलू और अंतरराष्ट्रीय रणनीतिक निवेशकों को एमआरआईए का संचालन संभालने और उसे आधुनिक विमानन केंद्र के रूप में विकसित करने का प्रस्ताव दिया है।
अभिरुचि-पत्र में निवेश के दो स्वतंत्र विकल्प दिए गए हैं। पहला, हवाई अड्डा संचालन प्रबंधन से जुड़ा है, जिसके लिए कम-से-कम पांच वर्ष का विमानन अनुभव या प्रतिवर्ष 10 लाख से अधिक यात्रियों वाले किसी अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे के संचालन का अनुभव जरूरी होगा।
दूसरा विकल्प भू-आधारित विकास गतिविधियों का है, जिसे 30 वर्ष के पट्टे और विस्तार प्रावधानों के साथ बीओटी मॉडल पर पेश किया गया है। इसके तहत 238 हेक्टेयर भूमि का विकास किया जाएगा, जिसका आकार चीन समर्थित कोलंबो पोर्ट सिटी परियोजना के बराबर बताया जा रहा है, लेकिन उससे जुड़े राजनीतिक जोखिम इसमें नहीं होंगे।
इस भूमि का उपयोग विमान रखरखाव, मरम्मत एवं नवीनीकरण (एमआरओ) सुविधाओं, उड़ान प्रशिक्षण स्कूल, लॉजिस्टिक पार्क, सौर ऊर्जा संयंत्र, औद्योगिक पार्क और रिजॉर्ट होटल विकसित करने के लिए किया जा सकेगा।
मामले से जुड़े लोगों के अनुसार, दोनों विकल्प स्वतंत्र हैं और निवेशक केवल भू-आधारित गतिविधियों, केवल हवाई संचालन या दोनों में निवेश कर सकते हैं। इससे विविध और अपेक्षाकृत कम जोखिम वाला निवेश पोर्टफोलियो तैयार करने की सुविधा मिलेगी।
उन्होंने कहा कि चीन द्वारा श्रीलंका में राजनीतिक और आर्थिक प्रभाव बढ़ाने की कोशिशों के बीच इस परियोजना का भारत के लिए रणनीतिक महत्व भी है।
मामले से जुड़े एक व्यक्ति ने कहा, “हंबनटोटा में भारतीय कंपनियों की मौजूदगी भारत की ‘पड़ोसी प्रथम’ नीति और हिंद महासागर क्षेत्र के लिए उसकी ‘महासागर दृष्टि’ को मजबूत करेगी। इसे श्रीलंका जैसे करीबी साझेदार देश में भरोसा बढ़ाने वाले निवेश के रूप में भी देखा जाएगा।”
उन्होंने कहा कि भारत का विमानन क्षेत्र दुनिया में सबसे तेजी से बढ़ रहा है और देश का एमआरओ उद्योग क्षमता संबंधी दबाव का सामना कर रहा है। मट्टाला का लंबा रनवे, कम भीड़ वाला हवाई क्षेत्र और पर्याप्त भूमि इसे भारतीय विमानन कंपनियों के लिए एमआरओ केंद्र विकसित करने के लिहाज से उपयुक्त बनाते हैं।
इसके अलावा, यहां उड़ान प्रशिक्षण स्कूल स्थापित करना भी व्यावहारिक माना जा रहा है, क्योंकि भारत में पायलट प्रशिक्षण क्षमता पर दबाव बढ़ रहा है।
मामले से जुड़े लोगों ने कहा कि श्रीलंका सक्रिय रूप से भारतीय निवेश आकर्षित करने की कोशिश कर रहा है और भारत के साथ उसे वरीयता प्राप्त व्यापारिक पहुंच हासिल है। ऐसे में यह अवसर क्षेत्र में काफी महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
यह नया अवसर करीब डेढ़ वर्ष पहले मट्टाला के निकट प्रस्तावित एक परियोजना के विफल रहने के बाद सामने आया है।
पिछली सरकार ने शौर्य एरोनॉटिक्स प्राइवेट लिमिटेड के नेतृत्व वाले भारत-रूस संयुक्त उद्यम के साथ 30 वर्ष के पट्टे को लगभग अंतिम रूप दे दिया था, लेकिन सरकार बदलने के बाद यह समझौता लागू नहीं हो सका।
मामले से जुड़े लोगों ने कहा कि वर्तमान अभिरुचि-पत्र एक नई शुरुआत है और इस परियोजना का रणनीतिक महत्व पहले से अधिक मजबूत हो गया है।
भाषा योगेश सुरेश
सुरेश

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