लंबित आपराधिक मामलों के लिए अकेले न्यायिक अधिकारी जिम्मेदार नहीं: उच्च न्यायालय

लंबित आपराधिक मामलों के लिए अकेले न्यायिक अधिकारी जिम्मेदार नहीं: उच्च न्यायालय

लंबित आपराधिक मामलों के लिए अकेले न्यायिक अधिकारी जिम्मेदार नहीं: उच्च न्यायालय
Modified Date: May 11, 2026 / 10:47 pm IST
Published Date: May 11, 2026 10:47 pm IST

प्रयागराज, 11 मई (भाषा) इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने फिल्म ‘दामिनी’ के प्रसिद्ध संवाद ‘‘तारीख पर तारीख…’’ का उल्लेख करते हुए कहा कि यह संवाद न्याय मिलने में देरी को लेकर आम लोगों के नजरिए को दर्शाता है और अदालतों में बड़ी संख्या में आपराधिक मामलों के लंबित रहने के लिए केवल न्यायिक अधिकारी जिम्मेदार नहीं हैं।

अदालत ने कहा कि राज्य सरकार और पुलिस की भूमिका भी इसके लिए काफी हद तक जिम्मेदार है।

फतेहपुर निवासी मेवालाल प्रजापति की जमानत याचिका खारिज करते हुए न्यायमूर्ति अरुण कुमार सिंह देशवाल ने कहा, ‘‘ईमानदारी और कठिन परिश्रम से न्यायिक सेवा में आने वाले युवा न्यायिक अधिकारी अपर्याप्त स्टाफ, समन और वारंट की तामील में पुलिस के असहयोग, त्रुटिपूर्ण जांच और अधूरी एफएसएल रिपोर्ट के कारण खुद को असहाय महसूस करते हैं।’’

सात मई को दिए गए अपने आदेश में अदालत ने कहा कि ऐसी परिस्थितियों में न्यायिक अधिकारी निराश होकर उच्च न्यायालय की ओर देखते हैं, लेकिन बुनियादी ढांचा, पर्याप्त स्टाफ, एफएसएल रिपोर्ट और पुलिस सहयोग उपलब्ध कराना राज्य सरकार की जिम्मेदारी है।

जिला अदालतों में ढांचागत, प्रशासनिक और प्रक्रियागत कमियों पर चिंता जताते हुए उच्च न्यायालय ने कई निर्देश भी जारी किए।

अदालत हत्या के एक आरोपी की जमानत याचिका पर सुनवाई कर रही थी। मामले में खून से सना एक स्क्रूड्राइवर बरामद हुआ था, लेकिन जांच अधिकारी यह साबित करने के लिए डीएनए जांच रिपोर्ट पेश नहीं कर सका कि वह खून मृतक का ही था।

इस मामले में अदालत ने पहले पुलिस महानिदेशक, गृह सचिव और एफएसएल निदेशक को समन जारी किया था।

सुनवाई के दौरान एफएसएल निदेशक ने अदालत को बताया कि राज्य में संचालित 12 प्रयोगशालाओं में से केवल आठ में डीएनए प्रोफाइलिंग की सुविधा उपलब्ध है और प्रयोगशालाएं न केवल कर्मचारियों की कमी से जूझ रही हैं, बल्कि फॉरेंसिक और बैलिस्टिक जांच के लिए आधुनिक मशीनों की भी आवश्यकता है।

अदालत ने कहा कि व्यवस्थागत कमियों के कारण कई अपराधी बिना किसी भय के अपराध करते रहते हैं और उनमें से कुछ विधायक, सांसद और मंत्री तक बन जाते हैं।

इस संदर्भ में अदालत ने एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स (एडीआर) की रिपोर्ट का हवाला देते हुए कहा कि उत्तर प्रदेश सरकार में 49 प्रतिशत मंत्री आपराधिक मामलों का सामना कर रहे हैं, जिनमें से 44 प्रतिशत गंभीर आपराधिक मामलों में आरोपी हैं।

न्यायालय ने न्यायिक अधिकारियों की सुरक्षा का मुद्दा भी उठाया और कहा कि न्यायाधीशों को अदालतों में लगातार खतरे का सामना करना पड़ता है तथा अपराधियों द्वारा सार्वजनिक स्थानों पर अप्रत्यक्ष रूप से डराने-धमकाने की घटनाएं होती रहती हैं।

अदालत ने कहा कि उत्तर प्रदेश में सभी न्यायिक अधिकारियों को निजी सुरक्षा उपलब्ध नहीं होने से उनके निर्भीक होकर काम करने की क्षमता प्रभावित होती है।

न्यायालय ने राज्य सरकार से उत्तर प्रदेश एफएसएल को गृह विभाग के अधीन एक स्वायत्त संस्था बनाने, रिक्त पद भरने और सभी जिला न्यायाधीशों को निजी सुरक्षा अधिकारी उपलब्ध कराने की संभावना पर विचार करने को कहा।

अदालत ने यह भी निर्देश दिया कि आदेश की प्रति आगे की कार्रवाई के लिए मुख्यमंत्री के समक्ष प्रस्तुत की जाए।

भाषा सं राजेंद्र खारी

खारी


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