न्याय प्रदान करने की व्यवस्था मूल रूप से मानवीय कोशिश रहनी चाहिए : सीजेआई

न्याय प्रदान करने की व्यवस्था मूल रूप से मानवीय कोशिश रहनी चाहिए : सीजेआई

न्याय प्रदान करने की व्यवस्था मूल रूप से मानवीय कोशिश रहनी चाहिए : सीजेआई
Modified Date: June 23, 2026 / 07:21 pm IST
Published Date: June 23, 2026 7:21 pm IST

(तस्वीरों के साथ)

नयी दिल्ली, 23 जून (भाषा) भारत के प्रधान न्यायाधीश (सीजेआई) सूर्यकांत ने मंगलवार को कहा कि न्याय प्रदान करने की व्यवस्था मूल रूप से मानवीय कोशिश ही रहनी चाहिए। उन्होंने कहा कि यद्यपि कृत्रिम बुद्धिमता (एआई) न्यायाधीशों की मदद कर सकता है, लेकिन यह न तो फैसले तय कर सकता है और न ही न्यायिक विवेक का इस्तेमाल कर सकता है।

मॉस्को में रूस के उच्चतम न्यायालय के प्रमुख इगोर क्रासनोव के साथ बैठक के दौरान अपने संबोधन में न्यायमूर्ति सूर्यकांत ने कहा कि अगर प्रौद्योगिकी अदालतों की क्षमताएं बढ़ाती है, तो लोगों में किया गया निवेश ही यह तय करता है कि उन क्षमताओं का कितना प्रभावी ढंग से इस्तेमाल किया जाता है।

उन्होंने कहा कि संस्थाएं विकसित हो सकती हैं, प्रौद्योगिकी बदल सकती है और नयी चुनौतियां सामने आ सकती हैं, लेकिन अदालतों का मूल उद्देश्य न्याय को इस तरह से बनाए रखना है कि जनता का भरोसा कायम रहे।

सीजेआई ने कहा, ‘‘फिर भी, भले ही हम नवोन्मेष को अपनाएं, लेकिन हम इसकी सीमाओं के प्रति पूरी तरह जागरूक हैं। न्याय प्रदान करने की व्यवस्था मूल रूप से मानवीय कोशिश है और इसे ऐसा ही बने रहना चाहिए।’’

उन्होंने कहा कि एआई जानकारी को व्यवस्थित करने, अनुवाद में मदद करने, प्रतिलिपि तैयार करने और प्रशासनिक प्रक्रियाओं को आसान बनाने में न्यायाधीशों की मदद कर सकता है, लेकिन ‘‘यह नतीजों का फैसला नहीं कर सकता, गवाहों की विश्वसनीयता नहीं परख सकता, सबूतों का मूल्यांकन नहीं कर सकता या न्यायिक विवेक का इस्तेमाल नहीं कर सकता’’।

सीजेआई ने कहा कि यह न्यायपालिका में एआई के इस्तेमाल के लिए हाल ही में उच्चतम न्यायालय द्वारा अधिसूचित नियमों के मसौदे में दिखता है। इन नियमों का मकसद न्यायिक स्वतंत्रता और मानवीय निगरानी को बनाए रखते हुए एआई का जिम्मेदारी से इस्तेमाल सुनिश्चित करना है।

उन्होंने कहा कि भारत और रूस, दोनों के उच्चतम न्यायालय बहुत बड़े और विविधता वाले समाजों के लिए काम करते हैं।

न्यायमूर्ति सूर्यकांत ने कहा कि भले ही दोनों देशों की कानूनी परंपराएं अलग-अलग ऐतिहासिक रास्तों पर विकसित हुई हैं, फिर भी ‘‘हमारे सामने एक जैसी चुनौती है: तेज़ी से बदलती दुनिया के साथ तालमेल बिठाते हुए न्याय व्यवस्था में जनता का भरोसा कैसे बनाए रखा जाए’’।

प्रधान न्यायाधीश ने कहा कि न्यायिक कामकाज में प्रौद्योगिकी को शामिल करने के मामले में भारत का नज़रिया इस सिद्धांत पर आधारित है कि प्रौद्योगिकी न्याय प्रदान करने की प्रणाली का एक ज़रूरी और अभिन्न अंग है, हालांकि, इसका इस्तेमाल न्यायिक मूल्यों की जगह लेने के लिए नहीं किया जाना चाहिए।

उन्होंने कहा, ‘‘शुरुआत से ही, डिजिटल बदलाव की हमारी कोशिशों के पीछे एक मजबूत न्यायिक व्यवस्था बनाने की इच्छा रही है, ताकि उन व्यावहारिक बाधाओं को दूर कर सके जो नागरिकों को अदालतों तक कुशलतापूर्वक और प्रभावी ढंग से पहुंचने से रोकती हैं।’’

न्यायमूर्ति सूर्यकांत ने कहा कि प्रौद्योगिकी एक ऐसा ज़रिया है, जिसके माध्यम से अदालतें लोगों के लिए अधिक सुलभ, पारदर्शी और उत्तरदायी बन सकती हैं।

उन्होंने कहा कि न्याय का भविष्य तकनीकी नवोन्मेषण और स्थायी मानवीय मूल्यों को एक साथ लाने की क्षमता पर निर्भर करेगा।

भाषा सुरेश दिलीप

दिलीप


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