मध्यस्थता ढांचा काफी परिपक्व हो चुका है, पर चुनौतियां बाकी : सीजेआई सूर्यकांत

मध्यस्थता ढांचा काफी परिपक्व हो चुका है, पर चुनौतियां बाकी : सीजेआई सूर्यकांत

मध्यस्थता ढांचा काफी परिपक्व हो चुका है, पर चुनौतियां बाकी : सीजेआई सूर्यकांत
Modified Date: February 28, 2026 / 05:44 pm IST
Published Date: February 28, 2026 5:44 pm IST

अहमदाबाद, 28 फरवरी (भाषा) भारत के प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत ने शनिवार को कहा कि भारत का मध्यस्थता ढांचा काफी परिपक्व हो चुका है, फिर भी विश्वास कायम करने, संस्थागत क्षमता को मजबूत करने और योग्य मध्यस्थ पेशेवर तैयार करने में महत्वपूर्ण चुनौतियां बनी हुई हैं।

अहमदाबाद में गुजरात उच्च न्यायालय मध्यस्थता केंद्र (जीएचएसी) की आधारशिला रखने के बाद प्रधान न्यायाधीश ने कहा कि भारत को विश्व के अग्रणी मध्यस्थता केंद्रों के मानकों और उन पक्षों की वैध अपेक्षाओं के अनुरूप खुद को आंकना चाहिए, जो मुकदमेबाजी से बेहतर और तेज समाधान की उम्मीद में मध्यस्थता का विकल्प चुनते हैं।

उन्होंने इसी कार्यक्रम में गुजरात के मुख्यमंत्री भूपेंद्र पटेल के संबोधन का उल्लेख किया, जिसमें मुख्यमंत्री ने भारत के कानूनी और न्यायिक ढांचे,खासकर गुजरात जैसे राज्य के लिए संस्थागत मध्यस्थता के बढ़ते महत्व पर जोर दिया।

प्रधान न्यायाधीश ने कहा, ‘‘भारत का मध्यस्थता ढांचा अब काफी परिपक्व हो चुका है। मध्यस्थता अधिनियम में विधायी सुधारों ने न्यायिक हस्तक्षेप को कम से कम करने, समयबद्ध कार्यवाही और नियुक्तियों में निष्पक्षता पर जोर दिया है। साथ ही, न्यायिक निर्णयों ने पक्षकारों की स्वायत्तता को मजबूत किया और सैद्धांतिक अनिश्चितताओं को स्पष्ट किया है।’’

हालांकि, उन्होंने कहा कि प्रगति के बावजूद मौजूदा चुनौतियां समाप्त नहीं हुई हैं। उन्होंने कहा कि संस्थागत मध्यस्थता अभी भी उतनी व्यापक नहीं है, जितनी होनी चाहिए, और बहुत से विवाद अब भी अस्थायी (एड हॉक) तरीकों से हल किए जाते हैं। इसके अलावा, कई संस्थागत मध्यस्थता के मामले अभी भी भारत के बाहर निपटाए जाने को प्राथमिकता देते हैं।

विश्वास बनाने, दक्षता विकास और प्रशिक्षित पेशेवरों की उपलब्धता जैसी चुनौतियों की ओर इशारा करते हुए उन्होंने कहा, “हमारे सामने सवाल यह नहीं है कि मध्यस्थता संभव है या नहीं, बल्कि सवाल यह है कि क्या हमारी संस्थागत मध्यस्थता और इसके लिए बनाए गए संस्थान पर्याप्त भरोसा पैदा करते हैं, ताकि वे सबसे सुलभ विकल्प और स्थान बन सकें।”

पहली चुनौती ‘विश्वास’ पर बात करते हुए, प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत ने कहा कि संस्थागत मध्यस्थता तभी सफल होती है, जब उपयोगकर्ता इस पर सच्चे दिल से भरोसा करें।

उन्होंने कहा, ‘‘मध्यस्थों की नियुक्ति में निष्पक्षता पर विश्वास, प्रक्रिया की शुचिता पर विश्वास, और निर्णयों के पालन पर विश्वास—यह भरोसा केवल कागज पर बने नियमों से नहीं बनता। यह समय के साथ लगातार, पारदर्शी और स्पष्ट रूप से निष्पक्ष व्यवहार से बनता है।’’

उन्होंने कहा कि दूसरी चुनौती क्षमता है।

प्रधान न्यायाधीश ने कहा, ‘‘भारत में संस्थागत मध्यस्थता की संख्या देश में उत्पन्न होने वाले वाणिज्यिक विवादों की तुलना में बहुत कम है। कई पक्ष अब भी अस्थायी मध्यस्थता या अदालतों का सहारा लेते हैं क्योंकि संस्थाओं ने अभी तक यह साबित नहीं किया है कि वे कितनी उपयोगी हैं।’’

उन्होंने कहा कि तीसरी चुनौती ‘‘पेशेवर बनने की’’ है, जो सबसे कठिन और महत्वपूर्ण प्रतीत होती है।

प्रधान न्यायाधीश ने कहा, ‘‘मध्यस्थता एक विशेष विधा है। इसके लिए केवल कानूनी समता ही नहीं, बल्कि मामले का प्रबंधन करने की क्षमता, व्यावसायिक वास्तविकताओं के प्रति संवेदनशीलता और यह समझना भी आवश्यक है कि पक्षों के लिए वास्तव में क्या दांव पर है।’’

उन्होंने कहा, ‘‘भारत को मध्यस्थों के प्रशिक्षण में महत्वपूर्ण निवेश करना चाहिए और योग्य मध्यस्थ पेशेवरों की एक सुसंगत श्रृंखला विकसित करनी चाहिए।’’

उन्होंने कहा कि इस निवेश के बिना संस्थानों की संख्या बढ़ेगी, लेकिन प्रक्रिया की गुणवत्ता में सुधार नहीं होगा।

गुजरात उच्च न्यायालय मध्यस्थता केंद्र (जीएचएसी) की अत्याधुनिक इमारत में 16 मध्यस्थता सम्मेलन कक्ष, सात मध्यस्थता कक्ष और एक ऑनलाइन विवाद समाधान प्रणाली है, जो अंतरराष्ट्रीय और घरेलू वैकल्पिक विवाद समाधान की आवश्यकताओं को पूरा करती है।

भाषा खारी दिलीप

दिलीप


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