कानूनी वारिसों को मात्र बाहर करना ही वसीयत को अमान्य करने के लिए पर्याप्त नहीं: न्यायालय
कानूनी वारिसों को मात्र बाहर करना ही वसीयत को अमान्य करने के लिए पर्याप्त नहीं: न्यायालय
नयी दिल्ली, 21 मई (भाषा) यह उल्लेख करते हुए कि वसीयत का मूल उद्देश्य ही उत्तराधिकार के सामान्य क्रम को बदलना है, उच्चतम न्यायालय ने बृहस्पतिवार को कहा कि स्वाभाविक उत्तराधिकारियों को महज विरासत से वंचित करना, अपने आप में वसीयत को अमान्य ठहराने के लिए कोई संदिग्ध परिस्थिति नहीं माना जा सकता।
न्यायमूर्ति उज्ज्वल भुइयां और न्यायमूर्ति विजय बिश्नोई की पीठ ने दिवंगत बी शीना नैरी की पत्नी और बच्चों द्वारा दायर अपील को खारिज कर दिया, जिसमें उस वसीयत की वैधता को चुनौती दी गई थी जिसके माध्यम से नैरी ने कर्नाटक में अपनी संपत्तियों को अपनी बहन लक्ष्मी नैरथी को सौंप दिया था।
उच्चतम न्यायालय ने निचली अदालत, अपीलीय अदालत और कर्नाटक उच्च न्यायालय के उन निष्कर्षों को बरकरार रखा, जिनमें वसीयत को प्रामाणिक माना गया था।
इसने कहा, ‘‘स्वाभाविक उत्तराधिकारियों को बाहर करना विचाराधीन वसीयत को अमान्य करने के लिए पर्याप्त नहीं हो सकता, विशेष रूप से ऐसे में, जब वसीयत में स्पष्ट रूप से यह निर्दिष्ट किया गया है कि वसीयतकर्ता ने अपनी पत्नी, बच्चों या अन्य रिश्तेदारों के साथ कोई अन्याय नहीं किया है, और उसने मुंबई में रहने वाली अपनी पत्नी और बच्चों को पर्याप्त संपत्ति दी है।’’
यह विवाद उस वक्त शुरू हुआ जब चार्टर्ड अकाउंटेंट बी शीना नैरी ने मई 1983 में अपनी छोटी बहन के नाम वसीयत की और उसी वर्ष उनकी मृत्यु हो गई। उनकी पत्नी और बच्चों ने वसीयत को चुनौती दी तथा आरोप लगाया कि यह मनगढ़ंत है और उन्हें विरासत से अनुचित रूप से वंचित किया गया है।
शीर्ष अदालत ने कहा, ‘‘वसीयतकर्ता की संपत्ति से स्वाभाविक उत्तराधिकारियों को बाहर कर देना, अपने आप में, एक संदिग्ध परिस्थिति के रूप में नहीं माना जा सकता, जिससे वसीयत को पूरी तरह से अमान्य घोषित किया जा सके।’’
अपील को खारिज करते हुए, पीठ ने कहा कि वसीयत की वैधता को बरकरार रखने वाले अदालती निष्कर्षों में हस्तक्षेप की आवश्यकता नहीं है।
भाषा
नेत्रपाल सुभाष
सुभाष

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